History of Munda Tribes 6 : मुंडा जनजाति पड़हा सरकार के जरिए चलाते हैं अपनी व्यवस्थाएं, जानिए खासियत

History of Munda Tribes : झारखंड के छोटानापुर में जब मुंडा के गांव किलि के हिसाब से बसने लगे तो, पड़हा की शुरुआत हुई. एक पड़हा के लोग सामाजिक और प्रशासनिक रूप से जुड़े होते थे, इसलिए उनका एक राजा भी होता था. पड़हा राजा के बाद महाराजा होते थे, इतिहास में जिस मदरा मुंडा का जिक्र है, वह मुंडाओं के महाराजा ही थे.

History of Munda Tribes : मुंडा जनजाति के इतिहास को जब हम समझने की कोशिश करते हैं, तो यह पाते हैं कि मुंडा शब्द कई जिम्मेदारियों और रुतबे का सूचक है. एक ओर जहां मुंडा गांव का प्रधान होता है वहीं दूसरी ओर मुंडा एक जनजाति का भी नाम है. संभवत: इसी वजह से मुंडा जनजाति के लोगों का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है. अपनी जिम्मेदारियों की वजह से ही शायद मुंडा जनजाति ने अपनी परंपराओं और शासन व्यवस्था को बनाए रखा, जिनमें से एक है पड़हा और उसकी शासन व्यवस्था.

मुंडा संस्कृति में क्या है पड़हा?

मुंडा समाज शुरुआत में 21 किलि में बंटा, जिसे क्लान या कबीले के रूप में समझा जा सकता है. लेकिन जैसे-जैसे किलि में सदस्यों की संख्या बढ़ती गई कई नए किलि आपसी सहमति से बनने लगे. (वर्तमान में मुंडाओं के 103 किलि से भी अधिक हैं.) जनसंख्या में वृद्धि के बाद आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही थी, तब एक ही किलि के लोगों ने दूसरे गांव बसाए. लेकिन उनका कब्रिस्तान अभी भी एक ही था और वे पूजा भी साथ ही करते थे. सिर्फ उनके खेत और गांव अलग थे. लेकिन जैसे-जैसे गांव की बीच दूरी बढ़ी कब्रिस्तान और पूजा स्थान भी अलग होने लगे, लेकिन सामाजिक और प्रशासनिक मामलों में वे एक ही समुदाय के रूप में बंधे हुए थे. ऐसे ही गांवों के समूह को पड़हा कहा जाता है. अमूमन पड़हा में 3,5,7 गांव शामिल होते थे. एक पड़हा में गांवों की संख्या हमेशा विषम संख्या में ही होती थी.

वंश के आधार पर तय होता था पड़हा राजा

पड़हा राजा एक पड़हा का प्रधान होता है. उसकी नियुक्ति निश्चित तौर पर शुरुआत में उसकी योग्यता और सक्षमता के अनुसार आम सहमति से हुई होगी, क्योंकि मुंडा गांव में शासन व्यवस्था सहमति के आधार पर ही चलती थी. लेकिन एक बार जिस परिवार से पड़हा राजा चुन लिया गया था, उसके वंशज ही इस पद को धारण करते थे.अगर कोई ऐसी परिस्थिति बनती थी जिसमें पड़हा राजा अपने पद पर नहीं बना रह सकता था, तो उसके परिवार से ही किसी व्यक्ति को आम सहमति से पड़हा राजा चुनने की व्यवस्था थी. पड़हा राजा किलि के आम सदस्य की तरह ही होता था, बस उसके पास समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ विशेष अधिकार होते थे.

कैसे चलती थी पड़हा की सरकार?

पड़हा राजा की शासन व्यवस्था, ai image

मुंडा समाज में त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था थी. इसमें सबसे निचले स्तर पर गांव का मुंडा होता था. उसके पास गांव को सुरक्षित और सुव्यवस्थित रखने के अधिकार थे. चूंकि उस काल में कर वसूलने जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी इसलिए गांव का मुंडा मुख्यत: आपसी विवाद और जीवन से जुड़े अन्य मसलों का निराकरण करता था. जब कभी कोई ऐसा मामला सामने आता, जिसमें मुंडा के स्तर से विवाद का निराकरण संभव नहीं था, तब मामला पड़हा राजा के पास पहुंचता था. अगर पड़हा राजा के पास समस्या का समाधान हो गया, तब तो ठीक अन्यथा मसला फिर आगे महाराजा के पास पहुंचता था.

इसे भी पढ़ें : History of Munda Tribes 5 : पड़हा राजा के हाथों में होती थी शासन की कमान, आम सहमति से होते थे सभी कार्य

History of Munda Tribes 2 : मगध से झारखंड की ओर साथ आए थे मुंडा और संताल

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

पड़हा में शासन व्यवस्था आदर्श स्थिति में थी : मीनाक्षी मुंडा

मुंडाओं की शासन पद्धति के बारे में बात करते हुए कोल्हान विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर मीनाक्षी मुंडा बताती हैं कि मुंडा समाज में जो त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था थी वह आज भी काफी हद तक नजर आती है. हालांकि समय के साथ इसमें काफी बदलाव हो गए हैं और पंचायत चुनाव के बाद तो स्थिति और भी अलग हो गई है. लेकिन पुरानी व्यवस्था की बात करें तो पड़हा में शासन व्यवस्था आदर्श स्थिति में थी और सबकुछ आम सहमति से ही होता था. अगर ऐसी स्थिति बनती थी कि निष्पक्ष फैसले की संभावना कम होती थी, जैसे मुंडा या पड़हा राजा से संबंधित कोई मसला हो, तो उसे आगे लेकर जाया जाता था. लेकिन फैसले में न्याय को सर्वोपरि माना जाता था. हां, पड़हा की शासन व्यवस्था में महिलाओं की कोई भूमिका नहीं होती थी. पड़हा का प्रधान राजा यानी पुरुष होता था, इसलिए वही सबकुछ तय करता था.

मुंडा आदिवासियों का गांव, एआई से बनाई गई तस्वीर

पड़हा राजा की सहायता के लिए उसके कुछ सहयोगी भी होते थे, जो गांव के वरिष्ठ लोग होते थे और जिनका गांव में सम्मान होता था. नागवंशियों के शासन की शुरुआत के बाद इस शासन पद्धति में कुछ बदलाव भी देखे गए, हालांकि उन्होंने भी इस व्यवस्था से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की थी.

मुंडा-मानकी व्यवस्था और पड़हा राजा व्यवस्था में सिर्फ नाम का फर्क : गुंजल इकिर मुंडा

संस्कृतिकर्मी गुंजल इकिर मुंडा बताते हैं कि मुंडा शासन व्यवस्था में दो पद्धति चलती थी-मुंडा-मानकी व्यवस्था और पड़हा राजा व्यवस्था. दोनों में फर्क सिर्फ नाम का है, क्योंकि दोनों के क्षेत्र अलग हैं. गांव का प्रधान मुंडा सबसे निचले स्तर का राजा था और वह विवादों के निपटारे और गांव की व्यवस्था के लिए जिम्मेदार था. उस वक्त लोगों के बीच जिस तरह के विवाद होते होंगे मसलन एक किलि में शादी या खेती से संबंधित विवाद उनका निपटारा वह करता होगा. उससे बड़े विवादों के लिए मानकी या पड़हा राजा और फिर महाराजा होता था. जब विवाद गांव से निकलकर पड़हा राजा के पास जाता था, तो उसकी शिकायत लेकर गांव का मुंडा पड़हा राजा के पास जाता था और संबंधित पक्ष को भी जाना होता होगा. चूंकि इस परंपरा के बारे में कुछ भी लिखित नहीं है, इसलिए परंपराओं से यही जाहिर होता है.

इसे भी देखें : History of Munda Tribes 4 : मुंडा समाज में कानून की दस्तक था ‘किलि’, जानें कैसे हुई थी शुरुआत

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >