-पार्थो प्रतिम चटर्जी,फेलो, रॉयल जीयोग्राफिकल सोसायटी (यूके)-
वैश्विक अर्थव्यवस्था आज ऐसे मोड़ पर है, जहां जमीन के संसाधन लगातार सिमटते जा रहे हैं और मिट्टी की घटती उर्वरता से दुनिया का ध्यान पृथ्वी के उस सत्तर प्रतिशत हिस्से की ओर जा रहा है, जो पानी से ढका है. पारंपरिक रूप से हमारी अर्थव्यवस्था जमीन केंद्रित रही है, पर दुनिया अब एक दूरदर्शी बदलाव के रूप में समुद्री संसाधनों के एकीकरण और पर्यावरण शासन की तरफ बढ़ रही है, जिसे हम ब्लू इकोनॉमी कहते हैं.
विश्व बैंक के अनुसार, ब्लू इकोनॉमी का अर्थ महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास, बेहतर आजीविका और नौकरियों के लिए समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग है. यह केवल समुद्र से पारंपरिक तरीकों से तेल निकालने या मछली पकड़ने तक सीमित नहीं है. यह ऐसा वैज्ञानिक खाका है, जो समुद्री विकास को पर्यावरण के नुकसान से पूरी तरह अलग करता है, ताकि औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाते हुए डेल्टा, तटीय आर्द्रभूमि और एस्चुअरी इकोटोंस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को बचाया जा सके. जमीन पर आधारित सौर या पवन ऊर्जा के साथ सबसे बड़ी समस्या उनकी अनिश्चितता होती है. जबकि इसके विपरीत, समुद्री संसाधन कहीं अधिक घने और अनुमानित होते हैं. अपतटीय पवन और ज्वारीय ऊर्जा जमीन की तुलना में बहुत अधिक क्षमता उपयोग कारक (सीयूएफ) प्रदान करते हैं. इसी तरह, ओशन थर्मल एनर्जी कन्वर्जन तकनीक समुद्र की ऊपरी गर्म सतह और गहराई के ठंडे पानी के तापमान के अंतर का उपयोग कर बिजली पैदा कर सकती है, जिसे कम तापमान थर्मल अलवणीकरण तकनीक के साथ जोड़कर तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी की कमी को बहुत कम लागत पर दूर किया जा सकता है.
इन उपकरणों को खारे पानी, अत्यधिक हाइड्रोलिक दबाव, चक्रवात और सुनामी जैसी कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, जिससे इसके क्रियान्वयन में भारी पूंजीगत और परिचालन व्यय की चुनौतियां सामने आती हैं. समुद्र के भीतर बिजली का केबल बिछाने और ग्रीन हाइड्रोजन के लिए इलेक्ट्रोलाइजर लगाने में भारी शुरुआती निवेश की आवश्यकता होती है, और खारे पानी के संक्षारक स्वभाव के कारण रखरखाव की लागत बढ़ जाती है. ये सभी कारक मिलकर तकनीक की लेवलाइज्ड लागत को बढ़ा देते हैं, जिससे प्रोजेक्ट का इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न और पेबैक पीरियड प्रभावित होता है, इसलिए, किसी भी तकनीक को लागू करने से पहले उसके टेक्नोलॉजिकल रेडीनेस लेवल और जैविक व रासायनिक संवेदनशीलता का सटीक आकलन करना अनिवार्य हो जाता है.
इन चुनौतियों के बावजूद ब्लू इकोनॉमी की असली ताकत भविष्य के कार्बन मुक्त उद्योगों के लिए प्रयोगशाला के रूप में काम करने की इसकी क्षमता है. जब अपतटीय पवन से मिलने वाली बिजली से पानी का इलेक्ट्रोलिसिस किया जाता है, तब ग्रीन हाइड्रोजन का जन्म होता है. इस ग्रीन हाइड्रोजन को नाइट्रोजन के साथ संश्लेषित करके ग्रीन अमोनिया बनाया जा सकता है. यह शिपिंग उद्योग के लिए एक बेहतरीन कार्बन मुक्त ईंधन है, जिसे आसानी से स्टोर किया जा सकता है. यह वैश्विक उर्वरक बाजार के लिए एक टिकाऊ आधार प्रदान करता है. इसके साथ ही, सीवीड की खेती लोगों, इस ग्रह और मुनाफे के लिए एक वरदान साबित हो रही है, जो भोजन, पशु चारा और नेट जीरो ईंधन के रूप में काम आती है. जलवायु संकट से निपटने के लिए समुद्र में सक्रिय वैज्ञानिक हस्तक्षेप की भी आवश्यकता है. मरीन क्लाउड ब्राइटनिंग जैसी तकनीकों के जरिये समुद्री हीट वेव्स को कम किया जा सकता है, जो कोरल ब्लीचिंग का मुख्य कारण है. इसके अतिरिक्त, पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक जहाजों का शोर व्हेल और डॉल्फिन के इकोलोकेशन को नुकसान पहुंचाता है, जिसकी जगह फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स या शांत टग्स का उपयोग किया जा सकता है,
जो इस ध्वनि आघात को रोक सकता है. प्लास्टिक कचरे को साफ करने के लिए इडियोनेला साकाइएंसिसि और तेल रिसाव को साफ करने के लिए अल्केनिवोरैक्स बोरकुमेंसिस जैसे विशेष रोगाणुओं का उपयोग करके पर्यावरण की सफाई को एक जैव औद्योगिक क्षेत्र में बदला जा सकता है. मैंग्रोव और समुद्री घास के मैदान स्थलीय जंगलों की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र में कहीं अधिक तेजी से कार्बन सोखते हैं, जो चक्रवातों के खिलाफ एक प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं.
आज समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को अंधाधुंध औद्योगिक विस्तार और अत्यधिक पोषक तत्वों के बहाव से भारी खतरा है, जिससे जहरीले शैवाल और रेड टाइड्स जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. हमें समुद्र की तलहटी को नष्ट करने वाली डीप सी माइनिंग की बजाय बायोमाइनिंग को अपनाना होगा. नीतिगत स्तर पर तटीय सुरक्षा के लिए बायोरॉक एक्रीशन तकनीक से बनी कृत्रिम मूंगा चट्टानों को अपनाना चाहिए. देशों को अपनी प्रादेशिक समुद्री सीमाओं के भीतर ग्रॉस एनवायरनमेंटल प्रोडक्ट को मापने पर ध्यान देना चाहिए. ब्लू इकोनॉमी केवल समुद्र में अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार नहीं है, बल्कि यह एक पुनर्योजी, तकनीकी रूप से कुशल और सामाजिक रूप से स्वीकार्य मॉडल की ओर बढ़ने का एक ऐतिहासिक कदम है, जो 21वीं शताब्दी में एक टिकाऊ वैश्विक अर्थव्यवस्था का रास्ता तय करेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
