पश्चिम एशिया में अमेरिकी आक्रामकता एक बार फिर ईरान पर ताबड़तोड़ हमले में दिख रही है. अमेरिकी हमले से बंदर अब्बास में भारी तबाही हुई है. और ट्रंप कह रहे हैं कि सबसे बड़ा हमला अभी बाकी है. इन हमलों से कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने ईरान पर लगाये प्रतिबंधों को और कड़ा करते हुए उसके साथ व्यापार करने वाली कंपनियों और लोगों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया है. इन प्रतिबंधों के जरिये अमेरिका यह कहने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका जो कर रहा है उसे पूरी दुनिया चुपचाप माने. जो कंपनी या लोग उसकी बात नहीं मानेंगे, उनके ऊपर वह सेकेंडरी प्रतिबंध लगा देगा.
दूसरे शब्दों में कहें, तो शीतयुद्ध के समाप्त होने के बाद से वैश्वीकरण का जो दौर शुरू हुआ था, उसी का यह दूसरा चरण है, जिसमें देशों के साथ-साथ लोगों और कंपनियों को भी प्रतिबंध के दायरे में ले लिया गया है. अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों व कुछ भारतीय नागरिकों पर भी प्रतिबंध लगाये हैं, पर वे कंपनियां और लोग अभी सरकार से मदद मांगने नहीं आये हैं. यदि वे भारत सरकार से मदद मांगने आते हैं, तब सरकार को कदम उठाना होगा. अभी तो सरकार का रुख है कि यह कंपनियों का अपना निजी मामला है, तो वही तय करें कि उन्हें क्या करना है. पर यदि सीधे तौर पर भारत पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तब उसका सरकार जवाब देगी. जहां तक भारत-अमेरिका संबंध पर इस प्रतिबंध के प्रभाव का प्रश्न है, तो वर्तमान में ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. आगे क्या होगा, इस पर नजर रखनी होगी. दरअसल, ईरान पर हमले के दौरान अमेरिका की सोच यह थी कि यदि वह ईरान के नेतृत्व को समाप्त कर देता है, तो वेनेजुएला की ही तरह ईरान में भी सत्ता बदल जायेगी और अमेरिकी समर्थक व्यक्ति को वह ईरान की सत्ता पर बैठा देगा.
अमेरिका ने जिस तरीके से ईरान पर हमला किया और ईरान ने जिस तरह उसका प्रत्युत्तर दिया है, उससे ईरान के भीतर राष्ट्रवादी भावनाओं को और उभरने का मौका मिला है. इस कारण जो सफलता अमेरिका चाह रहा था, वह उसे नहीं मिल पायी. इससे ट्रंप बौखला गये हैं. उनकी बौखलाहट का कारण अमेरिका में होनेवाला चुनाव भी है. चूंकि ट्रंप यह चुनाव हर हाल में जीतना चाहते हैं, इसलिए वह हरसंभव वैसे कदम उठा रहे हैं, जिससे लोगों के बीच उनकी छवि अच्छी बन जाये. यह तो सर्वविदित है कि अमेरिका पर इस युद्ध का काफी विपरीत आर्थिक प्रभाव पड़ रहा है, महंगाई के साथ-साथ वहां बेरोजगारी भी बढ़ी है, जो लोगों को परेशान कर रही है. ट्रंप के लिए ऐसी स्थिति का सामना करना मुश्किल हो रहा है, सो वह अपने लोगों को यह बताना चाहते हैं कि अमेरिका की जीत हो रही है और पूरी दुनिया में उसकी बात मानी जा रही है. उधर इस्राइल अमेरिका की सुन नहीं रहा है, इससे अमेरिका की किरकिरी हो रही है. तीसरी बात, ईरान ने होर्मुज में तो अवरोध पैदा किया ही है, उसकी मंशा बाब-अल-मंडाब में भी हूतियों के माध्यम से अवरोध उत्पन्न करने की है.
