समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाइन चुप्पी'

डिजिटल क्रांति ने हमें अभूतपूर्व सुविधा दी है, लेकिन सोशल मीडिया अनजाने में सामाजिक अलगाव बढ़ा रहा है। 'स्पाइरल ऑफ साइलेंस' और फिल्टर बबल कैसे हमारे विचारों और संवाद को प्रभावित कर रहे हैं, जानें।

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है. इस तकनीकी युग में जहां सूचना तक पहुंच आसान हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएं सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नये मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आये हैं. सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाला एक सूक्ष्म, पर प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है. आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, पर संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है.

सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गयी है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गयी है. डाटा रिपोर्टल के अनुसार, 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुंच चुकी है, जो वैश्विक जनसंख्या का लगभग 63 प्रतिशत है. वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की मानें, तो सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का केवल एक माध्यम नहीं रह गया है, 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग खाली समय बिताने व मनोरंजन के लिए करते हैं. आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से अधिक डाटा का बाजार बन गया है. हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकंड बदलती स्क्रीन- सब कुछ बेचा जा रहा है. इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकोनॉमी. इस इकोनॉमी में वही कंटेंट टिकता है, जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है.

परिणामस्वरूप, हर घंटे हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं, जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है. युवाओं का भी एक बड़ा वर्ग, अब कंटेंट को सोचने के लिए नहीं, बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है. वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है. यहीं से शुरू होती है डिजिटल त्रासदी- 'स्पाइरल ऑफ साइलेंस.' दशकों पहले जर्मन समाजशास्त्री, एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था. उनका कहना था कि जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है, तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं. यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था. शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम जन की आवाज बनेगा. समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा. लेकिन आज दुनिया एक मंच पर तो आ गयी, पर यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाये जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखायें, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं. इससे हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं. इस प्रक्रिया को 'फिल्टर बबल' कहा जाता है, जहां उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फंस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं. इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है. परिणामस्वरूप, बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं. वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, पर सक्रिय भागीदारी नहीं करते- सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं. धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है. कार्यालयों, कॉलेजों और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं. नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएं और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं. वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं, वे असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं. अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं, बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है,

एल्गोरिदम तय करता है कि कौन-सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जायेगी. आज हम ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जहां तकनीक तो 2026 की है, पर हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई वर्ष पीछे छूट गये हैं. वह सपना, कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियां मिटायेगा, आज डिजिटल भीड़ में बदल गया है, जहां हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं. यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनायी दीवारें केवल हमारे फोन तक ही नहीं, हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है. अंतत:, यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, यदि हमें इस डिजिटल जेल और फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है, तो हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना होगा, जहां संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का अर्थ केवल लाइक पाना न हो. वर्ना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जायेगा, जहां लोग जुड़े तो रहेंगे, पर उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By डॉ मुकुल श्रीवास्तव

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >