सत्ता को ललकारने की पुरानी राह पर CJP, जानिए कब-कब सड़क के शोर से गूंजी संसद?

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन जंतर-मंतर से संसद मार्ग तक पहुंच गया है. हालांकि इससे पहले भी इस तरह के कई प्रदर्शन हो चुके हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि संसद मार्च को लेकर देश में क्या कानून हैं और कब-कब ऐसे बड़े मार्च हुए?

CJP Protest : महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था,

अगर सड़कें खामोश हो जाएगी, तो संसद आवारा हो जाएगी..

उनकी ये पंक्ति बताती है, भारतीय लोकतंत्र में सड़क और संसद का रिश्ता हमेशा एक जैसा नहीं रहा है. कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जो यह साबित करता है कि सड़क पर उठने वाली आवाज को, सत्ता तक पहुंचने के लिए अक्सर संसद का रास्ता चुनना पड़ता है. आज (20 जुलाई) जंतर-मंतर से संसद मार्ग तक हजारों प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में सड़क और संसद के बीच संवाद दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा.

क्या है कॉकरोच जनता पार्टी की मांग

दरअसल, 28 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुए, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन संसद तक पहुंच चुका है. CJP ने मानसून सत्र-2026 के पहले दिन (20 जुलाई)) को जंतर-मंतर से संसद तक मार्च का ऐलान किया था, प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं मिलने के बाद भी प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं. बता दें कि कॉकरोच जनता पार्टी इन मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है.

ये मुद्दे है...

  1. नीट परीक्षा में धांधली, पेपर लीक मामले और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच की जाए
  2. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया जाए
  3. बेरोजगारी, सरकारी भर्ती परीक्षाओं के परिणामों में देरी और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों की जवाबदेही तय की जाए
  4. सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को रिहा किया जाए
  5. NEET-UG 2026 की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के परिवारों को एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए

सड़क से सत्ता तक पहुंचने की रही है पुरानी परंपरा

गौरतलब है कि संसद मार्च के जरिए सरकार तक अपनी बात पहुंचाना, भारत में कोई नई परंपरा नहीं है. आजादी के बाद अलग-अलग समय में  विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और किसान संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर संसद की ओर मार्च किए हैं.

7 नवंबर 1966 - गौ हत्या-निषेध आंदोलन

गौहत्या प्रतिबंध को लेकर देशभर के साधु-संतों और गौ भक्तों ने संसद भवन के बाहर प्रदर्शन किया था. 7 नवंबर 1966 को हुआ इस प्रदर्शन का उद्देश्य गौ हत्या-निषेध कानून की मांग थी. इस आंदोलन का नेतृत्व सर्वदलीय गौरक्षा महाभियान समिति द्वारा की गई थी, जिसमें स्वामी करपात्री जी महाराज, विभिन्न शंकराचार्य तथा कई सामाजिक-धार्मिक संगठन के लोग शामिल हुए थे. प्रदर्शन के दौरान भीड़ के एक हिस्से द्वारा संसद की ओर बढ़ने, पथराव और आगजनी के बाद स्थिति हिंसक हो गई. इसके बाद पुलिस ने पहले लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग भी किया.

बेकाबू और हिंसक भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने गोलीबारी भी की. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस घटना में एक पुलिसकर्मी सहित 8 लोगों की मृत्यु हुई और अनेक लोग घायल हुए. हालांकि, आंदोलनकारी संगठनों का दावा है कि मृतकों की संख्या इससे कहीं थी.

6 मार्च 1975 - संपूर्ण क्रांति का जनता मार्च (संसद मार्च)

बात उन दिनों की है जब बिहार में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ आंदोलन चल रहा था. आंदोलन के मुख्य नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) द्वारा भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी तथा इंदिरा गांधी सरकार की नीतियों के विरोध में 'संपूर्ण क्रांति' का संदेश दिया जा रहा.

बिहार में 1974 से चल रहे छात्र-जेपी आंदोलन के राष्ट्रीय विस्तार के रूप में, 6 मार्च 1975 को जेपी के नेतृत्व में लाल किले से संसद भवन तक 'जनता मार्च' निकाला गया.

