हिंदी पत्रकारिता की द्विशतवार्षिकी पर ‘उदंत मार्तंड’ की याद, पढ़ें कृपाशंकर चौबे का आलेख

Udant Martand: हिंदी पत्रकारिता की द्विशतवार्षिकी मनाते हुए हमें याद रखना चाहिए कि हम इसकी शतवार्षिकी नहीं मना पाये थे, क्योंकि ब्रजेंद्रनाथ गुप्त ने 1931 में बताया कि हिंदी का पहला अखबार 'उदंत मार्तंड' 30 मई, 1826 को निकला था.

Udant Martand: हिदी पत्रकारिता की द्विशतवार्षिकी मनाई जा रही है. इसके पहले 1976 में उसकी सार्ध शतवार्षिकी मनाई गई थी. किंतु सौ साल पहले 1926 में हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी नहीं मनाई जा सकी थी, क्योंकि जनवरी, 1931 तक यह माना जाता रहा कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म 1845 ई. में हुआ. बाबू राधाकृष्ण दास ने 1894 में नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘हिंदी भाषा के सामयिक पत्रों का इतिहास’ में 1845 में निकले ‘बनारस अखबार’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र बताया था, जिसके संचालक राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद और संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते थे. लेकिन भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के गंभीर अध्येता ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने बाबू राधाकृष्ण दास और बाल मुकुंद गुप्त के लेखन का हवाला देते हुए ‘विशाल भारत’ के फरवरी, 1931 के अंक में ‘हिंदी का प्रथम समाचार पत्र’ शीर्षक खोजपरक आलेख में लिखा, ‘हिंदी का प्रथम समाचार पत्र 30 मई, 1826 को युगलकिशोर शुक्ल द्वारा कलकत्ता के कोल्हू टोला के आमड़ातला की 37 नंबर गली से प्रकाशित ‘उदंत मार्तंड’ है.

ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने ‘विशाल भारत’ के मार्च, 1931 के अंक में ‘हिंदी का प्रथम समाचार पत्र’ शीर्षक लेख की दूसरी किस्त में ‘उदंत मार्तंड’ के कुछ उद्धरण दिये, जिससे उस समय की पत्रकार कला और भाषा का पता चलता है. उन्होंने बताया, “उदंत मार्तंड’ के प्रथम पृष्ठ पर अखबार के नाम के नीचे छोटे अक्षरों में संस्कृत में श्लोक लिखा रहता था, जिसका अर्थ है-सूर्य के प्रकाश के बिना जिस तरह अंधेरा नहीं मिटता, उसी तरह समाचार सेवा के बिना अज्ञ जन जानकार नहीं बन सकते. इसलिए मैं यह प्रयत्न कर रहा हूं. इससे स्पष्ट है कि युगल किशोर शुक्ल ने पाठकों के अज्ञान अंधकार को दूर करने और उन्हें शिक्षित करने के ध्येय से ‘उदंत मार्तंड’ निकाला. इस तरह हिंदी पत्रकारिता का यह आदि-संकल्प है कि वह अपने पाठकों-श्रोताओं-दर्शकों को शिक्षित करे और विवेकवान बनाये”.

ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने इस लेख में ‘उदंत मार्तंड’ के पहले अंक में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित ‘इस कागज के प्रकाशक का इश्तेहार’ को यथावत प्रस्तुत किया है. उन्होंने अखबार के भीतर के पन्नों पर प्रकाशित ‘इश्तेहार’, ‘श्री श्रीमान गवरनर जेनरेल बहादुर का सभा वर्णन’, ‘वह उल्था’, ‘फरासीस देश की खबर’, ‘ठट्टे की बात’, ‘बहुत मोटे ओ बड़े आदमी’, ‘अशुद्धता’, ‘और भी नयी अशुद्धियां’ तथा ‘गवरनर बहादुर की खबर’ शीर्षक सामग्री भी जस की तस प्रस्तुत की है. ‘विशाल भारत’ के अप्रैल, 1931 के अंक में ‘हिंदी का प्रथम समाचारपत्र’ शीर्षक लेख की तीसरी किस्त में ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने लिखा,“ ‘विशाल भारत’ के पिछले अंक में हिंदी के सर्वप्रथम समाचारपत्र ‘उदंत मार्तंड’ के कुछ उद्धरण प्रकाशित किये गये थे. यहां और भी कुछ मनोरंजक उद्धरण प्रकाशित करता हूं”. इसमें ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने ‘उदंत मार्तंड’ में प्रकाशित ‘बिलायती कपड़ा’, ‘लूट की छूट’, ‘दालचीनी के पौधे’, ‘श्री बुद्धिप्रकाश रामायण अश्वमेध’, ‘सर्प दंशन विष उतारने की औषधि’, ‘कानूनी नोटिस’ और ‘मध्य देशीय भाषा के बारे में’ शीर्षक सामग्री जस की तस प्रस्तुत की है. इसी किस्त में उन्होंने अखबार के बंद होने की सूचना दी है.

कानूनी कारणों एवं ग्राहकों से पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण युगल किशोर शुक्ल ने ‘उदंत मार्तंड’ के चार दिसंबर, 1827 के अंक में उसे बंद करने की घोषणा इस प्रकार की थी- “आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तंड उदंत, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।” जब ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी की यह खोज देश के समक्ष आयी, तब तक हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी बीत चुकी थी. हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी तो नहीं मनी, लेकिन उसकी द्विशताब्दी उसकी आदि प्रतिज्ञा के स्मरण का अवसर है. युगल किशोर शुक्ल ने ‘उदंत मार्तंड’ के प्रवेशांक में प्रथम पृष्ठ पर ‘इस कागज के प्रकाशक का इश्तेहार’ की पहली ही पंक्ति में लिखा था- ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’. यह हिंदी पत्रकारिता की आदि प्रतिज्ञा है. ध्यान देने योग्य है कि साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ हिंदी का अखबार था, किंतु वह केवल हिंदी समाज की नहीं, वरन समूचे हिंदुस्तान के हित की चिंता कर रहा था.

वह अखबार पत्रकारिता की एक परिभाषा भी दे गया कि पत्रकारिता वह है, जो देश हित से बंधी हो. ‘उदंत मार्तंड’ की पत्रकारिता से हमें सीख मिलती है कि पत्रकारिता को राष्ट्र के प्रति अपना दायित्व सजग प्रहरी की भांति निभाना चाहिए. ‘उदंत मार्तंड’ की देशहित चिंता के ध्येय को परवर्ती काल की हिंदी पत्रकारिता ने भी याद रखा. वस्तुतः देशहित चिंता के ध्येय से तब हर भारतीय भाषा की पत्रकारिता बंधी थी. हिंदी समेत भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता अपने महत दायित्व, राष्ट्रीय चेतना और युग बोध के प्रति पूर्ण सचेत थी. उसने ब्रिटिश शासन के अन्याय का प्रतिरोध करने का माद्दा समाज में उत्पन्न किया. इसके लिए हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को ब्रिटिश हुकूमत का बराबर कोपभाजन बनना पड़ा और जेल-जब्ती-जुर्माने का अनवरत सामना करना पड़ा. तब की पत्रकारिता ने अपार कष्ट व यातना सहकर भी राष्ट्रीय सम्मान और मर्यादा की रक्षा की. ( ये लेखक के निजी विचार हैं)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By डाॅ कृपा शंकर चौबे

डाॅ कृपा शंकर चौबे is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >