संघर्ष पानी का : सूर्योदय के साथ शुरू होती पानी की तलाश , स्कूल जाना बंद; गर्भवती होने पर भी जारी रहती है जद्दोजहद

Clean Water Crisis : जल ही जीवन है, यह एक ऐसा सच है जिसे हम बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं. हरियाणा के नूह जिले के मलाब गांव की लड़कियों और महिलाओं के जीवन पर पानी के लिए संघर्ष का जो प्रभाव पड़ता है, वह इस वाक्यांश की सच्चाई को दर्शाता है. उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और पूरा लाइफ स्टाइल पानी से होकर गुजरता है.

यह स्टोरी मूल से Asian Dispatch में 11 मई को प्रकाशित है, जिसका हिंदी अनुवाद प्रभात खबर में उनकी अनुमति से प्रकाशित किया गया है.

Clean Water Crisis : भारत में पीने का साफ पानी तमाम दावों के बावजूद एक बड़ी आबादी को उपलब्ध नहीं है. विश्वबैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की 18% आबादी भारत में रहती है, जबकि जलस्रोत विश्व का महज 4% ही उपलब्ध है. यही वजह है कि पेयजल का संकट एक बड़ी समस्या के रूप में भारत में विद्यमान है. इस बात को बखूबी समझना हो तो आप हरियाणा के नूह जिले के मालब गांव जा सकते हैं.

पानी की तलाश से शुरू होती दिनचर्या

सरकारी दावों की मानें तो हरियाणा में जल जीवन मिशन के तहत सभी ग्रामीण घरों में 100% नल से पानी आता है, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि नूह जिले के मालब में स्थानीय लोगों को पीने और दूसरे कामों के लिए साफ़ पानी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.सूर्योदय के साथ ही मालब गांव की औरतें और लड़कियां हाथों में बर्तन और बाल्टियां लेकर पानी की तलाश में निकल पड़ती हैं. दरअसल यें महिलाएं पानी लाने के लिए कुंड जाती हैं. कुंड, दरअसल ज़मीन के नीचे का पानी का टैंक, जिन्हें स्थानीय लोग कुंड कहते हैं. करीब 12,200 लोगों वाले इस गांव के लिए पीने के पानी का यह एकमात्र ज़रिया हैं. पानी में नमक होने की वजह से, ग्राउंडवाटर पीने लायक नहीं माना जाता, बावजूद इसके गांव के लोग इसपर आश्रित हैं. दूसरी ओर राज्य सरकार दावा करती है कि उन्होंने केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन -हर घर जल के तहत सभी गांव के घरों में नल के पानी के कनेक्शन दिए हैं. जबकि हमने पाया कि या तो इन नलों में पानी नहीं है या पाइपलाइन सभी घरों तक नहीं पहुंची है.

कुएं का पानी खारा हो गया है और घरों तक नल का पानी नहीं पहुंचा

घरों तक पानी नहीं पहुंचा, कुंड जाकर पानी लाती हैं महिलाएं

82 साल की शकीला सिर्फ 17 साल की थीं, जब उनकी शादी हुई और वे मालब गांव में बस गईं. वह अपने दो बेटों के साथ रहती हैं और कहती हैं कि पहले गांव में कुएं थे. पानी मीठा था, लेकिन इतने सालों में, यह खारा हो गया है. नल अभी भी हमारे घरों तक नहीं पहुंचे हैं. मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर पर बाल्टियां ढोते हुए बिताई हैं. अब मेरा सिर कमजोर हो गया है, पानी ढोना अब मुश्किल काम है. जल शक्ति मंत्रालय के तहत काम करने वाली सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड द्वारा जारी नेशनल ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, हरियाणा ग्राउंड वॉटर में नमक के मामले में तीसरे नंबर पर है. रिपोर्ट में बताया गया है कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे इलाकों में एवापोरेशन(वाष्पीकरण) की दर ज़्यादा है, जिसकी वजह से ग्राउंडवॉटर में नमक का जमाव हो जाता है. जब पानी एवापोरेट होता है, तो मिट्टी या ग्राउंडवॉटर में नमक ज़्यादा कंसंट्रेट हो जाता है, जिससे EC (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी) ज़्यादा हो जाती है, जो पीने के पानी और खेती दोनों के लिए नुकसानदेह है.

