Urbanisation Imapact : आधुनिकता और अनियंत्रित विकास के इस दौर में हमारे महानगर रहने लायक ठिकाने कम और ‘तपते तवे’ अधिक बन चुके हैं. बुनियादी ढांचे का चरमराना, ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (शहरी ऊष्मा द्वीप) का बढ़ता प्रभाव, पानी का गंभीर संकट और उस पर से बेहिसाब बिजली कटौती. इन सबने मिलकर आम जन के जीवन को एक दुःस्वप्न में बदल दिया है. यह संकट अब केवल शारीरिक थकावट या पसीने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े पैमाने पर लोगों को गंभीर रूप से शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बना रहा है.
प्रकृति का यह नियम रहा है कि सूर्यास्त के बाद धरती ठंडी होती है और रातें सुकून देती हैं. पर हमारे महानगरों में यह प्राकृतिक चक्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, जिसका मुख्य कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव है. जब किसी शहर में पेड़-पौधों, तालाबों और खुली जमीनों को खत्म कर वहां डामर की सड़कें, कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें और कांच से ढके टावर खड़े कर दिये जाते हैं, तो वे दिनभर सूरज की गर्मी को अपने भीतर सोख लेते हैं. रात के समय, जब तापमान कम होना चाहिए, ये कंक्रीट के ढांचे उस सोखी हुई गर्मी को वापस वातावरण में छोड़ना शुरू करते हैं. ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ के वैज्ञानिक अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत के बड़े महानगरों में रात का तापमान ग्रामीण या खुले क्षेत्रों की तुलना में पांच से सात डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया जा रहा है.
इसका अर्थ है कि महानगरों में रातें अब दिनों से भी अधिक भारी और उमस भरी हो रही हैं. रात की इस उमस में जब बिजली कटौती का झटका लगता है, तो नागरिक पूरी तरह असहाय हो जाता है. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें लगातार सचेत कर रही हैं कि अत्यधिक गर्मी और लगातार अधूरी नींद मनुष्य के शरीर के भीतर तापमान नियंत्रित करने की क्षमता को नष्ट कर देती है. जब लगातार कई दिनों तक मनुष्य की नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है. यही कारण है कि लोग गंभीर और अचानक उभरने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. देश के बड़े शहरों के सरकारी अस्पतालों की आपातकालीन ओपीडी के आंकड़े बताते हैं कि मई-जून के महीनों में हीट स्ट्रोक, अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ना, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन और किडनी फेलियर के मामलों में एक-तिहाई से ज्यादा की वृद्धि देखी जा रही है.
इस पूरे संकट का सबसे भयावह पहलू महानगरों में मानसिक रोगियों की बढ़ती फौज है. ‘द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ में प्रकाशित एक वैश्विक शोध के अनुसार, तापमान में प्रति एक डिग्री की वृद्धि से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और अवसाद के मामलों में दो प्रतिशत से अधिक की वृद्धि होती है. लगातार अनिद्रा और शारीरिक कष्ट के कारण लोग गंभीर चिड़चिड़ेपन, घबराहट और क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं. जब एक व्यक्ति रातभर बिना बिजली के तड़पता है और बिना सोये अगले दिन काम पर जाता है, तो उसकी मानसिक सहनशीलता समाप्त हो जाती है.
महानगरों में घरेलू हिंसा, सड़कों पर मामूली बातों पर होने वाली ‘रोड रेज’ की हिंसक घटनाएं और दफ्तरों में कर्मचारियों के बीच बढ़ते टकराव के पीछे इस ‘थर्मल स्ट्रेस’ का बहुत बड़ा हाथ है. मनोचिकित्सकों के अनुसार, इन दिनों ओपीडी में आने वाले हर पांचवें मरीज में अनिद्रा और गर्मी जनित मानसिक तनाव एक मुख्य कारण बनकर उभर रहा है. गर्मी के दिनों में दिल्ली-एनसीआर, मुंबई या लखनऊ जैसे शहरों के उपनगरों और रिहायशी सोसाइटियों में हाहाकार मचा रहता है. ट्रांसफॉर्मर फुंकने और केबल जलने की घटनाएं आम हैं. ऐसे में अमीर वर्ग तो डीजल जनरेटरों के सहारे कुछ राहत पा लेता है, पर मध्यम और निम्न वर्ग के लोग कंक्रीट के छोटे-छोटे कमरों में ‘तंदूर’ की तरह पकने को मजबूर हैं.
यदि हमें अपने शहरों को बीमारों का घर बनने से रोकना है, तो नये और साहसिक कदम उठाने होंगे. इस दिशा में एक अत्यंत व्यावहारिक और त्वरित समाधान यह हो सकता है कि प्रशासन दिन के बजाय रात के समय आवासीय परिसरों और कॉलोनियों की सड़कों पर स्प्रिंकलर ट्रकों को लगातार चलाये. दिन के समय पानी छिड़कने से वह तुरंत भाप बन जाता है और उमस को और बढ़ा देता है. पर रात के समय सड़कों और कंक्रीट के ढांचों पर लगातार पानी का छिड़काव करने से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ के प्रभाव को सीधे तौर पर कम किया जा सकता है. इससे डामर और कंक्रीट द्वारा सोखी गयी गर्मी शांत होगी, जिससे रात के तापमान में कमी आयेगी और बिजली कटौती के दौरान भी लोगों को कुछ राहत मिल सकेगी.
साथ ही, शहरी नियोजन में ‘व्हाइट रूफिंग’ को बढ़ावा देना और बिजली वितरण प्रणाली को सौर ऊर्जा के ग्रिड से जोड़कर मजबूत करना होगा. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में यदि हमने अपने शहरों के बुनियादी ढांचे को पर्यावरण के अनुकूल और मानवीय नहीं बनाया, तो आने वाले समय में हमारी उत्पादक जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अस्पतालों के चक्कर काटने और मानसिक अवसाद से जूझने में ही अपनी ऊर्जा गंवा देगा. यह अलार्म बेल है, जिसे हमारे नीति-नियंताओं को तुरंत सुनना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
