तमिलनाडु में कांग्रेस ने क्यों दिया डीएमके को गच्चा? जानिए 1971 से अबतक कैसा रहा गठबंधन…

Congress- DMK alliance : डीएमके का उदय 1967 में कांग्रेस के विरोध के साथ हुआ था, जिसने प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियों के उभार को मजबूती दी थी. करुणानिधि से एमके स्टालिन तक डीएमके और कांग्रेस के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं. तमिलनाडु की बदलती राजनीतिक स्थिति में अगर कांग्रेस ने डीएमके को गच्चा दिया है,तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है, क्योंकि दोनों पार्टियों के रिश्ते शुरू से ऐसे ही रहे हैं. इंदिरा गांधी ने भी कई बार डीएमके का दामन छोड़कर एआईएडीएमके का दामन थामा था, खासकर एमजी रामचंद्रन के युग में.

Congress- DMK alliance : तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद जो परिणाम सामने आए हैं, वो प्रदेश में बदलाव का संकेत दे रही है. इस बदलाव में जनता ने टीवीके (Tamilaga Vettri Kazhagam) के नेता विजय के हाथों में प्रदेश की कमान सौंप दी है. इस बदली हुई परिस्थिति में कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके की ओर अपना हाथ बढ़ाया और उसे सरकार बनाने में अपना समर्थन देने की बात कही है. चूंकि डीएमके और कांग्रेस का साथ बहुत पुराना है और दोनों ने एक साथ कई चुनाव भी लड़े हैं, यह सवाल लाजिमी है कि आखिर कांग्रेस ने डीएमके से ब्रेकअप क्यों किया और इनके संबंधों का इतिहास क्या है?

कांग्रेस-डीएमके गठबंधन का इतिहास

इंदिरा गांधी के साथ एम करुणानिधि

कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन काफी पुराना है. हालांकि डीएमके का उदय कांग्रेस विरोध से हुआ था, लेकिन 1967 में कांग्रेस का विरोध करने वाली डीएमके 1971 में उनके साथ गठबंधन कर चुकी थी. 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो इंदिरा गुट ने खुद को मजबूत करने के लिए डीएमके साथ समझौता किया था.उस वक्त दोनों का गठबंधन लोकसभा चुनाव और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए बना था. उस वक्त एम करुणानिधि पार्टी के सर्वेसर्वा थे.

2004 में जब बीजेपी के खिलाफ विपक्ष गोलबंद हुआ, तो यूपीए में डीएमके भी शामिल था. 2004 जब कांग्रेस की सरकार केंद्र में बनी तो डीएमके सरकार में शामिल था. यह गठबंधन 2014 तक खूब मजबूती से चला, लेकिन फिर श्रीलंका में तमिलों के मुद्दे को लेकर यह गठबंधन टूटा. उस वक्त डीएमके यह चाहती थी कि केंद्र की यूपीए सरकार तमिलों के मुद्दे पर श्रीलंका सरकार के साथ सख्ती करे, लेकिन यूपीए की सरकार ने स्थिति का सामना नरमी से किया था. 2016 में दोनों फिर साथ आए और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों साथ लड़े और प्रदेश में सरकार बनाई. स्टालिन पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने राहुल गांधी का प्रधानमंत्री के तौर पर समर्थन किया था. 10 साल बाद यह गठबंधन एक बार फिर टूट गया है.

आखिर कांग्रेस ने डीएमके का साथ क्यों छोड़ा?

लगातार 10-10 सालों के गठबंधन के बाद कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ा है. (2004 से 2014 और फिर 2016 से 2026). यहां गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस और डीएमके के बीच दरार अचानक नहीं आई है. इन दोनों पार्टियों के रिश्ते सामान्य नहीं चल रहे थे, तनातनी थी. कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी और उसके अपने हित हैं और वैसे ही राजनीति उसको करनी होती है, जबकि डीएमके एक क्षेत्रीय पार्टी है, जो सिर्फ अपने हित के लिए नीतियां बनाती हैं. उसकी राजनीति द्रविड़ आइडेंडिटी और हिंदी विरोध पर आधारित है. कई बार कांग्रेस को इस वजह से परेशानी होती है. इतना ही नहीं कांग्रेस यह चाहती है कि उसे तमिलनाडु में ज्यादा सीटें मिले, क्योंकि उसकी पहचान राष्ट्रीय है,लेकिन डीएमके हमेशा कांग्रेस पर हावी रहना चाहती है.

अब जबकि प्रदेश में राजनीति बदली है, कांग्रेस अपना हित देखते हुए टीवीके साथ जाना चाहती है. कांग्रेस भी मोदी युग में अपनी पहचान के लिए लगातार जूझ रही है, ऐसे में उसे टीवीके आशा की नई किरण के रूप में नजर आई है और उसने पाला बदलते हुए डीएमके को छोड़कर टीवीके का दामन थाम लिया है.तमिलनाडु के इंचार्ज कांग्रेस लीडर गिरीश चोडणकर ने मीडिया को दिए बयान में कहा कि यह अलायंस – जो दोनों पार्टियों के बीच आपसी सम्मान, सही हिस्सेदारी और मिली-जुली जिम्मेदारी पर बना है, वह न सिर्फ इस सरकार को बनाने के लिए है, बल्कि यह भविष्य को देखते हुए बनाया गया है. लोकल बॉडी ऑर्गनाइजेशन, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों में भी यह गठबंधन कायम रहेगा.

कई बार पहले भी टूट चुका है कांग्रेस और डीएमके गठबंधन

कांग्रेस ने जब टीवीके को समर्थन देने की घोषणा की तो डीएमके ने इसे पीठ पर छुरा घोंपने की राजनीति कहा. गौर करने वाली बात यह है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन कई बार हुआ और टूटा भी है. 1969 में जब कांग्रेस दो गुटों में टूट गई थी उस वक्त एक गुट का नेतृत्व इंदिरा गांधी कर रही थीं और दूसरा तमिलनाडु कांग्रेस के दिग्गज के कामराज के नेतृत्व में था. उस वक्त डीएमके ने 1971 के आम चुनाव के लिए इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट के साथ गठबंधन करने का फैसला किया. लेकिन एक साल बाद एम जी रामचंद्रन (MGR) के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बनने के साथ ही इंदिरा गांधी ने जल्दी ही नई पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया.

इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के आम चुनाव में, इस नए गठबंधन ने राज्य में भारी जीत हासिल की, जबकि इंदिरा केंद्र में सत्ता खो बैठीं. यह गठबंधन 1979 में टूट गया, जब एमजी रामचंद्रन ने तंजावुर में संसदीय उपचुनाव के जरिए लोकसभा में वापसी के लिए इंदिरा की कोशिश का समर्थन करने से इनकार कर दिया. 1980 में, कांग्रेस ने आम चुनाव के लिए फिर से डीएमके के साथ गठबंधन किया, लेकिन चार साल बाद फिर एआईएडीएमके के साथ वापस चली गई, जिसके साथ वह 1987 में एमजीआर के निधन तक रही. बाद में भी कांग्रेस कभी डीएमके तो कभी एआईएडीएमके साथ रही.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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