गर्भवती महिलाओं को पानी के लिए करना पड़ता है संघर्ष

गांव के लोगों का कहना है कि इन पानी के टैंकों पर अक्सर लंबी लाइन लगती है और जिस दिन टैंक में पानी नहीं बचता, उन्हें पानी लाने के लिए पास के गांवों में जाना पड़ता है, इससे थकावट, गर्मी का तनाव, बेहोशी और बार-बार डिहाइड्रेशन होता है. लोगों का यह भी कहना है कि इस कमी का सबसे ज्यादा असर छोटी लड़कियों और महिलाओं पर पड़ता है. एक गर्भवती महिला अर्शी कहती हैं कि अगर मुझे पानी पीना है, तो मुझे भारी उठाना होगा. छब्बीस साल की अर्शी सात महीने की प्रेग्नेंट है और उसे कुछ भी भारी उठाने से मना किया गया है, लेकिन वह अपने परिवार के लिए पानी लाने रोजाना अंडरग्राउंड टैंक पर आती हैं. टैंक से पानी निकालते हुए वह कहती हैं, मेरा परिवार काम पर बाहर जाता है और पानी ही सब कुछ है. अगर मुझे पानी पीना है तो मुझे ये भारी बाल्टियां उठानी पड़ती हैं.जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है और घरों में पानी की मांग बढ़ती है, महिलाओं को दिन में कई बार अंडरग्राउंड टैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा खराब असर

भारत में पिछले 50 सालों से पानी बचाने पर काम कर रहे एक एनजीओ तरुण भारत संघ (TBS) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मौलिक सिसोदिया बताते हैं कि जिस तरह गांव की महिलाएं पानी के लिए संघर्ष करती हैं इसका महिलाओं की जिंदगी पर बहुत गहरा असर पड़ता है. उनकी पूरी जिंदगी पानी की तलाश में ही निकल जाती है, कई औरतें बच्चे के जन्म से कुछ दिन पहले तक भी पानी ढोती रहती हैं, परिणाम यह होता है कि वे पीठ दर्द की समस्या से परेशान रहती हैं. इसके अतिरिक्त भी उनमें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं दिखती हैं.

लड़कियों की शिक्षा होती है बाधित

चूंकि पानी की तलाश इन इलाकों में जीवन बचाने के लिए जरूरी है, परिणाम यह होता है कि परिवार अक्सर छोटी लड़कियों को स्कूल भेजने से मना कर देते हैं क्योंकि वे पानी भरने जैसे घर के कामों में मदद करती हैं.परिणाम यह होता है कि नूंह में स्कूल छोड़ने वालों की दर पिछले कुछ सालों में और खराब हुई है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025-2026 में यह राज्य के औसत 3.05 के मुकाबले 12.84 रहा. हालांकि पानी की कमी ही स्कूल छोड़ने की बढ़ती दर का एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि पानी के लिए संघर्ष का लड़कियों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है.पानी की कमी की वजह से किशोरियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं, क्योंकि पीरियड्‌स के दौरान उन्हें साफ शौचालय नहीं मिलता, जिसकी वजह से उन्हें पैड चेंज करने में काफी दिक्कत होती है और पानी नहीं होने से सफाई भी नहीं हो पाती है.

विधानसभा में उठ चुका है मामला

एशियन डिस्पैच से बात करते हुए, नूह के विधायक आफताब अहमद ने बताया कि उन्होंने कई बार विधानसभा में इस मसले पर चिंता जताई है. लेकिन उन्होंने यह माना कि यहां पानी की सप्लाई डिमांड पूरी करने के लिए काफी नहीं है. इस समस्या को स्वीकारते हुए हरियाणा के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विनय प्रकाश चौहान ने कहा कि सरकार मलाब में अलग-अलग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है. उन्होंने कहा, हम खास तौर पर पानी की सप्लाई और सीवरेज सिस्टम के लिए अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं और हम हर व्यक्ति को 135 लीटर पानी देने के लिए एक डेडिकेटेड वॉटर बूस्टिंग स्टेशन बना रहे हैं.

अंडरग्राउंड टैंकों की साफ-सफाई बड़ी चिंता

पानी की गुणवत्ता की जांच

मलाब गांव में लोगों के लिए अंडरवाटर टैंक ही पीने के पानी का एकमात्र जरिया है, लेकिन टैंकों की सफाई नहीं होने की वजह से पानी की क्वालिटी खराब हो जाती है.गांव की एक महिला अवीदा कहती हैं, आस-पास का इलाका साफ नहीं है,हमारे मेहमान वह पानी पीने से मना कर देते हैं जिस पर हम ज़िंदा रहते हैं. वे कहते हैं ‘हम उस पानी से हाथ भी नहीं धोएंगे जो आप पीते हैं,लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है.मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन के तहत आने वाले ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स के अनुसार, पीने के पानी के लिए टोटल डिज़ॉल्व्ड सॉलिड्स (TDS) 500 mg/L से कम होना चाहिए, लेकिन यह भी कहा गया है कि कोई दूसरा सोर्स न होने पर 2,000 mg/L तक TDS मजबूरी में स्वीकार्य है. इन अंडरग्राउंड टैंकों के पानी का TDS 451 mg/L है, पीने योग्य पानी की बेहतर क्वालिटी के अंदर आता है.पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की सीनियर पब्लिक हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ सुवर्णा गोस्वामी कहती हैं, TDS आइडियली 50–150 mg/L के बीच होना चाहिए. 150–300 ठीक है, और 500 mg/L तक ज्यादा से ज्यादा स्वीकार्य है. इससे अधिक होने पर पानी की क्वालिटी खराब हो जाती है, और 1200 mg/L से ऊपर यह पीने लायक नहीं रहता.

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