जेन जी गर्ल्स गढ़ रहीं समाज की नई परिभाषा

जंतर मंतर पर युवाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान अमर्यादित भाषा का प्रयोग चर्चा का विषय बन गया है. क्या यह बदलती सामाजिक सोच का प्रतीक है? लेख इस बदलते परिदृश्य का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है.

-विजय शंकर चतुर्वेदी-

दिल्ली के जंतर मंतर पर पेपर लीक मुद्दे पर आयोजित युवाओं के आंदोलन , लाठी चार्ज और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर यहां बात नहीं हो रही, यहां सिर्फ विषय है वे लड़कियां जो विरोध के स्वर मुखर करने पर गाली गलौज पर उतर आईं. पूरा देश इस बदलते परिवेश को देखकर हतप्रभ है. लोगों ने कहा कि इनको शिक्षा से ज्यादा संस्कार की जरूरत है. कुछ लोगों ने पुलिस कार्रवाई के परिपेक्ष में इसे सिर्फ जायज ही नहीं ठहराया बल्कि अभी इसे कम बताया , कुछ ने इसे यूथ का अनफिल्टर्ड व्यवहार बताया . बहाना भले ही जंतर मंतर के आंदोलन में प्रतिरोध दर्ज करने का हो, लेकिन जिस तरह से लड़कियों ने असंसदीय शब्दों, वक्तव्यों और सामाजिक रूप से वर्जित शब्दों का खुलकर बेबाकी के साथ प्रयोग किया वो बदलते भारत की तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है.

आश्चर्य तो इस बात का है कि उन लड़कियों से ज्यादा उनके अभिभावक और प्रबुद्ध लोग भी चटकारे लेते दिखे . यह भी तर्क सामने आया कि पुरुषवादी सोच की थीं गालियाँ, अब स्त्रियों ने अपना लिया तो क्यों मिर्ची लग रही है . ओटीटी प्लेटफार्फ से लेकर सभी हिट वेब सीरीज गालियों से भरी पड़ी हैं, परिवार के साथ देखने पर कोई दिक्कत नहीं, फिर यहां क्यों बुरा लगने लगा ? फिल्मों और वेब सीरीज में गालियों पर रोक न लगाना एक तरह से उन्हें सामाजिक मान्यता देना है, उन फिल्मों को या वेब सीरीजों को देखकर जब हमें आनंद आता है तो एक तरह से गालियों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है और उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती है.

कुछ प्रदर्शनकारी लड़कियों ने न सिर्फ अमर्यादित टिप्पणियां की बल्कि उसके पोस्टर भी बनाए, सोशल मीडिया पर भी खूब पोस्टिंग की, इक्का दुक्का तो यह आचरण देखा सुना गया है लेकिन सार्वजनिक स्तर पर यह पहली बार देखने को मिला . आंदोलन के फ्रेम में इसे देखने की जरूरत नहीं, आंदोलन एक अलग मुद्दा है लेकिन आंदोलन का सहयोगी बनकर संसदीय भाषा , पोस्टर, मीम्स, रील में गंदगी फैलाना कहां तक सही है, यह बात समझ में नहीं आई. सरकार का विरोध किया जा सकता है, वह लोकतांत्रिक अधिकार में आता है, नीतियों का भी विरोध हो सकता है, लेकिन अपनी संस्कृति, मर्यादा का विरोध कहां तक उचित है, विचारणीय है.

अपने को प्रगतिशील कहलाने वाले लोगों ने लड़कियों की जमकर तारीफदारी करते हुए कहा कि जिस तरह से पुलिस कर्मियों ने लड़कियों के कपड़े फाड़े, लाठी चलाई उनके नाजुक अंगों पर प्रहार किया उसके सापेक्ष में तो लड़कियों ने कुछ नहीं किया . यदि वे गाली न देतीं तो क्या करतीं . कुछ लोगों ने लड़कियों के इस कदम के लिए राजनैतिक पार्टी के नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि इन्हीं नेताओं से इन बच्चियों ने सीखा है, क्योंकि नेता जब माइक पर खड़े हो जाते हैं और उन्हें किसी महिला नेत्री का विरोध करना होता है तो वे भूल जाते हैं कि मंच पर खड़े हैं, और निम्नस्तरीय वक्तव्य जारी कर देते हैं, कुछ तो स्त्रियों पर कुठाराघात करते करते धर्म में प्रतिष्ठित देवियों को भी नहीं बख्शते. युवतियों की सोच बदली है, अब वो पहले से ज्यादा तार्किक और मुखर हुई हैं, वे कहती हैं वे अपने शरीर की खुद मालिक हैं, जैसे चाहें कपड़े पहनें या जिस भी जीवन शैली को अपनाएं, दूसरे से क्या मतलब ?

