Iran War : ईरान और इस्राइल-अमेरिका युद्ध का एक महीना पूरा हो चुका है. बीते महीने जब ईरान पर हमला हुआ था, तब लगा नहीं था कि यह युद्ध इतना समय लेगा. युद्ध के लंबा खिंच जाने के दो कारण हैं. एक, यह अमेरिका-ईरान का पहला युद्ध नहीं है. दोनों के बीच छोटे-छोटे युद्ध होते रहे हैं. वर्ष 1953 से ही अमेरिका और ईरान के बीच तकरार चलती आ रही है. वर्ष 1953 में अमेरिका ने ईरान की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया था. फिर 1979 में खुमैनी ने ईरान की सत्ता संभाली और ईरान को इस्लामी राष्ट्र बनाया. खुमैनी के सत्ता संभालने के बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमला करने की कोशिश की थी, परंतु उनके सारे विमान रेगिस्तान में धराशायी हो गये थे.
अमेरिका में जब-जब सरकार बदलती है, तब-तब ईरान को लेकर उसके रवैये में बदलाव दिखाई देता है. जैसे, जब अमेरिका में डेमोक्रेटिक सरकार थी, तब ईरान और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे ‘जेसीपीओए’ कहते हैं. उस समझौते के तहत ईरान ने यह प्रतिबद्धता जतायी थी कि वह परमाणु हथियार नहीं बनायेगा, और बदले में अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधों को क्रमिक रूप से समाप्त करेगा. पर इसके बाद जब डोनाल्ड ट्रंप (पहले कार्यकाल में) राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने यह कहते हुए वह समझौता रद्द कर दिया कि उन्हें ईरान पर विश्वास नहीं है.
कहने का अर्थ है कि थोड़े-थोड़े अंतराल पर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होते रहे हैं. सो, ईरान वर्षों से अमेरिका के रवैये को देखता आ रहा है और उसने उसी के अनुरूप अमेरिका से निपटने की तैयारी भी कर रखी है. दूसरी बात, ईरान ने यह भी देखा है कि पश्चिम एशिया के दूसरे देशों पर अमेरिका ने किस तरीके से हमला बोला है, वहां नुकसान पहुंचाया और वहां की सरकारें बदल दीं. युद्ध और तख्तापलट के पश्चात पश्चिम एशिया के देशों का जो हाल हुआ है, वह भी ईरान से छिपा हुआ नहीं है. इन सबको देखते-समझते हुए ईरान ने अमेरिका से युद्ध करने का तरीका बनाया और इसे मोजैक ऑपरेशन नाम दिया. एक और बात. इस्राइल और अमेरिका जानते हैं कि ईरान में कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है.
ऐसे में उन्होंने सोचा होगा कि ईरान के नेतृत्व को समाप्त कर वे इस युद्ध को जीत जायेंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. वहां की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आइआरजीसी) की जो इकाइयां है, वे सेना से स्वंतत्र हैं, और वे केवल इस्लामी धार्मिक नेताओं के आदेश ही मानती हैं. ऐसे में खामेनेई ने अपने जीवनकाल में जो आदेश दिये होंगे, वे उनके न रहने पर भी आइआरजीसी मानेगी. ऐसे में कहा जा सकता है कि ट्रंप ने यहां की इस व्यवस्था को सही तरीके से नहीं समझा, और यदि समझा भी, तो उसे बहुत हल्के में लिया.
सच तो यह है कि ट्रंप ने यह सोचकर ईरान पर हमला किया कि वह इराक, लीबिया या सीरिया में मिली सफलता को यहां दोहरा लेंगे और धीरे-धीरे ईरान में ऐसी सरकार का गठन करेंगे, जो अमेरिका की समर्थक हो. फिर तो ईरान की सत्ता पर उनकी पूरी पकड़ रहेगी. और जिस तरह वेनेजुएला का तेल उनके नियंत्रण में आ गया है, वैसे ही ईरान के तेल पर भी उनका नियंत्रण हो जायेगा. इस तरह वह लगभग पूरी दुनिया पर राज कर पायेंगे. दरअसल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही अमेरिका की मंशा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया पर राज करने की रही है. इसके तहत अमेरिका की कोशिश रही है कि डॉलर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनी रहे और दुनिया के देश उससे कर्ज मांगें, चाहे वे प्रत्यक्ष रूप से हो या फिर विश्व बैंक जैसे संस्थानों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से. और वे अपने कर्जदार देशों पर अपनी शर्तें थोपें. ट्रंप भी उसी राह पर चल रहे हैं.