ईरान ने अमेरिका को यह भी कहा है कि यदि उसकी आर्थिक स्थिति को हानि पहुंची, तो वह खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी संपत्तियां पर हमला कर देगा. ईरान का यह भी कहना है कि होर्मुज में अमेरिकी नौसेना ने जो नाकेबंदी कर रखी है, यदि वह समाप्त नहीं होती है, तो वह अमेरिकी जहाजों पर हमले करना शुरू कर देगा. ताजा अमेरिकी हमलों पर ईरान का जवाबी हमला इसी का सबूत है. अमेरिका ने ईरान को जितना हल्के में लिया था, वह अब उसके लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है. पर ट्रंप इसे स्वीकार करना नहीं चाहते. उल्टे उनकी नीतियों में ईरान के खिलाफ चौतरफा आक्रामकता ही दिखाई दे रही है, चाहे वह जवाबी सैन्य हमला हो या फिर आर्थिक प्रतिबंध की रणनीति. यहां भारत की चर्चा भी जरूरी है. अमेरिकी प्रतिबंधों के जरिये भारत को परेशान करने की जो कोशिश हो रही है, उसका एक कारण पाकिस्तान को लेकर भारत का दृढ़ रवैया है कि वह आतंक फैलाता है और भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को हराया तथा पाकिस्तान के आग्रह पर ही सीजफायर किया.
जबकि अमेरिका कह रहा है कि पाकिस्तान जीत गया. ऐसे में भारत अमेरिका की बात कैसे मान सकता है. भारत को इस बात का भी मलाल है कि जब पाकिस्तान ने हमारे यहां आतंकवाद फैलाया, तब अमेरिका ने उसकी आलोचना नहीं की. दूसरी ओर अमेरिका चाह रहा है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों उसके साथ खड़े हों और वह बताये कि दोनों देशों को क्या करना है. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं कर रहे हैं. एक और महत्वपूर्ण बात, भारत ने हमेशा कहा है कि वह अमेरिका के साथ है. ऐसे में अमेरिका चाहता है कि जब भारत उसके साथ है, तो वह अमेरिका की ओर से न केवल ईरान, बल्कि रूस और चीन के विरुद्ध भी कार्रवाई करे. यहां भी भारत अमेरिका की बात नहीं सुन रहा है. वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को आगे तो ले जाना चाहता है, पर रूस और चीन के साथ अपने रिश्ते तोड़ नहीं सकता. भारत की अपनी जरूरतें हैं, जिसे देखते हुए वह कदम उठा रहा है. भारत अपनी ऊर्जा का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, फर्टिलाइजर का भी बड़े पैमाने पर आयात होता है, यदि भारत रूस और दूसरे देशों से इन चीजों का आयात नहीं करेगा, या चीन के साथ संबंध अच्छे बनाकर नहीं रखेगा, तो देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जायेगी.
यहां भारत का रुख स्पष्ट है कि वह अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए ही रिश्ते बनायेगा और चूंकि वह एक शांति पसंद देश है, तो अमेरिका के कहने पर किसी भी देश पर हमला करने में अमेरिका का साथ नहीं देगा. कुल मिलाकर, ट्रंप की नाकामी का खामियाजा भारत समेत दुनिया के अनेक देश भुगत रहे हैं. ऐसे में भारत चाहेगा कि एससीओ के बाद ब्रिक्स सम्मेलन में यह सहमति अवश्य बने कि इन संगठनों के सदस्य देश शांति लाने का प्रयास करें और आपस में मधुर संबंध बनाकर रहें. ट्रंप के रवैये के कारण उनके साथ-साथ अमेरिका की लोकप्रियता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है और इस कारण नयी विश्व व्यवस्था भी बन सकती है. अनेक तकनीक में चीन अमेरिका से बहुत आगे निकल गया है. अमेरिका की तमाम कोशिशों के बावजूद रूस समाप्त नहीं हुआ है. इसी तरह भारत भी अन्य देशों की सहायता से शांतिपूर्वक अपनी जरूरतें पूरी कर रहा है, बिना किसी हमले में शामिल हुए. पर भारत को अपने हित के साथ-साथ अमेरिकी रुख पर भी पूरा ध्यान देना होगा, क्योंकि आज का अमेरिका पहले की तरह नहीं है, जो कहता था कि वह पूरी तरह भारत के साथ है. (बातचीत पर आधारित) (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
