भारतीय संदर्भ में गणतंत्र का उल्लेख रामराज्य के रूप में होता है. आदर्श गणतंत्र, जहां सबको आगे बढ़ने और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार हो. ऐसा गणतंत्र, जिसमें पंच परमेश्वर माने जाते हों. गणतंत्र, जिसमें निर्धनतम व्यक्ति को भी न्याय मिलने का विश्वास हो. गणतंत्र, जिसमें जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि शासन व्यवस्था चलकर सामाजिक-आर्थिक हितों की रक्षा करें. पिछले वर्षों के दौरान भारतीय गणतंत्र फला-फूला है. अब हम 77 वां गणतंत्र दिवस गौरव के साथ मना रहे हैं. लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति की धुरी हैं- राजनीतिक पार्टियां. हाल के वर्षों में निहित स्वार्थों ने कुछ पार्टियों की मीठी खीर में खटास ला दी है. इस स्थिति में पिछले दिनों भाजपा में नये अध्यक्ष का चुनाव बहुत सुनियोजित ढंग से संपन्न हुआ. अटल, आडवाणी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अमित शाह के मुकाबले नितिन नवीन कमजोर नेता कहे जा सकते हैं, पर संगठन को शक्तिशाली बनाने के लिए शांत स्वभाव वाले कुशाभाऊ ठाकरे जैसे नेताओं का अनुगमन भी लाभदायक हो सकता है. वर्ष 1998 में भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद एक इंटरव्यू के दौरान कुशाभाऊ ठाकरे ने मुझसे कहा था, ‘राजनीति एक मिशन है. राजनीतिक दल केवल चुनाव जीतने या पद पाने के लिए नहीं होने चाहिए. संगठन को समाज और राष्ट्र के हितों के लिए मजबूत करना हमारा लक्ष्य रहना चाहिए’.
गणतंत्र में मीठे फल सब खाना चाहते हैं, लेकिन फल-फूल देने वाले पेड़ों की चिंता कम लोगों को रहती है. बहुत से लोग वर्तमान स्थिति में निराश होकर चिंता व्यक्त करते हैं. उनका ध्यान मैं एक पत्र की ओर दिलाना चाहता हूं. पत्र में लिखा था, ‘मैं शिद्दत से महसूस कर रहा हूं कि कांग्रेस मंत्रिमंडल बहुत अक्षम तरीके से काम कर रहा है. हमने जनता के मन में जो जगह बनायी थी, वह आधार खिसक रहा है. राजनेताओं का चरित्र अवसरवादी हो रहा है. उनके दिमाग में पार्टी के झगड़ों का फितूर है. वे इस व्यक्ति या उस गुट को कुचलने की सोच में लगे रहते हैं’. यह पत्र आज के कांग्रेसी का नहीं है. यह पत्र महात्मा गांधी ने 28 अप्रैल, 1938 को लिखा और नेहरू को भेजा था, जब राज्यों में अंतरिम देशी सरकारें बनी थीं. फिर नवंबर, 1938 में गांधी जी ने अपने अखबार ‘हरिजन’ में लिखा, ‘यदि कांग्रेस में गलत तत्वों की सफाई नहीं होती, तो इसकी शक्ति खत्म हो जायेगी’.
मई, 1939 में गांधी सेवा संघ के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए महात्मा जी ने बहुत दुखी मन से कहा था, ‘मैं समूची कांग्रेस पार्टी का दाह संस्कार कर देना अच्छा समझूंगा, बजाय इसके कि इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को सहना पड़े’. शायद उस समय के नेताओं पर गांधी जी की बातों का असर हुआ होगा, लेकिन क्या आज वही या अन्य पार्टियां उस विचार, आदर्श से काम कर रही हैं? लोकतंत्र में असहमतियों को सुनने-समझने और गलतियों को सुधारते हुए पार्टी, सरकार और समाज के हितों की रक्षा हो सकती है. राजनीतिक व्यवस्था संभालने वालों को आत्म निरीक्षण कर दलगत ढांचे में लोकतांत्रिक बदलाव का संकल्प गणतंत्र दिवस पर करना चाहिए. लोकतंत्र की मजबूती के लिए सही मुद्दों की तथा समाज को जागरूक करने की जरूरत होती है. संविधान निर्माता डॉ आंबेडकर ने कहा था, ‘बिना चरित्र और बिना विनम्रता के शिक्षित राजनीतिक व्यक्ति जानवर से ज्यादा खतरनाक है. यह समाज के लिए अभिशाप होगा’. गणतंत्र की गौरव गाथा की जयकार करते हुए भारतीय संविधान निर्माताओं के लक्ष्यों और भावनाओं का स्मरण भी होना चाहिए.
