'मैं मरा नहीं हूं, वापस आऊंगा'... Prashant Kishor

कुछ महीने पहले प्रशांत किशोर ने यह बात कही थी. तब यह केवल एक राजनीतिक बयान लग रहा था. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव ने इसे राजनीतिक भविष्यवाणी बना दिया. तीन दशक से बीजेपी के कब्जे वाली सीट पर जीत केवल एक विधायक की जीत नहीं है. यह बिहार की बदलती राजनीति, टूटते जातीय समीकरण, युवाओं की नई आकांक्षाओं और लोकतंत्र के आत्मविश्वास की कहानी है.

बारिश के बाद सड़क पर जमा पानी कभी सिर्फ पानी नहीं होता.

वह शासन की दरारों में भरा हुआ भरोसा भी होता है.

पटना की एक सड़क पर ऐसा ही पानी जमा था. लोग रोज गुजरते थे. शिकायतें भी होती थीं. लेकिन सरकार की नजर वहां नहीं पहुंची. फिर एक कैमरा पहुंचा. सोशल मीडिया पर एक वीडियो आया. कुछ घंटों बाद सरकारी मशीनें भी पहुंच गईं.

उस दिन सड़क से सिर्फ पानी नहीं निकला था.

यह भ्रम भी बह गया था कि विपक्ष केवल चुनाव के समय दिखाई देता है.

शायद वहीं से बांकीपुर की कहानी शुरू हुई.

'मैं मरा नहीं हूं, वापस आऊंगा'

करीब तीन साल पहले जब JanSuraaj यात्रा शुरू हुई थी, तब बहुत लोगों ने इसे राजनीतिक प्रयोग माना.

कहा गया कि रणनीति बनाना और चुनाव जीतना दो अलग बातें हैं. कई लोगों ने यहां तक कह दिया कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक अध्याय शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया.

लेकिन प्रशांत किशोर बार-बार एक ही बात कहते रहे.

मैं मरा नहीं हूं, वापस आऊंगा.

Bankipur का नतीजा उसी वाक्य की राजनीतिक वापसी जैसा दिखता है.

राजनीति का नया व्याकरण

बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातियों के जोड़-घटाव की भाषा में लिखी गई.

हर चुनाव एक सामाजिक समीकरण था. हर प्रत्याशी एक जातीय प्रतिनिधि. हर रैली पहचान का उत्सव.

लेकिन इतिहास कभी एक भाषा में हमेशा नहीं लिखा जाता.

जब समाज बदलता है, तो राजनीति का व्याकरण भी बदलता है.

बांकीपुर शायद उसी बदलाव का पहला स्पष्ट वाक्य है.

लोकतंत्र का मौन विद्रोह

लोकतंत्र हमेशा सड़कों पर नारे लगाकर विद्रोह नहीं करता.

कई बार वह चुपचाप मतदान केंद्र तक जाता है.

एक बटन दबाता है.

और वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक आत्मविश्वास को एक शाम में बदल देता है.

बांकीपुर का फैसला शायद ऐसा ही मौन विद्रोह था.

प्रशांत किशोर की असली जीत

प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी जीत चुनाव जीतना नहीं है.

उनकी सबसे बड़ी जीत यह है कि उन्होंने बिहार की राजनीति में एक भूला हुआ शब्द वापस ला दिया है-

एजेंडा

तीन दशक तक बिहार में चुनाव अक्सर इस सवाल पर लड़े गए कि आप कौन हैं?

प्रशांत किशोर ने सवाल बदलने की कोशिश की-

आप करना क्या चाहते हैं?

राजनीति में कई बार केवल प्रश्न बदल देने से पूरा इतिहास बदल जाता है.

क्या नीतीश कुमार का सामाजिक समीकरण टूट गया?

बिहार की राजनीति लंबे समय तक सामाजिक गठबंधनों के गणित पर चलती रही.

कौन सी जाति किसके साथ जाएगी, कौन सा समुदाय किस दल के साथ रहेगा, चुनाव की रणनीति अक्सर इसी पर आधारित होती थी.

लेकिन बांकीपुर ने एक अलग संकेत दिया.

यहां जाति पूरी तरह खत्म नहीं हुई, लेकिन पहली बार यह स्पष्ट दिखा कि वह अकेले चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं रही.

मतदाता ने पहचान से ज्यादा प्रदर्शन को महत्व देना शुरू किया.

यही बदलाव आने वाले विधानसभा चुनाव की दिशा भी तय कर सकता है.

रणनीतिकार से जननेता तक

प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि लोग उन्हें चुनाव जिताने वाला रणनीतिकार तो मानते थे, लेकिन जनता का नेता नहीं.

तीन वर्षों की पदयात्रा, गांव-गांव संवाद, छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और लगातार सार्वजनिक उपस्थिति ने धीरे-धीरे यह धारणा बदल दी.

उन्होंने केवल भाषण नहीं दिए.

उन्होंने स्थानीय समस्याओं को कैमरे पर दिखाया, प्रशासन को चुनौती दी और जनता को यह महसूस कराया कि विपक्ष केवल बयान देने के लिए नहीं होता.

बांकीपुर की जीत शायद उसी मेहनत का राजनीतिक प्रमाणपत्र है.

पहचान नहीं, एजेंडा

ध्यान देने वाली बात यह है कि इन मुद्दों का संबंध किसी जाति या धर्म से नहीं है.

इनका संबंध हर परिवार से है.

यही कारण है कि उनकी राजनीति को कई विश्लेषक एजेंडा आधारित राजनीति कह रहे हैं.

अगर यह प्रयोग आगे भी सफल होता है, तो बिहार की चुनावी भाषा बदल सकती है.

नई पीढ़ी का नया मतदाता

बांकीपुर का परिणाम एक और बदलाव की ओर संकेत करता है.

आज का मतदाता 1990 के दशक वाला मतदाता नहीं है.

मोबाइल, सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान, प्रतियोगी परीक्षाएं, स्टार्टअप, रोजगार, माइग्रेशन और वैश्विक अवसरों के बीच पली-बढ़ी पीढ़ी की प्राथमिकताएं अलग हैं.

Gen Z और युवा मतदाता जाति को पूरी तरह नहीं छोड़ते, लेकिन केवल उसी आधार पर वोट भी नहीं देते.

यही सवाल अब चुनावी राजनीति की दिशा बदल रहे हैं.

तीसरी ताकत की औपचारिक एंट्री

बिहार लंबे समय से दो बड़े ध्रुवों के बीच घूमता रहा है.

एक ओर एनडीए.
दूसरी ओर राजद गठबंधन.

बांकीपुर की जीत ने पहली बार यह संभावना मजबूत की है कि राज्य में तीसरी राजनीतिक धुरी भी प्रभावी बन सकती है.

यह केवल सीटों का सवाल नहीं है.

यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को नया आयाम देने का संकेत है.

Bankipur के बाद बिहार

बांकीपुर का परिणाम अंतिम फैसला नहीं है.

एक उपचुनाव पूरे राज्य का भविष्य तय नहीं करता.

लेकिन कुछ चुनाव ऐसे होते हैं जो आने वाले वर्षों की दिशा बता देते हैं.

1977, 1989 और 2014 ऐसे ही चुनाव थे.

क्या 2026 का बांकीपुर भी उसी श्रेणी में शामिल होगा?

इसका उत्तर अभी भविष्य देगा.

लेकिन इतना स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी.

जाति रहेगी, पहचान भी रहेगी, लेकिन उनके साथ अब काम, जवाबदेही और एजेंडा भी बराबरी से खड़े होंगे.

और शायद यही इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश है.

यह भी पढ़ें : Prashant Kishor : दूसरों की सरकार बनाने वाले PK, बांकीपुर उपचुनाव में क्या साबित करना चाहते हैं?


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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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