वन्यजीवों की तस्करी

जंगली प्रजातियों की तस्करी पर प्रभावी रोक के लिए निरंतर उपायों को मजबूत करने की आवश्यकता है, तभी जीवों को बचाने की मुहिम सफल हो पायेगी.

बीते कुछ वर्षों में वन्यजीवों का अवैध कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित अपराध में बदल गया है. बड़े पैमाने पर दुर्लभ प्रकार के वन्यजीवों की तस्करी से कई जीवों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है. पिछले महीने पश्चिम बंगाल के वन अधिकारियों ने जलपाईगुड़ी के जंगलों से तीन कंगारुओं को बरामद किया था. इसके बाद कंगारुओं को बंगाल सफारी पार्क भेज दिया गया.

अधिकारियों के मुताबिक, इन कंगारुओं का जन्म दक्षिण-पूर्वी एशिया के किसी संरक्षित प्रजनन केंद्र में हुआ है और उन्हें तस्करी कर यहां लाया गया. विदेशों से तस्करी कर लाये जानेवाले वन्यजीवों का पालतू जानवरों के रूप मे भी व्यापार होता है. दक्षिण एशिया में बढ़ता यह अवैध व्यापार कानून में मौजूद अनेक खामियों को उजागर करता है. यह दूसरा मौका है, जब उत्तर बंगाल में कंगारुओं की बरामदगी हुई है.

हालांकि, उक्त प्रकरण में जांच के आदेश दिये गये हैं. गजोल्डोबा वन के निचले क्षेत्र में कंगारू पाये जाते रहे हैं, यह इलाका दक्षिण में बांग्लादेश, पूर्व में नेपाल और उत्तर में भूटान से घिरा है. पिछले हफ्ते म्यांमार सीमा से लगे मिजोरम में भी तीन पैर वाले स्लॉथ, बीवर, सांप, दुर्लभ छिपकलियों और पोटोस (एक छोटा प्राइमेट) समेत 400 से अधिक विदेशी जीवों की खेप पकड़ी गयी थी. बैंकाक से आये एक यात्री के बैग से कुछ दुर्लभ जीव पकड़े गये थे.

हालांकि, अवैध तस्करी के ऐसे अनेक मामले नजर में नहीं आ पाते. इसका बड़ा कारण है कि भारत में विदेशी वन्यजीवों को कब्जे में लेने, व्यापार और प्रजनन को नियंत्रित करने से संबंधित कोई ठोस कानून नहीं है. चूंकि, ऐसे मामले वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम, 1972 के दायरे में नहीं आते, जिससे तस्कर कार्रवाई की जद में आने से बच जाते हैं. वन्यजीवों की ऑनलाइन तस्करी भी हो रही है, ऐसे अपराधों को रोकने के प्रयास अप्रभावी ही रहे हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी पक्षियों और दुर्लभ जानवरों को पहले ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, थाइलैंड, पापुआ न्यू गिनी, ऑस्ट्रेलिया या किसी अफ्रीकी देश के जंगल से पकड़ा जाता है, फिर उन्हें पिंजरे में बंद कर भारत भेज दिया जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि दुर्लभ जीवों की बरामदगी के बढ़ते मामले स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार और वेट मार्केट में इनकी काफी मांग है.

विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के मुताबिक, नेवले के बाल, सांप की खाल, कछुए की शेल, कस्तूरी और भालू के पित्त समेत विविध उत्पादों की भारत में भले ही कोई प्रत्यक्ष मांग न हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके ग्राहक मौजूद हैं. मामलों की छानबीन और दोषियों पर कार्रवाई से स्पष्ट है कि संस्थाएं सतर्क हैं. जंगली प्रजातियों की तस्करी पर प्रभावी रोक के लिए निरंतर उपायों को मजबूत करने की आवश्यकता है, तभी जीवों को बचाने की मुहिम सफल हो पायेगी और दुर्लभ जीवों के अस्तित्व को भी बचाया जा सकेगा.

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Published by: संपादकीय

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