भारतीयता के अप्रतिम प्रवक्ता थे विद्यानिवास मिश्र

Vidyanivaas Mishra: हिदी-संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबंधकार, भाषाविद और चिंतक डॉ विद्यानिवास मिश्र का यह जन्मशताब्दी वर्ष है. अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए विद्यानिवास जी को भारत सरकार ने 1988 में प‌द्मश्री , भारतीय ज्ञानपीठ ने 1990 में मूर्तिदेवी पुरस्कार और केके बिड़ला फाउंडेशन ने शंकर पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. वह साहित्य अकादेमी के कार्यकारी मंडल के वर्षों सदस्य रहे और संस्कृत भाषा सलाहकार मंडल के संयोजक का भी दायित्व संभालते रहे. उनकी प्रकाशित कृतियों की संख्या 70 से अधिक है.

Vidyanivaas Mishra: हिदी-संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबंधकार, भाषाविद और चिंतक डॉ विद्यानिवास मिश्र का यह जन्मशताब्दी वर्ष है. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पकड़डीहा गांव में 28 जनवरी, 1926 को हुआ था. हालांकि कुछ जगह उनकी जन्म की तारीख 14 जनवरी बतायी जाती है. वर्ष 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन में स्व राहुल सांकृत्यायन के निर्देशन में उन्होंने कोश कार्य किया और उसके बाद उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग से जुड़े रहे. वर्ष 1957 में विश्वविद्यालयी सेवा में आने पर उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालय में संस्कृत और भाषाविज्ञान का अध्यापन भी किया. उसके बाद वह कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ, आगरा के निदेशक (1977-86), काशी विद्यापीठ एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति और ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक भी रहे.

उनका साहित्यिक व्यक्तित्व ज्ञान-विज्ञान, समाज-संस्कृति, साहित्य कला की आधुनिक चेतना से संबद्ध रहा. संस्कृत भाषा के साथ हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के मर्मज्ञ विद्यानिवास जी अनेक संस्थाओं में सम्मानित सदस्य के तौर पर भी रहे और हिंदी मासिक ‘साहित्य अमृत’ के संपादन कार्य से आजीवन जुड़े रहे. वे समाज-संस्कृति, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और साहित्य कला के प्रखर विद्वान थे. उनके निबंधों में विश्रुत लोक परंपरा और जातीय संस्कार के विशुद्ध दर्शन मिलते हैं. उनकी ख्याति भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, साहित्य तथा भाषा के प्रकांड पंडित के रूप में रही. भारतीय लोक जीवन और लोक संस्कृति को गहराई से समझने के कारण उनके निबंधों में जहां गहरी विद्वत्ता दिखाई देती है, वहीं भारतीय संस्कृति के दर्शन भी होते हैं. ललित निबंध की परंपरा में वह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय के साथ मिलकर त्रयी रचते हैं. अपने व्यक्तिव्यंजक निबंधों के माध्यम से डॉ मिश्र ने मनुष्य की विभिन्न मानसिक स्थितियों की व्यंजना करते हुए लौकिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्थितियों का आकलन और सहृदय के मन में उठने वाले उद्वेलन का प्रभावशाली अंकन किया है. उनके प्रमुख निबंध संग्रहों में ‘छितवन की छांह’, ‘आंगन का पंछी और बनजारा मन’, ‘तुम चंदन हम पानी’, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’, ‘अंगद की नियति’, ‘तमाल के झरोखे से’ आदि हैं. उनके पुराविद्या विषयक भी अनेक ग्रंथ प्रकाशित हैं. उनके ललित निबंध ‘राम का मुकुट भीग रहा है’ को धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’ का कवर बनाया था.

वह भारतीयता के अद्वितीय प्रवक्ता रहे. अज्ञेय ने उनके बारे में लिखा था, ‘पश्चिम के साहित्य और संस्कृतियों से गहरे परिचय ने विद्यानिवास मिश्र को आतंकित नहीं किया है, बल्कि उनकी भारतीयता को और पुष्ट किया है.’ हिंदी-संस्कृत के उद्भट विद्वान वागीश शुक्ल के मुताबिक, ‘विद्यानिवास मिश्र हिंदी साहित्य की संभवत: अकेली आवाज थे, जिसमें ग्राम जीवन हजारों वर्षों के भारतीय नैरंतर्य को अपनी बोली-बानी और रहन-सहन में सुरक्षित रखे हुए था’. आधुनिक जीवन से प्रगाढ़ परिचय, अगाध शास्त्रीय पांडित्य और पश्चिमी जगत से निरंतर सार्थक संवाद के बावजूद उनकी यह अपराजेयता इसी नैरंतर्य में मौजूद थी. संवाद में दृढ़ता उनके लेखन का एक विशेष गुण रहा है. कवि-चिंतक अशोक वाजपेयी के मुताबिक, ‘हर आलोचक विद्वान हो जरूरी नहीं है. लेकिन विद्यानिवास जी आलोचक-विद्वान थे. उन्होंने रामायण, महाभारत, कालिदास, गीत-गोविंद आदि पर जो पुस्तकें लिखी हैं, उनमें आलोचना-विद्वत्ता-रसिकता का सहज साहचर्य है. उनसे यह बात बार-बार सत्यापित और स्थापित होती है कि सच्ची और गहरी आधुनिकता परंपरा के साथ निरंतर संवाद से ही संभव व सार्थक होती है. वह आधुनिकता से अनातंकित थे, तो परंपरा के जड़ रूपों से भी दूर रहते थे. वह दोनों के बीच तनाव को भलीभांति समझते थे, पर उनके बीच कई स्तरों पर सर्जनात्मक और वैचारिक निरंतरता भी देख-समझ-खोज पाते थे.’

अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए विद्यानिवास जी को भारत सरकार ने 1988 में प‌द्मश्री , भारतीय ज्ञानपीठ ने 1990 में मूर्तिदेवी पुरस्कार और केके बिड़ला फाउंडेशन ने शंकर पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. वह साहित्य अकादेमी के कार्यकारी मंडल के वर्षों सदस्य रहे और संस्कृत भाषा सलाहकार मंडल के संयोजक का भी दायित्व संभालते रहे. उनकी प्रकाशित कृतियों की संख्या 70 से अधिक है. चौदह फरवरी, 2005 को उत्तर प्रदेश में एक दुर्घटना में उनका देहावसान हो गया. इससे दुखी होकर ‘लोकमत समाचार’ के तत्कालीन संपादक अच्युतानंद मिश्र ने 15 फरवरी, 2005 के संस्करण में ‘बाबूजी कहां गइलें’ शीर्षक से अपना संपादकीय लिखा था. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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