पेट्रोल-डीजल की कीमत से लेकर महीने की EMI तक, होर्मुज संकट का आपकी जेब पर कितना पड़ेगा असर?

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा रहा है. जानिए कि हॉर्मुज खाड़ी में यह संकट आपकी रोजमर्रा की जिंदगी और आर्थिक स्थिति को कैसे प्रभावित कर सकता है.

28 फरवरी 2026 से शुरू हुआ अमेरिका-ईरान तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. बीच-बीच में राहत की खबरें जरूर आती हैं, लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाती. नतीजा यह है कि दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है.

बीते दिनों अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ा. होर्मुज इलाके में जहाजों पर हमलों की खबरों के बीच कच्चे तेल की कीमत, करीब 96.80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया.अब भारत की नजर से देखें तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कच्चा तेल कितना महंगा हुआ, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता. यानी तेल महंगा होता है तो ट्रांसपोर्ट से लेकर खाने-पीने और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमतें भी बढ़ जाती है.

इसलिए अहम सवाल ये है कि अगर होर्मुज संकट लंबा खींचता है, तो इसका असर आपकी जेब पर कितना पड़ेगा?

पहले समझते हैं, होर्मुज में नया अपडेट क्या है ?

  • अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ा और होर्मुज के आसपास जहाजों पर हमलों की खबरें आईं. इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखा.
  • 7 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 96.80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. इससे पहले पिछले हफ्ते ही ब्रेंट में करीब 7.8 फीसदी की तेजी आ चुकी थी.
  • रॉयटर्स के मुताबिक होर्मुज से जहाजों की आवाजाही भी काफी कम हुई है. यहां अब औसतन करीब 10 मालवाहक जहाज रोजाना गुजर रहे हैं, जो मई के बाद सबसे कम स्तर है.

अब सवाल है कि होर्मुज को लेकर इतनी चिंता क्यों है?

  • होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल रास्तों में से एक है. सामान्य हालात में दुनिया के करीब पांचवें हिस्से के बराबर पेट्रोलियम तरल पदार्थ इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं. इसलिए अगर यहां लंबे समय तक आवाजाही प्रभावित रहती है, तो सिर्फ मध्य-पूर्व ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों के लिए भी तेल की सप्लाई महंगी और मुश्किल हो सकती है.
  • भारत के लिए यह मामला इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात करता है. यानी अगर दुनिया के बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कत या कीमत महंगा हुआ, तो उसका असर भारत पर पड़ता है.
  • हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है. होर्मुज में परेशानी का मतलब यह नहीं है कि भारत में अगले ही दिन पेट्रोल-डीजल की कीमत उतनी ही तेजी से बढ़ जाएगी. दरअसल इसका असर कई स्टेप में दिखता है.

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अंतरराष्ट्रीय मार्केट में तेल महंगा हुआ तो सबसे पहले क्या बदलेगा?

  • तेल महंगा होने का सबसे सीधा असर कच्चे तेल को खरीदने और उसे भारत तक लाने की लागत पर पड़ती है. क्योंकि हम तेल आयात करते हैं.
  • अगस्त 2026 में भारत ने करीब 46.2 लाख बैरल कच्चा तेल रोजाना आयात किया. इसमें रूस की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी रही. हालांकि यह भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था.नतीजा रूस से आने वाले तेल में कमी को दूर करने के लिए भारत ने वेनेजुएला, इराक और अंगोला जैसे दूसरे देशों से खरीद बढ़ाई है.
  • लेकिन यहां एक दिक्कत ये है कि जितनी दूर से तेल आएगा, उसे भारत तक लाने का खर्च भी उतना बढ़ सकता है. इसमें जहाज का किराया, बीमा और दूसरे परिवहन खर्च शामिल होते हैं. यानी तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता.
  • पहले कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, फिर तेल कंपनियों की लागत पर दबाव आता है. इसके बाद इसका असर ट्रांसपोर्ट, सामान ढुलाई और दूसरी चीजों की कीमतों पर पड़ता है और अगर यह दबाव लंबे समय तक बना रहा, तो इसका असर महंगाई, रुपये की कीमत और RBI की ब्याज दरों में भी देखने को मिलता है.

