औद्योगिक मांग बढ़ने से आसमान पर चांदी

Silver prices : शादियों में सोने के गहनों के साथ चांदी की पायलें, बिछिया वगैरह देना आम बात है. चांदी की मॉडर्न ज्वेलरी की भी खासी मांग है. बहुत से राज्यों में परंपरागत परिवारों में चांदी रखने की परंपरा रही है. यह उन्हें भरोसा देता है कि जरूरत पड़ने पर उसे सोने की तरह बेचकर नकदी प्राप्त की जा सकती है.

Silver prices : सफेद धातु, यानी चांदी को हमेशा दूसरे स्थान पर रखा जाता है. लेकिन इन दिनों इसकी कीमत इतनी हो गयी है कि सवाल उठ रहा है कि चांदी की यह शिखर यात्रा कहां तक जायेगी. सोना सवा लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के पास है, तो चांदी डेढ़ लाख रुपये प्रति किलो के पार जा चुकी है. जबकि 2023 में इसकी कीमत 78,600 रुपये प्रति किलो थी. चांदी की इस समय बहुत मांग है. जहां सोना महज स्वर्णाभूषणों के काम आता रहा है, वहीं चांदी का औद्योगिक इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. टेक्नोलॉजी ने चांदी को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है. पहले तो सेल फोन में इसका इस्तेमाल होने लगा और फिर चिप में. लेकिन इसकी मांग में बेतहाशा बढ़ोतरी तब हुई, जब स्वच्छ ऊर्जा की तलाश में इलेक्ट्रिक वाहन बनने लगे. इन वाहनों की बैटरियों में चांदी का इस्तेमाल होता है. हर ऐसी बैटरी, हर सोलर पैनल और हर चिप बनाने में चांदी की जरूरत होती है. कुछ मेडिकल उपकरणों में भी इसका इस्तेमाल होता है.


इसके अलावा भी चांदी का इस्तेमाल गुटखा, तंबाकू वगैरह में होता है. मिठाइयों में चांदी का वर्क लगाया जाता है और इसका भस्म भी खाया जाता है. यही वजह है कि चांदी आज केवल एक कीमती धातु नहीं, बल्कि तकनीक की रीढ़ बन चुकी है. चांदी की औद्योगिक मांग ने पारंपरिक उपभोग- जैसे ज्वेलरी और निवेश को पीछे छोड़ दिया है. दुनियाभर में सरकारें स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल ढांचे पर खरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं, जिससे चांदी की खपत ऐतिहासिक ऊंचाइयों को छू रही है. भारत सोने की ही तरह चांदी का सबसे बड़ा उपभोक्ता रहा है. वर्ष 2024 में भारत ने रिकॉर्ड 7,600 टन चांदी का आयात किया. यह मांग दो कारणों से आयी. एक ओर तो औद्योगिक उपयोग में तेजी, तो दूसरी ओर त्योहारी सीजन के दौरान पारंपरिक मांग. अपने यहां त्योहारों तथा पारिवारिक समारोहों में चांदी के सिक्के देने का रिवाज रहा है. दिवाली में तो खास तौर से सिक्के से लेकर बर्तनों तक चांदी उपहार के रूप में दी जाती है.

शादियों में सोने के गहनों के साथ चांदी की पायलें, बिछिया वगैरह देना आम बात है. चांदी की मॉडर्न ज्वेलरी की भी खासी मांग है. बहुत से राज्यों में परंपरागत परिवारों में चांदी रखने की परंपरा रही है. यह उन्हें भरोसा देता है कि जरूरत पड़ने पर उसे सोने की तरह बेचकर नकदी प्राप्त की जा सकती है. यह भी बुरे समय का साथी है. चांदी अब निवेशकों को भी बहुत भाने लगा है, क्योंकि कम धन के निवेश से इसमें ज्यादा लाभ दिखता है. इस कारण दुनियाभर के निवेशक इस समय चांदी में निवेश कर रहे हैं. पर सभी की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर है. दरअसल, अमेरिका में कयास लगाया जा रहा है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती कर सकता है. इसी कारण पिछले दिनों सोने-चांदी के दामों में गिरावट आयी. दिसंबर में फेडरल रिजर्व अगर कोई बड़ा कदम उठाता है या रोजगार के आंकड़े संतोषजनक नहीं होते, तो चांदी के दाम विश्व बाजार में गिर सकते हैं.


दुनिया में सबसे ज्यादा चांदी दक्षिण अमेरिका के देशों खासकर मेक्सिको, पेरू, बोलिविया व चीन, रूस वगैरह देशों में होता है. भारत में चांदी की खदान न के बराबर है. हमारे यहां चांदी का सबसे ज्यादा उत्पादन राजस्थान में होता है. वहां की सिंदेसर खुर्द खदान में सबसे ज्यादा चांदी पायी जाती है, जिसका स्वामित्व वेदांत समूह के पास है. थोड़ी मात्रा में चांदी झारखंड, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी पायी जाती है. हम चीन, रूस के अलावा यूएई तथा कुछ अन्य देशों से चांदी आयात करते हैं. इसलिए माना जा रहा है कि चांदी की कीमतें फिलहाल नहीं गिरेंगी, लेकिन एक अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि डॉलर अब फिर से मजबूत हो रहा है. इस सफेद धातु के दाम सरपट भागते रहे हैं और अब इतना ऊपर चले गये कि सर्राफा बाजार में सन्नाटा छा गया है. छोटे खरीदार गायब हो गये और सिक्कों की बिक्री में भारी गिरावट आ गयी है.


दिल्ली और उत्तर भारत में चांदी के सिक्कों की खरीद आम बात है. यहां लोग शगुन के तौर पर चांदी के सिक्के देते हैं. लेकिन इसके दाम एक लाख रुपये किलो पार करते ही बाजार में एक अजीब-सी खामोशी छा गयी. सर्राफा व्यापारी और आयातक जब तक भविष्य के लिए कोई रणनीति तय कर पाते, तब तक इसकी कीमत और ऊपर भाग गयी. इस साल अक्तूबर त्योहारों का महीना था और दशहरा, दिवाली, भाई दूज जैसे पर्व थे, जिनमें चांदी के उपहार देने की परंपरा रही है. लेकिन चांदी की बढ़ी हुई कीमतों ने उन पर पानी फेर दिया. इस कारण खुदरा ग्राहकों की खरीदारी घट गयी, क्योंकि उनका बजट कमोबेश वही था, जो पिछले साल था. बजट के अनुसार खरीदारी करने पर उन्हें पूर्व की तुलना में कम माल मिला, जबकि पहले वे उतने ही पैसे में ज्यादा सिक्के वगैरह खरीद लेते थे. यह सच है कि आज निवेश के तौर पर चांदी ने भी अच्छी जगह बना ली है. लोग इसमें पहले भी निवेश करते थे और जिन लोगों ने ऐसा किया उनकी तो चांदी ही हो गयी. अब देखना है कि इसकी कीमत दो लाख के ऐतिहासिक स्तर से आगे जाती है या नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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