संविधान को अंतिम रूप दिये जाने के बाद 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, ‘यदि चुनकर आये लोग योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए, तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे. यदि उनमें इन गुणों का अभाव रहा, तो संविधान देश की कोई मदद नहीं कर सकता. संविधान एक मशीन की तरह निर्जीव है. इसमें प्राणों का संचार उन व्यक्तियों पर निर्भर है, जो इस पर नियंत्रण कर चलाते हैं. देश का हित सर्वोपरी रख ईमानदार लोग ही यह काम कर सकेंगे.’ गणतंत्र की शक्ति से ही दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले भारत की राजनीतिक शक्ति में बढ़ोतरी हुई है.
सामान्य आंतरिक आलोचना-विरोध भले ही हो, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान जैसे संपन्न, शक्तिशाली देश भारत के लोकतंत्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना कर अंतरराष्ट्रीय शांति तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका मान रहे हैं. वर्ष 1952 से 2025 तक संसद में सांसदों की अहम भूमिका से सामाजिक, आर्थिक बदलाव हुए हैं. इसलिए संसद के हंगामों, सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर संसद का अवमूल्यन उचित नहीं है. अमेरिका या यूरोपीय देशों के लोकतांत्रिक अधिकारों से तुलना करने और उनकी अर्थव्यवस्था से प्रतियोगिता करने वाले संविधान पर अमल के लिए आवश्यक कर्तव्यों के पालन और उनके लिए व्यापक जागरूकता के साथ निभाने के लिए कितने प्रयास करते हैं?
गणतंत्र में कार्यपालिका तो विधायिका के साथ जुड़ी हुई है. तीसरा आधार स्तंभ है- न्यायपालिका. इन दिनों सरकार, संसद और न्यायपालिका के बीच गंभीर तनाव और टकराव की स्थिति दिख रही है. यह खतरे की घंटी है. टकराव को समाप्त करने के लिए दोनों पक्षों को संवाद के जरिये हल निकालना होगा. केवल अपनी शक्ति सर्वोपरि होने के दावे से व्यवस्था नहीं चल सकती. हां, संविधान निर्माताओं ने चुनी हुई संसद को सर्वोच्च स्थान दिया था. एक तरह से संतुलन और निगरानी के लिए न्यायपालिका को अधिकार दिये थे. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश वेंकटचलैया और जेएस वर्मा ने जजों की नियुक्ति के लिए एक आयोग बनाने और न्यायाधीशों के साथ सरकार के प्रतिनिधि को रखने की सिफारिश की थी.
जज द्वारा स्वयं जज का नाम तय करने के अधिकार से कुछ पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप के खतरे रहे हैं. बहरहाल कुछ लोगों और आशंकाओं के आधार पर न्यायपालिका की विश्वसनीयता कम नहीं आंकी जा सकती. आज भी न्याय-व्यवस्था पर करोड़ों लोगों की आस्था है. चौथे स्तंभ मीडिया के विरुद्ध राजनीतिक अभियानों से उसकी विश्वसनीयता को खतरा पैदा हो रहा है. अदालत की तरह मीडिया में भी कुछ कमियां-गड़बड़ी हो सकती है, लेकिन अब भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति और बढ़ती प्रतियोगिता से समाज लाभान्वित हो रहा है. इसलिए गणतंत्र का उत्सव पूरे उत्साह से मनाने के साथ सबको अपने अधिकारों और कर्तव्यों को निभाने का संकल्प भी लेना चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