तेल महंगा होने से खाने-पीने की चीजें कैसे महंगी होती हैं?

अब सवाल है कि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से खाने-पीने की चीजों पर असर कैसे पड़ेगा?

  • इसकी सबसे बड़ी वजह है ढुलाई का खर्च, खेत से मंडी, मंडी से गोदाम और फिर दुकान तक सामान पहुंचाने के लिए ट्रक और दूसरे वाहन चलते हैं. जो पेट्रोल-डीजल से चलते हैं.
  • यानी पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ तो सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है. नतीजा फल-सब्जी, दूध, अनाज, दाल, खाद्य तेल, पैकेज्ड फूड और दूसरी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ सकती है
  • इसके अलावा खेती में भी डीजल का इस्तेमाल होता है तो कीमत बढ़ने का असर सिंचाई के पंप, ट्रैक्टर और दूसरे चीजों पड़ती हैं. इससे किसानों और कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है, जिसका कुछ हिस्सा आगे चलकर सामान की कीमतों में दिखाई दे सकता है.
  • यानी तेल महंगा होने का असर एक दिन में हर चीज पर नहीं दिखता, लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो इसका असर ढुलाई, उत्पादन और आखिर में खाने-पीने की चीजों की कीमतों तक पहुंच सकता है.
  • जुलाई 2026 में भारत की खुदरा महंगाई 4.45 फीसदी और खाने-पीने की चीजों की महंगाई 5.52 फीसदी थी. अगस्त का आधिकारिक आंकड़ा अभी जारी होना है.

यहीं से कहानी आगे बढ़ती है रुपये और RBI की ब्याज दरों की तरफ.

हर महीने की EMI से इसका क्या कनेक्शन है?

तेल महंगा होने से सीधे आपकी EMI नहीं बढ़ती, इसके बीच एक पूरी कड़ी होती है.

  • मान लीजिए होर्मुज संकट की वजह से तेल लंबे समय तक महंगा रहता है.इससे पेट्रोल-डीजल, ढुलाई और दूसरी चीजों की लागत बढ़ सकती है। यानी महंगाई बढ़ने का दबाव बन सकता है.
  • तेल महंगा हुआ तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आ सकता है. 6 सितंबर को रुपया करीब 94.49 रुपये प्रति डॉलर के आसपास था.
  • अगर महंगाई ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो RBI के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो सकता है. जरूरत पड़ने पर RBI दरें बढ़ भी सकती है.
  • अब इसका असर आपकी EMI पर आता है. अगर आपका होम लोन फ्लोटिंग ब्याज दर पर है और बैंक की ब्याज दर बढ़ती है, तो आपकी EMI बढ़ सकती है या लोन चुकाने का समय बढ़ सकता है. अगस्त 2026 में RBI ने रेपो रेट 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा था.

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संकट लंबा चला तो भारत के पास क्या विकल्प हैं?

  • भारत रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे कई स्रोतों से तेल खरीद सकता है. लेकिन दूसरे देशों से तेल मिल जाना यह गारंटी नहीं है कि वह पहले जितना सस्ता भी होगा.
  • दूर के देशों से तेल लाने पर मालभाड़ा और बीमा खर्च बढ़ सकता है. साथ ही भारत को उसी तेल के लिए दूसरे खरीदार देशों से भी मुकाबला करना पड़ सकता है. यानी सप्लाई का विकल्प रहेगा, लेकिन लागत बढ़ने का खतरा भी रहेगा.

इसलिए होर्मुज संकट का असली खतरा सिर्फ पेट्रोल की कीमत नहीं है. चिंता यह है कि अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो असर ईंधन से महंगाई, महंगाई से ब्याज दर और ब्याज दर से आपकी EMI तक पहुंच सकता है.

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लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

गौतम कुमार वर्तमान में प्रभात खबर से जुड़े पत्रकार हैं. वे राजनीति, इतिहास, साहित्य, खेल, कानून, लोक संस्कृति और मनोरंजन जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं. किसी विषय पर रिपोर्टिंग या लेखन के दौरान उनका जोर केवल घटनाओं की जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पृष्ठभूमि, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और उसके प्रभाव को समझाने पर रहता है.

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