Trump Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर दुनिया के कई देशों के खिलाफ टैरिफ लगाने की धमकी देकर विश्व व्यापार व्यवस्था में नयी अनिश्चितता पैदा कर दी है. पिछले कुछ साल में ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति का सबसे प्रमुख उपकरण टैरिफ ही रहा है. यह कदम तब सामने आया है, जब हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाये गये वैश्विक टैरिफ को अवैध करार दिया था. अदालत के इस फैसले ने अमेरिकी सरकार की व्यापारिक रणनीति को झटका दिया और कई देशों के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं की दिशा भी अचानक बदल गयी. कई देश थे, जिन्होंने अमेरिका के साथ नये द्विपक्षीय व्यापार समझौते किये थे या ऐसे समझौतों पर बातचीत कर रहे थे, ताकि वे ट्रंप द्वारा लगाये जाने वाले संभावित टैरिफ से बच सकें. पर जब अदालत ने इन टैरिफ को अवैध ठहरा दिया, तब यह सवाल खड़ा हो गया कि अमेरिका अब अपने व्यापारिक दबाव को किस तरह बनाये रखेगा. इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप प्रशासन ने एक नयी रणनीति अपनाते हुए व्यापारिक जांचों का रास्ता चुना है. ये जांचें ट्रेड एक्ट, 1974 की धारा 301 के तहत शुरू की गयी हैं, जो अमेरिकी व्यापार नीति में एक बेहद शक्तिशाली कानूनी प्रावधान माना जाता है.
इस कानून के तहत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय को अधिकार प्राप्त है कि वह उन देशों के खिलाफ जांच शुरू करे, जिन पर अमेरिका के साथ अनुचित व्यापारिक व्यवहार करने का आरोप हो. यदि जांच में आरोप सही पाये जाते हैं, तो अमेरिका उन देशों के खिलाफ जवाबी कदम उठाते हुए टैरिफ या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है. इस प्रकार धारा 301 अमेरिकी प्रशासन को कानूनी ढांचे के भीतर रहते हुए अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण साधन प्रदान करती है. ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि जिन देशों के खिलाफ जांच शुरू की गयी है, वे अपनी औद्योगिक नीतियों और उत्पादन ढांचे के माध्यम से वैश्विक बाजार में असंतुलन पैदा कर रहे हैं.
जिन देशों को इस जांच के दायरे में लाया गया है, वे वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं. इनमें भारत, चीन और जापान जैसे बड़े औद्योगिक राष्ट्रों के अलावा वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया, बांग्लादेश, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और ताइवान आदि शामिल हैं. यह सूची संकेत देती है कि अमेरिका वैश्विक उत्पादन और व्यापार की संरचना को ही चुनौती देने की कोशिश कर रहा है. दिलचस्प यह है कि इस सूची में कनाडा नहीं है, जबकि वह अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में एक है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि उत्तरी अमेरिका की अर्थव्यवस्था काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ी है और अमेरिका तथा कनाडा के बीच आपूर्ति शृंखलाएं अत्यंत घनिष्ठ हैं. यह भी संभव है कि अमेरिका उन देशों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिनके साथ उसका व्यापार घाटा अपेक्षाकृत अधिक है.
इन जांचों का परिणाम 2026 की गर्मियों तक सामने आ सकता है और उसके बाद नये टैरिफ लगाये जा सकते हैं. अप्रैल तक सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की जायेंगी और मई के आसपास सुनवाई आयोजित की जायेगी. यदि जांच में यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि संबंधित देशों ने अनुचित व्यापारिक नीतियां अपनाई हैं, तो जुलाई से पहले ही नये टैरिफ लागू किये जा सकते हैं. इस समयसीमा का एक कारण यह भी है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा पहले लगाये गये अस्थायी टैरिफ जल्द ही समाप्त होने वाले हैं.
भारत के लिए यह स्थिति असहज करने वाली है, क्योंकि इधर नयी दिल्ली और वाशिंगटन के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में वार्ता चल रही थी. दोनों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी रहे हैं, जिनमें बाजार पहुंच, कृषि उत्पादों पर शुल्क और औद्योगिक वस्तुओं के व्यापार से जुड़े सवाल शामिल हैं. यदि अमेरिका इन जांचों के बाद नये टैरिफ लागू करता है, तो इससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नयी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं. अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि पिछले दशकों में वैश्विक व्यापार व्यवस्था ऐसी दिशा में विकसित हुई है जिसमें कई देशों ने अमेरिकी बाजार तक आसान पहुंच तो प्राप्त कर ली, लेकिन अपने घरेलू बाजारों को पर्याप्त रूप से नहीं खोला. ट्रंप प्रशासन के अनुसार इस असंतुलन के कारण अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ता गया और कई अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हुआ. इसलिए प्रशासन का मानना है कि टैरिफ या टैरिफ की धमकी का इस्तेमाल कर ही अन्य देशों को अधिक संतुलित व्यापार व्यवस्था की ओर प्रेरित किया जा सकता है.
हालांकि इस रणनीति के परिणामों को लेकर मतभेद हैं. कई अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, टैरिफ अल्पकालिक रूप से घरेलू उद्योगों को कुछ राहत दे सकते हैं, पर लंबे समय में वे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ा सकते हैं. यदि अन्य देश जवाबी टैरिफ लगाते हैं, तो इससे व्यापार युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. इन जांचों की घोषणा ऐसे समय में भी हुई है, जब अमेरिका और चीन के बीच उच्च-स्तरीय वार्ता होने की संभावना जतायी जा रही है. खबर है कि दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी जल्द ही पेरिस में मुलाकात कर सकते हैं, जो आगे चलकर ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच संभावित शिखर बैठक का मार्ग प्रशस्त कर सकती है.
ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये व्यापारिक जांचें कूटनीतिक बातचीत पर दबाव बनाने का एक साधन बनती हैं या फिर वे दोनों देशों के संबंधों में और अधिक तनाव पैदा करती हैं. कुल मिलाकर, ट्रंप प्रशासन की नयी पहल इस बात का संकेत देती है कि अमेरिका वैश्विक व्यापार नीति में अपने हितों की रक्षा के लिए टैरिफ को एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहेगा. अदालत के फैसले के बाद भी वाशिंगटन ने अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई है, बल्कि उसने एक नया कानूनी रास्ता अपनाकर दबाव की रणनीति जारी रखी है. आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि इन जांचों का परिणाम क्या निकलता है और क्या वे वास्तव में वैश्विक व्यापार व्यवस्था को किसी नयी दिशा में ले जाते हैं या फिर वे केवल एक और व्यापारिक टकराव का कारण बनते हैं. फिलहाल इतना तय है कि दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं आने वाले समय में अमेरिकी व्यापार नीति के इस नये चरण पर करीबी नजर बनाये रखेंगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