एक महीना बाद भी समझ में नहीं आ रहा है कि युद्ध को लेकर बातचीत किस दिशा में बढ़ रही है. हालांकि अमेरिका ने सीजफायर की अवधि पांच से बढ़ाकर दस दिन कर दी है. जब सीजफायर की अवधि बढ़ती है, तो युद्ध के भीषण होने की आशंका कम हो जाती है. यहां भी बहुत संभव है कि सीजफायर के बावजूद अभी जिस तरीके से हमले हो रहे हैं, उसी तरीके से होते रहें, और फिर एक-दो महीने के बाद दोनों देशों के बीच समझौता हो जाये, जिसमें ईरान की कुछ बातें अमेरिका मान जाये और कुछ बातें अमेरिका की ईरान मान जाये.
ऐसे में इस युद्ध के समाप्त होने में अभी थोड़ा समय और लगेगा. रही बात ट्रंप के विरोधाभासी बयानों की, तो यह सौदेबाजी करने का उनका तरीका है कि पहले किसी देश पर अधिकतम दबाव बनाओ और फिर सोचो कि क्या करना है. ईरान का भी ऐसा ही रवैया रहा है कि पहले उच्च दर्जे का प्रतिरोध जताओ और फिर बाद में देखो कि क्या हो सकता है. ट्रंप की तीन प्राथमिकताएं हैं. पहला, दुनिया के तेल पर उनका नियंत्रण बना रहे. वह निर्णय करें कि किस देश का तेल खरीदना है और किसका नहीं तथा होर्मुज से तेल के जहाज निकलेंगे या नहीं. दूसरा मामला शेयर बाजार का है.
शेयर बाजार जिस तरह से ऊपर-नीचे जा रहा है, वह ट्रंप को परेशान कर रहा है, क्योंकि वह नहीं चाहते कि उनके सलाहकारों का कोई नुकसान हो. तो ट्रंप जो विरोधाभासी बयान दे रहे हैं, स्टॉक मार्केट के हेर-फेर में उसकी भी भूमिका है. तीसरी बात, अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं और ट्रंप की लोकप्रियता गिरती जा रही है. इसका दबाव भी ट्रंप पर है. उन्हें डर है कि मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) को मानने वाले उनके समर्थक, कहीं उनसे दूर न चले जायें. यदि उन्हें यह लगेगा कि उनका मागा बेस खिसक रहा है, तो वह युद्ध समाप्त करने की कोशिश करेंगे.
जहां तक इस युद्ध में भारत के मध्यस्थता करने या कूटनीतिक हस्तक्षेप की बात है, तो अभी मौका नहीं है. यदि आगे ऐसा कोई अवसर आता है, तो भारत को मध्यस्थता के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि वह ब्रिक्स का अध्यक्ष है. हां, भारत यह कर सकता है कि यदि ईरान भारत से युद्ध में हस्तक्षेप करने की बात करता है, तो भारत ब्रिक्स के सदस्यों, खाड़ी के देशों, होर्मुज पर निर्भर एशिया के देशों और अमेरिका व इस्राइल के साथ इस बात की चर्चा करे. जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर आदि एशिया के उन देशों को भी, जो होर्मुज पर बहुत अधिक निर्भर हैं, अमेरिका से बात करनी चाहिए कि इस युद्ध में हमारा नुकसान हो रहा है, इसलिए इस युद्ध को समाप्त किया जाना चाहिए. यहां ईरान का भी ध्यान रखना होगा कि थोड़े-थोड़े समय की शांति के बाद ईरान पर जो हमले होते रहते हैं, वे पूरी तरह बंद हों.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
