US- Iran Peace Deal : पश्चिम एशिया में जारी तनाव को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की थी. पाकिस्तान ने यह कोशिश की थी कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवा कर वह विश्व की नजर में शांति का दूत बन जाए और उसपर आतंकवादियों को शरण देने वाले देश का ठप्पा भी मिट जाए. इस समझौते के बहाने पाकिस्तान, अमेरिका का करीबी भी बनना चाहता था, लेकिन उसके मनसूबे पर अस्थिर सोच वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पानी फेर दिया है.
पाकिस्तान को अमेरिका ने दिया झटका
ईरान और अमेरिका के बीच समझौता कराने के लिए पाकिस्तान ने एड़ी-चोटी एक की. दोनों देशों के प्रतिनिधियों को इस्लामाबाद आमंत्रित किया था और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस मौके को लपकने की हर संभव कोशिश की थी. ईरान और अमेरिका के बीच जो शांति समझौता हुआ है, उसे शुरू करने में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई थी. दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने का काम भी पाकिस्तान ने किया था. उसे उम्मीद थी कि जब यह समझौता होगा तो विश्व पटल पर अमेरिका की साख बढ़ेगी, लेकिन जब समझौता हुआ तो अमेरिका के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान को दरकिनार कर दिया और फ्रांस में शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया. परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान को उपलब्धि के नाम पर कुछ भी नहीं मिला और उसका इस्लामाबाद मेमोरेंडम से फायदा उठाने का विचार धरा रह गया. हालांकि 18 जून को शहबाज शरीफ ने भी इस मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किया, लेकिन उसे महज खानापूर्ति ही माना जाएगा.
पाकिस्तान का दांव कैसे हुआ फेल
ईरान और अमेरिका के बीच जो शांति समझौता होना था उसका नाम रखा गया है-इस्लामाबाद मेमोरेंडम आॅफ अंडरस्टैडिंग. इसके लिए दोनों देश 19 जून को स्विटरलैंड में शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले थे. पाकिस्तान इसकी तैयारी भी कर रहा था. 15 जून को शहबाज शरीफ ने कार्यक्रमक की आधिकारिक जानकारी भी दी थी, लेकिन उससे पहले ही 17 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने डिजिटली हस्ताक्षर कर दिए. राष्ट्रपति ट्रंप ने इसके बारे में फ्रांस के वर्साय में घोषणा भी कर दी. परिणाम यह हुआ कि 19 जून का कार्यक्रम जिसे पाकिस्तान अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता था, वह पूरी तरह फेल हो गया. इस फैसले ने पाकिस्तान को असहज स्थिति में डाल दिया, जिस कार्यक्रम में वह स्वयं को केंद्र में देखने की उम्मीद कर रहा था, वह उसके बिना ही पूरा हो गया.
ट्रंप ने अंतिम समय में बदला दांव और पाकिस्तान को हुआ नुकसान
पाकिस्तान यह उम्मीद कर रहा था कि ईरान-अमेरिका समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर वह उनकी नजर में बेहतर बन जाएगा और उसकी छवि सुधरेगी. पाकिस्तान शायद यह भूल गया कि अपने अप्रत्याशित फैसलों के लिए मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप उन्हें इतनी आसानी से इतने बड़े अवसर का श्रेय नहीं लेने देंगे. हुआ भी यही. ट्रंप अंतिम समय में फैसला बदला और समय से पहले ही समझौते पर हस्ताक्षर करके यह साबित किया कि पश्चिम एशिया में शांति उनके और ईरान के प्रयासों से आ रही है. ट्रंप के इस फैसले से पाकिस्तान को बड़ा नुकसान हो गया, उसकी कूटनीति इतनी सक्षम नहीं निकली कि वह उसके वैश्विक छवि को सुधार सके. इतना ही नहीं ट्रंप ने समझौते पर हस्ताक्षर से पहले जी-7 समिट के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक तौर पर तारीफ की इससे पाकिस्तान में निराशा और बढ़ी है.
कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता कराने की पाकिस्तान की हैसियत नहीं :डाॅ धनंजय त्रिपाठी
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डाॅ धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि विश्व की राजनीति में पाकिस्तान की ऐसी हैसियत ही नहीं है कि वह कोई समझौता करवा पाए. हां, ईरान और अमेरिका के बीच जो समझौता हुआ है, उसके लिए पाकिस्तान ने जो प्रयास किए, उससे उसका डेप्लोमेटिक आइसोलेशन खत्म हुआ है. पाकिस्तान ने इस समझौते में अपनी भूमिका को हाइप देने की कोशिश की, लेकिन उसकी भूमिका तथ्यों से परे थी. यही वजह है कि उसे इस समझौते से कोई फायदा नहीं हुआ. वैसे भी वह किसी डील का मेकर नहीं हो सकता. ईरान उसपर कभी भरोसा नहीं करता था. अमेरिका का वह पिछलग्गू है, तो उसकी भूमिका अहम कैसे हो सकती है. हां, यह समझौता न्यूट्रल ग्राउंड पर हो रहा था और उसमें भागीदारी निभाकर पाकिस्तान ने अपना आइसोलेशन ब्रेक किया है, बस इतना ही है, वह कोई डील ब्रेकर तो था नहीं कि उसके बिना समझौता नहीं होता.
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