लेकिन जिस तरह से जंतर मंतर पर लड़कियों ने यौनांगो से जोड़कर नारे गढ़े, मासिक धर्म से जोड़कर राजनैतिक टिप्पणियां की, उससे लोग हतप्रभ रह गए. क्योंकि सामान्य बातचीत में भी ऐसी बातें नहीं होतीं. वहां तो आलम ही दूसरा था, सिर्फ भीड़ या झुंड के सामने ही नहीं कैमरे के सामने भी लड़कियों को अपशब्द, गाली, अश्लील टिप्पणी करने में कोई झिझक नहीं थी. लड़कियां तो लड़कियां, इसमें छोटे घर या बड़े घर की लड़कियां मुद्दा ही नहीं, वहां अफसरों, राजनेताओं , व्यवसायियों सहित हर तबके की लड़कियां पहुंची हुई थीं. कुछ लोगों ने टिप्पणी किया कि इन लड़कियों के अभिभावकों ने उन्हें समुचित संस्कार नहीं दिए, उन्हें शिक्षा, रोजगार से ज्यादा संस्कार की जरूरत है, लेकिन लड़कियों को इन टिप्पणियों से कोई फर्क नहीं पड़ता, वे इसे पुरुषवादी मानसिकता और पिछड़ेपन की सोच मानती हैं, उन्हें अपने किए में कोई बुराई नहीं मानती .

अब आते हैं देश और उसकी संस्कृति पर, एक बार स्वामी विवेकानंद से पूछा गया कि भारतीय नारी कैसी होनी चाहिए, उसका क्या स्वरूप होना चाहिए ? उन्होंने जवाब दिया कि - ' भारत की नारी के पास जापान और अमेरिका की तरह ज्ञान और तकनीकीबोध हो, लेकिन उसका आचरण और परिवेश भारतीय होना चाहिए '. यदि हम आज के परिवेश का आकलन करें तो जिसे हम आधुनिकता, प्रगतिशीलता , मुखरता कहते हैं वह कहीं न कहीं स्वेच्छाचारिता से भी जुड़ जा रही है और हमारी सभ्यता, संस्कृति सब उसकी जद में आ जा रहे हैं, उससे बड़ा आश्चर्य यह है कि हम मौन और मूकदर्शक बने हुए हैं. देश में शर्म, हया, लाज इत्यादि शब्दों ने दिल्ली की सड़कों पर दम तोड़ा, यद्यपि ये लड़कियां समूची युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, लेकिन इनको देखकर समाज की दिशा का आभास तो होता ही है. एकता कपूर की वेब सीरीज को भी झुठलाती जेन जी एक नई स्क्रिप्ट लिख रही है. यदि इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यह विरोध का अतिरेक है, अंतिम पड़ाव है , जब ऐसा आभास होने लगे कि सामने वाला सुन नहीं रहा या जानबूझकर अनसुना कर रहा तो यह अपरिहार्य हो जाता है. देश बदल नहीं रहा, बदल चुका है.

एक विद्वान व्यक्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा कि - ' आज जब किसी लड़की को मर्दों को गाली या मर्दों के सामने गाली देता देखता हूं तो उसके आत्मविश्वास पर गर्व करता हूं, इस विषय पर लड़कियों को उपदेश देकर मैं उनके आत्मविश्वास को कमजोर नहीं कर सकता, अभी तो वो चलना और खड़े होना सीख रही हैं, क्या अच्छा है उनके लिए और क्या बुरा, वो खुद सीख जाएंगी '


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