तमिल सत्ता राजनीति में हिंदी के पक्ष में उठी आवाज, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का आलेख

Hindi in Tamil Politics: तमिलनाडु की विजय सरकार की सबसे युवा मंत्री एस कीर्तना हिंदी को बढ़ावा दे रही हैं. कीर्तना की यह सोच तमिलनाडु की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो हिंदी को भाषिक राजनीति का औजार नहीं, संचार और प्रसार का साधन मानती है.

Hindi in Tamil Politics: भाषाएं संचार का साधन तो होती हैं, इस प्रक्रिया में वे दिलों को भी जोड़ती हैं. लेकिन जब भाषाओं को राजनीतिक औजार बनाया जाता है, तब संचार का जरिया होने के बावजूद वे दिलों में दरार पैदा करने का माध्यम भी बन जाती है. तमिलनाडु में हिंदी की यही स्थिति रही है. आजादी से पहले महात्मा गांधी ने हिंदी में देश को जोड़ने की क्षमता देखी थी. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी यानी राजा जी ने तीस वर्षों तक दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का कामकाज संभाला.

तमिल माटी का वह सपूत तमिल लोगों की जुबान पर हिंदी को बसाना चाहता था, ताकि आजाद भारत में उत्तर और दक्षिण के दिलों को सीधे जोड़ा जा सके. तमिलनाडु की नवेली सत्ता की युवा मंत्री एस कीर्तना को राजा जी की ही कड़ी में रखा जा सकता है. तमिल राजनीति में वह राजा जी के बाद दूसरा चेहरा हैं, जो न सिर्फ फर्राटेदार हिंदी बोलती हैं, बल्कि हिंदी के जरिये देश से जुड़ने की बात करती हैं.

दस मई को विजय मंत्रिमंडल की सबसे युवा मंत्री बनने के बाद एस कीर्तना ट्रोलरों के निशाने पर रहीं. उनका हिंदी बोलना तमिल राजनीति के लिए हैरत और गुस्से की वजह बन गया. चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने हिंदी में बात की थी. तमिल राजनीति का परंपरावादी धड़ा यह कैसे बर्दाश्त करता कि उनकी मंत्री हिंदी बोले. लेकिन उसका भी उन्होंने जवाब दिया. एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘मैं हिंदी में बात कर रही हूं. मैं चाहती हूं कि मेरी पार्टी का प्रतिनिधित्व पूरे भारत में और दूसरे देशों तक पहुंचे. इसलिए मैं हिंदी में बोल रही हूं. हर किसी को मेरे नेता के बारे में पता होना चाहिए. हर किसी को मेरी पार्टी के बारे में जानकारी होनी चाहिए.’

तमिलनाडु की राजनीति के लिए भाषा का मुद्दा 1938 में ही संवेदनशील बन गया था, जब तत्कालीन मद्रास प्रांत की सरकार के मुखिया के नाते राजा जी ने प्राथमिक शिक्षा में हिंदी पढ़ाने की शुरुआत की. तब डीएमके के संस्थापक सीए अन्नादुरै ने हिंदी विरोध में मोर्चा खोला, जिससे राजा जी को हिंदी पढ़ाने के कदम से पीछे हटना पड़ा. इसके बावजूद 1968 तक वह हिंदी के कट्टर समर्थक बने रहे. डीएमके का गठन भले 1949 में हुआ, पर जिन मुद्दों को लेकर 1944 में उसकी पूर्ववर्ती जस्टिस पार्टी बनी थी, उसमें एक मुद्दा तमिल अस्मिता से भी जुड़ा था.

तमिल अस्मिता की जब भी बात होती है, वह घूमकर हिंदी विरोध पर चली जाती है. द्रविड़ दलों के राजनीतिक उभार के पीछे का एक मुद्दा यह भी रहा है. संवैधानिक प्रावधानों के तहत जब 26 जनवरी, 1965 को हिंदी को पूरे देश की राजभाषा के रूप में स्थापित होना था, तब तीखा विरोध तमिलनाडु में ही शुरू हुआ था, जो कुछ साल बाद हिंसक भी हो गया. तभी से तमिल राजनीति में हिंदी विरोध की घोषित परंपरा जारी है.
यह अलग बात है कि सूचना और संचार क्रांति की वजह से एक ऐसी नयी पीढ़ी तैयार हुई है, जिसे हिंदी विरोध के सियासी हथियार में कोई दिलचस्पी नहीं है. तमिलनाडु में विजय सरकार की सबसे युवा मंत्री एस कीर्तना इसी पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं. पटाखा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध शिवकाशी से विधायक कीर्तना की उम्र तीस साल भी नहीं है. वह बदले दौर की नेता हैं, जिन्हें भाषा राजनीति का औजार नहीं, संचार का साधन नजर आती है. राजनीति की एक रवायत है.

वह लीक पर चलने में ज्यादा विश्वास करती है. ऐसे में कीर्तना का हिंदी बोलना एक तरह से लीक को तोड़ना है. अगर लीक तोड़ने के लिए उनकी ट्रोलिंग नहीं होती, तो हैरत होती. हिंदी के लिए उन्हें खूब ट्रोल किया गया. तमिल राजनीति में सी राजगोपालाचारी के बाद कीर्तना संभवत: दूसरी राजनेता हैं, जो न सिर्फ धाराप्रवाह हिंदी बोलती हैं, बल्कि हिंदी के समर्थन में तर्क भी देती हैं.

विजय की राजनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य कर चुकीं कीर्तना जानती हैं कि हिंदी के बिना अपनी बात दूर-दूर तक नहीं पहुंचाई जा सकती. कीर्तना हिंदी को ‘राष्ट्रीय जुड़ाव’ का माध्यम मानती हैं और कहती हैं, कि तमिल सीमाओं से बाहर पार्टी और विजय के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हिंदी जरूरी है. तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन में शामिल होकर हिंदी से दूर रही पीढ़ी अब बुजुर्ग हो गयी है. उसमें कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें हिंदी न सीखने का मलाल है.

धीरे-धीरे ही सही, तमिलनाडु की नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति सहज हो रही है. खुद कीर्तना की पार्टी तमिल गौरव को बनाये रखते हुए राष्ट्रीय पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है. कीर्तना की यह सोच तमिलनाडु की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो हिंदी के जरिये गैर तमिल क्षेत्रों के लोगों से अपने विचार साझा करना चाहती है. अब तक भाषा का मुद्दा तमिलनाडु में तमिल अस्मिता और गौरव से जुड़ा रहा है. इस वजह से राष्ट्रीय मुद्दों पर तमिल राजनीति की सोच से देश वंचित रह जाता है.

कीर्तना की सोच इसी सोच को चुनौती है. चूंकि वह परिचित और परीक्षित राजनीतिक लीक से अलग है, इसलिए इसका विरोध स्वाभाविक है. लेकिन यह तमिल राजनीति की नयी पीढ़ी की बदलती सोच का भी प्रतीक है. भाषा के मुद्दे पर बदलाव रातोंरात नहीं आता, वह धीरे-धीरे आता है. कीर्तना की सोच इसी धीमी बदलाव का जरिया है. भाषाओं के जरिये देश के दिलों को जोड़ने वालों को इसका स्वागत करना ही चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
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