आम नागरिक की भाषा ही हो कानून की भाषा

देश में कानून की शिक्षा और उसका ज्ञान केवल सीमित भाषाओं तक सिमट जाना न्याय के उद्देश्य को अधूरा रखता है. विकसित भारत के निर्माण के लिए विधि का अध्ययन भारतीय भाषाओं में होना आवश्यक है, ताकि न्याय समाज के हर नागरिक तक पहुँच सके.

प्रियांशु कुमार त्रिपाठी
(26 Years) सहायक प्रोफेसर (विधि) इंस्टिट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज रांची विश्वविद्यालय

भारत भाषाओं, संस्कृतियों और ज्ञान-परंपराओं का अद्भुत संगम है. यहां भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, समाज की स्मृति, संस्कृति और जीवन दृष्टि की अभिव्यक्ति है. ऐसे देश में यदि कानून की शिक्षा और उसका ज्ञान केवल सीमित भाषाओं तक सिमट जाये, तो न्याय का उद्देश्य अधूरा रह जाता है. विकसित भारत के निर्माण की दिशा में आज यह आवश्यक हो गया है कि विधि का अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान भारतीय भाषाओं में व्यापक रूप से विकसित किया जाये. कानून समाज के लिए बनता है, इसलिए उसकी भाषा भी समाज के निकट होनी चाहिए.

आज देश के अधिकांश विधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा का प्रमुख माध्यम अंग्रेजी है. कुछ संस्थानों में हिंदी माध्यम उपलब्ध है, पर अधिकांश भारतीय भाषाएं अभी भी विधि शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हैं. परिणामस्वरूप, लाखों विद्यार्थी भाषा की कठिनाई के कारण विधि शिक्षा से दूरी बना लेते हैं और सामान्य नागरिक अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को पूरी तरह समझ नहीं पाता. वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि अंग्रेजी का महत्व कम किया जाये, बल्कि यह है कि भारतीय भाषाओं को भी समान अवसर मिले. जब कोई विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जटिल विधिक अवधारणाओं को पढ़ता है, तो वह उन्हें अधिक सहजता और गहराई से समझ पाता है. भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और स्थानीय परिस्थितियां विश्व के अनेक देशों से भिन्न हैं. इसलिए यहां की समस्याओं का समाधान भी भारतीय संदर्भों में किये गये शोध से ही अधिक प्रभावी रूप से निकल सकता है. इसके लिए केवल कानून की पुस्तकों का अनुवाद पर्याप्त नहीं होगा.

भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों, विधिक शब्दावली, न्यायिक निर्णयों के सरल अनुवाद, डिजिटल सामग्री तथा स्थानीय संदर्भों पर आधारित मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा. साथ ही विधि विशेषज्ञों, भाषाविदों, शिक्षकों और नीति निर्माताओं को मिलकर एक ऐसी बहुभाषी विधि शिक्षा प्रणाली विकसित करनी होगी जो ज्ञान और न्याय, दोनों को जनसामान्य तक पहुंचा सके. विश्वविद्यालयों का प्रथम दायित्व भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण विधिक अध्ययन सामग्री, पाठ्यपुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों तथा इ संसाधनों का निर्माण और प्रकाशन करना है. साथ ही भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए मौलिक लेखन और शोध को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है. विधिक शब्दावली का मानकीकरण, न्यायिक निर्णयों के सरल भाषा में संकलन तथा भारतीय भाषाओं में शोध पत्रिकाओं के प्रकाशन से विधि शिक्षा अधिक प्रभावी और समावेशी बन सकती है. अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालयों को भारतीय भाषाओं में शोध परियोजनाओं, शोध वृत्तियों तथा अंतःविषय अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए.

ग्राम न्याय व्यवस्था, जनजातीय कानून, पंचायती राज, वैकल्पिक विवाद समाधान, महिला एवं बाल अधिकार, पर्यावरण न्याय तथा स्थानीय प्रशासन जैसे विषयों पर भारतीय भाषाओं में शोध न केवल ज्ञान का विस्तार करेगा, बल्कि नीति निर्माण के लिए भी उपयोगी आधार प्रदान करेगा. इस दिशा में विधि विभागों, भाषा विभागों तथा सामाजिक विज्ञान संकायों के मध्य समन्वय स्थापित करना समय की आवश्यकता है. डिजिटल युग में विश्वविद्यालयों को भारतीय भाषाओं में ऑनलाइन पाठ्यक्रम, इ लाइब्रेरी, डिजिटल विधिक डाटाबेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरण तथा मुक्त शैक्षिक संसाधनों का विकास भी करना चाहिए. इससे देश के दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थी भी गुणवत्तापूर्ण विधि शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और ज्ञान तक उनकी पहुंच अधिक व्यापक होगी.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अनुरूप विश्वविद्यालय यदि भारतीय भाषाओं को विधि शिक्षा के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं, तो वे केवल कुशल अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी और विधि शिक्षक ही नहीं, संवेदनशील, जागरूक और संविधान के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध नागरिक भी तैयार करेंगे. नि:संदेह, भारतीय भाषाओं में विधि का अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान विकसित भारत की मजबूत आधारशिला है, और इस आधारशिला को सुदृढ़ करने में विश्वविद्यालयों की भूमिका सर्वाधिक निर्णायक और परिवर्तनकारी सिद्ध होगी. विधि शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिवक्ता या न्यायाधीश तैयार करना नहीं है.

इसका उद्देश्य ऐसे जागरूक नागरिक भी तैयार करना है जो संविधान, अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील हों. यदि कानून की भाषा आम नागरिक की भाषा होगी, तो विधिक साक्षरता बढ़ेगी, न्याय तक पहुंच आसान होगी और समाज में कानून के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा. 'विकसित भारत 2047' का सपना तभी साकार होगा जब विकास के साथ न्याय भी प्रत्येक नागरिक तक उसकी अपनी भाषा में पहुंचेगा. कानून केवल अदालतों की फाइलों में नहीं, लोगों की समझ और व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए. यही सच्चे अर्थों में लोकतंत्र की सफलता है. समय की मांग स्पष्ट है-भारतीय भाषाओं को विधि शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र में स्थान दिया जाये. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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By प्रियांशु कुमार त्रिपाठी

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