इस मार्च में विभिन्न विपक्षी दलों के नेता और लाखों समर्थक शामिल हुए. यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण एवं अनुशासित रहा. इसी आंदोलन के बाद, विपक्षी दलों की एकता को मजबूत कर जनता पार्टी के गठन किया गया था.

23 दिसंबर 1978 - चौधरी चरण सिंह का किसान मार्च

23 दिसंबर 1978 को चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में विशाल किसान मार्च आयोजित किया गया. यह उस समय तक राजधानी में किसानों का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन था. इस रैली का आयोजन जनता पार्टी सरकार से मतभेदों के बाद ग्रामीण भारत और किसानों की राजनीतिक शक्ति प्रदर्शित करने के उद्देश्य से किया गया था. इस रैली में उत्तर भारत के सभी राज्यों से बड़ी संख्या में किसान शामिल हुए. उनकी मांग, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर उद्योगों को राष्ट्रीय विकास के साथ जोड़ना था.

बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का बोट क्लब किसान आंदोलन

भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में अक्टूबर 1988 में दिल्ली के बोट क्लब पर विशाल किसान आंदोलन आयोजित किया था. यह आंदोलन गन्ने का उचित मूल्य, बिजली-पानी की दरों में राहत, कृषि ऋण से जुड़ी समस्याओं का समाधान तथा अन्य कृषि संबंधी मांगें को लेकर था. देश के कई राज्यों से बड़ी संख्या में किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दिल्ली पहुंचे और कई दिनों तक बोट क्लब क्षेत्र में डेरा डाले रहे. अंत में केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच वार्ता हुई, उसके बाद किसानों की कई मांगों पर सहमति बनने के बाद आंदोलन समाप्त हुआ.

वामपंथी दलों का पीपल्स मार्च (2006 एवं 2013)

2006 और 2013 में वामपंथी दलों CPI(M), CPI, AIFB और RSP के नेतृत्व में नई दिल्ली में पीपल्स मार्च का आयोजन किया गया था. इस आंदोलनों का उद्देश्य बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को मजबूत करने तथा सभी नागरिकों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाया था. देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में किसान, मजदूर, महिलाएं और श्रमिक दिल्ली पहुंचे. मार्च रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक निकाला गया. इन आंदोलनों ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (National Food Security Act) पर सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

किसान आंदोलन एवं संसद कूच (2020–2021)

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्व में किसानों ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में लंबा आंदोलन चलाया. उनकी प्रमुख मांगें थी कि सरकार तीनों कृषि कानूनों..

  • पहला कानून (खुला बाजार): किसान सरकारी मंडी (APMC) के बाहर किसी भी राज्य या व्यापारी को सीधे फसल बेच सकते थे.
  • दूसरा कानून (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग): किसान फसल बोने से पहले ही कंपनियों के साथ फसल की कीमत और बिक्री का लिखित समझौता कर सकते थे.
  • तीसरा कानून (जमाखोरी की छूट): अनाज, दाल, आलू और प्याज जैसी जरूरी चीजों के भंडारण (स्टॉक) की सीमा खत्म कर दी गई थी.

..को निरस्त करे तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर कानून बनाए. आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर किसानों ने लंबे समय तक धरना दिया. इस दौरान किसानों ने कई अवसरों पर दिल्ली की ओर मार्च और विरोध प्रदर्शन किए तथा जंतर-मंतर पर किसान संसद आयोजित की,

2023 - महिला पहलवानों का संसद मार्च

भारतीय महिला पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग को लेकर आंदोलन किया. इस आंदोलन का नेतृत्व विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया सहित कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवानों ने किया.

28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दिन पहलवानों ने संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया.

पुलिस ने उन्हें रोकते हुए हिरासत में लिया और बाद में धरना स्थल खाली कराया. इस घटना ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया.

संसद मार्च क्यों..क्या संविधान देती है इसकी अनुमति

संसद देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था है. जहां जनता और सरकार से जुड़े सभी फैसले लिए जाते है. इसलिए जब लोगों को लगता है कि उनकी मांगें और समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो वो संसद की ओर मार्च करते हैं. आसान भाषा में कहें तो संसद मार्च का अर्थ लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों और समस्याओं को सरकार तथा जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाना होता है. ऐसा करने के लिए भारतीय संविधान अपने नागरिकों को अधिकार देता है.

संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 19(1)(c) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण एवं निरस्त सभा करने तथा संगठन बनाने का अधिकार है. लेकिन ये भी प्रावधान है कि सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा संप्रभुता के हित में अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि विरोध का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करने या आम जनजीवन को पूरी तरह बाधित करने का अधिकार नहीं है.

संसद मार्च का बदलता स्वरूप

संविधान के अनुसार प्रदर्शन कर रहे लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार है. लेकिन समय के साथ साथ इसमें कई सारे बदलाव देखने को आया है. एक समय तक इस प्रकार का प्रदर्शन  मुख्य रूप से राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित किए जाते थे, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ गया है. मौजूदा समय में किसान संगठनों, छात्र संगठनों, कर्मचारी संघों और नागरिक समूहों की भागीदारी भी बढ़ी है. इसके साथ-साथ इस तरह के आंदोलन में  महिलाओं और युवाओं की मौजूदगी भी पहले की तुलना में अधिक देखने को मिलती है.

संसद मार्च को लेकर क्या है कानूनी नियम

संसद भवन देश का सबसे संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र होता है, इसलिए इसके आसपास किसी प्रकार के प्रदर्शन और ऐसे मार्च को लेकर सख्त नियम लागू होता है,

संसद भवन के पास बिना अनुमति प्रदर्शन, नारेबाजी या बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने की अनुमति पहले से किसी को नहीं होती.दिल्ली पुलिस के नियमों के अनुसार किसी भी मार्च या रैली के लिए पहले से अनुमति लेना जरूरी होता है. अनुमति मिलने पर भी आयोजकों को तय शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है.

यदि पुलिस को लगता है इस प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था, सुरक्षा या संसद की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है, तो पुलिस अनुमति देने से इनकार कर सकती है. इसके साथ-साथ सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन समय-समय पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पहले धारा 144) लागू कर सकता है.

कुल मिलाकर, कॉकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च भी उसी लोकतांत्रिक परंपरा की एक नई कड़ी है, अब देखना होगा कि यह प्रदर्शन सरकार और संसद में कितनी राजनीतिक और नीतिगत हलचल पैदा कर, सड़क और संसद के बीच की दूरी को कम कर पाता है.

ये भी पढ़ें : संसद मार्च के लिए CJP ने क्यों चुनी 20 जुलाई की तारीख, जानिए मानसून सत्र को लेकर क्या है रणनीति?


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

गौतम कुमार वर्तमान में प्रभात खबर से जुड़े पत्रकार हैं. वे राजनीति, इतिहास, साहित्य, खेल, कानून, लोक संस्कृति और मनोरंजन जैसे विविध विषयों पर लिखते हैं. किसी विषय पर रिपोर्टिंग या लेखन के दौरान उनका जोर केवल घटनाओं की जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पृष्ठभूमि, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और उसके प्रभाव को समझाने पर रहता है.

अपने पत्रकारिता करियर में गौतम कुमार ने RealisticMedia और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. पत्रकारिता के अलावा उन्हें डिजिटल कंटेंट लेखन, वीडियो स्क्रिप्टिंग और डिजिटल प्रोडक्शन का अनुभव भी है. स्वतंत्र लेखक और ब्लॉगर के तौर पर उन्होंने अलग-अलग विषयों और डिजिटल माध्यमों के लिए लेखन किया है.

किताबों, फिल्मों और कहानियों में उनकी विशेष रुचि है. वे मानते हैं कि अच्छी किताब या अच्छी फिल्म मिलने के बाद बाकी दुनिया कुछ देर इंतजार कर सकती है. यही रुचि उनके लेखन में भी दिखाई देती है, जहां वे खबर और घटनाओं के पीछे छिपी कहानी को समझने और पाठकों के सामने उसे सरल और संदर्भपूर्ण तरीके से रखने की कोशिश करते हैं.

गौतम कुमार मानते हैं कि किसी विषय पर राय अलग हो सकती है और नजरिया भी अलग हो सकता है, लेकिन सार्थक संवाद की शुरुआत इन्हीं अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने से होती है. इसलिए पाठकों की राय, सुझाव और विचार उनके लिए महत्वपूर्ण हैं. उनसे सोशल मीडिया के माध्यम से भी जुड़ा जा सकता है.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >