ट्रंप का पैंतरा

वीजा नियमन का नकारात्मक असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका है. अमेरिकी कंपनियां अच्छे पेशेवर नहीं मिलने की वजह से कनाडा और अन्य देशों का रुख कर सकती हैं.

यह पहली बार नहीं है, जब देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के नाम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आप्रवासन को नियंत्रित करना चाहते हैं. अब उन्हें कोरोना वायरस की वजह से मंदी के कगार पर पहुंची आर्थिकी का बहाना भी मिल गया है. एचवन-बी वीजा पर अस्थायी पाबंदी लगाने के उनके कदम पर असंतोष जताते हुए जानकारों और उद्यमियों ने उचित ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विकसित बनाने में प्रवासियों का बड़ा योगदान रहा है.

वीजा की इस श्रेणी में कुछ खास उद्यमों में प्रवासी पेशेवरों को अमेरिकी कंपनियों में काम करने की अनुमति दी जाती है. इसमें हर साल 85 हजार लोगों को वीजा दिया जाता है. सूचना तकनीक और वित्तीय सेवाओं में बड़ी संख्या में भारतीय इस वीजा के माध्यम से रोजगार पाते हैं और अमेरिकी कंपनियों में उनकी बड़ी मांग भी रहती है. स्वाभाविक रूप से दक्ष भारतीय पेशेवर ट्रंप प्रशासन के इस निर्णय से प्रभावित होंगे, लेकिन इसका बहुत अधिक नकारात्मक असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका है.

अमेरिकी कंपनियां अच्छे पेशेवर नहीं मिलने की वजह से कनाडा और अन्य देशों का रुख कर सकती हैं, जहां ऐसे नियमन नहीं हैं. ऐसा होने पर न तो अमेरिकी लोगों को वैसे रोजगार के अवसर मिल पायेंगे, जैसा राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं और न ही अमेरिकी कंपनियों से वांछित राजस्व की प्राप्ति हो सकेगी. भले ही ट्रंप प्रशासन इस कदम को अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार बढ़ाने के रूप में पेश कर रही है, पर सच यही है कि अमेरिका में कुशल व प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी के कारण ही कंपनियों को विदेशी पेशेवरों की सेवा लेनी पड़ती है. मसले का यह सबसे अहम पहलू है.

राष्ट्रपति ट्रंप का यह भी आरोप है कि सस्ता होने की वजह से कंपनियां बाहरी पेशेवरों को रोजगार देती हैं, लेकिन यह पूरा तथ्य नहीं है. अब जब पेशेवरों की कमी होगी और कार्यरत पेशेवर अपने वीजा का नवीनीकरण नहीं करा पायेंगे, तब अधिक वेतन-भत्ता देकर लोगों को काम पर रखना होगा. मौजूदा आर्थिक मंदी के माहौल में कंपनियों और अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति बड़ा झटका हो सकती है और अमेरिकी आर्थिकी को गतिशील करने की कोशिशों को नुकसान हो सकता है.

कई कंपनियों के प्रमुखों और जन-प्रतिनिधियों ने भी इस आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया है. उनका कहना है कि वीजा और रोजगार के नियमों में धीरे-धीरे सुधार किये जा सकते हैं तथा सुधारों के नाम पर ऐसे बड़े फैसले आनन-फानन में लागू करना ठीक नहीं है. कुछ पर्यवेक्षकों की इस राय में भी दम है कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे संरक्षणवादी पहलों से मतदाताओं को रिझाना चाहते हैं और उनकी प्राथमिकता चुनाव जीतने की है. बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि ट्रंप प्रशासन स्थिति का सही मूल्यांकन कर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेगा.

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