ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के मायने, पढ़ें शिवकांत का आलेख

Keir Starmer : स्टार्मर और मोदी, दोनों राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं. भारत में बिहार और उसके बाद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में चुनाव होने हैं, जिनमें बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा रहेगी. ब्रिटेन में स्टार्मर सरकार की लोकप्रियता भारी बहुमत से जीत कर आने के बावजूद निरंतर घट रही है, क्योंकि अमेरिका की देखा-देखी ब्रिटेन में भी घुसपैठियों और आप्रवासियों के खिलाफ असंतोष की लहर चल रही है.

Keir Starmer : ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर अपनी पहली भारत यात्रा पर आज मुंबई पहुंचे हैं. उनकी यात्रा के तीन मुख्य उद्देश्य बताये जा रहे हैं. भारत-ब्रिटेन की रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न पहलुओं की प्रगति का आकलन करना, दोनों के बीच हुए व्यापक आर्थिक और व्यावसायिक समझौते-सीटा से खुले अवसरों के बारे में कारोबारियों और उद्योगपतियों से चर्चा करना, और क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करना. भारत और ब्रिटेन, दोनों ट्रंप की मनमानी टैरिफ नीतियों के कारण व्यापार और सप्लाई चेनों में चल रही उथल-पुथल के बीच व्यापार के स्थिर विकल्पों की तलाश में हैं. इसीलिए स्टार्मर राजधानी दिल्ली की जगह वित्तीय राजधानी मुंबई की यात्रा पर आये हैं. वह अपने साथ विदेश, वाणिज्य व शिक्षा विभागों के मंत्रियों के साथ इमर्जिंग और क्रिटिकल प्रौद्योगिकी में शोध और विकास करने वाले उद्यमियों व वित्तीय कंपनियों का एक बड़ा शिष्टमंडल भी लेकर आये हैं.


दोनों प्रधानमंत्री मुंबई में हो रहे फिनटेक- यानी वित्तीय प्रौद्योगिकी के छठे अंतरराष्ट्रीय उत्सव में अभिभाषण देंगे. फिर भारत-ब्रिटेन प्रौद्योगिकी सुरक्षा पहल या टीएसआइ को बढ़ावा देने के लिए मंत्रिस्तरीय बैठक में भाग लेंगे. इसकी शुरुआत 2024 में दूरसंचार, क्रिटिकल खनिज, एआइ, क्वांटम और जैव प्रौद्योगिकी, प्रोन्नत पदार्थों और सेमीकंडक्टरों के क्षेत्र में सहयोग के लिए की गयी थी. अब दोनों देश उद्योगों को इन क्षेत्रों से जोड़ने, उनके लिए बीज पूंजी जुटाने और उससे त्वरित लाभ हासिल करने के उपाय खोज रहे हैं. दोनों प्रधानमंत्री इस पहल के सातों क्षेत्रों का आकलन कर यह तय करने की कोशिश करेंगे कि किन क्षेत्रों में सबसे तेज प्रगति हो सकती है.

कार्नेगी न्यास के शोधकर्ताओं का कहना है कि टीएसआइ में भारत की निर्माण क्षमता और ब्रिटेन की शोध व विकास की गुणवत्ता को मिलाकर महत्वाकांक्षी और दूरगामी परियोजनाओं पर काम करने के प्रयत्न हो रहे हैं. इमर्जिंग और क्रिटिकल प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के साथ इस यात्रा का उद्देश्य रक्षा सामान के साझा डिजाइन, साझा विकास और साझा निर्माण को आगे बढ़ाना भी है. भारत अब खरीदार की जगह रक्षा सामान का विक्रेता बनना चाहता है. इसके आकलन के लिए भारत-ब्रिटेन संयुक्त आर्थिक व्यापार परिषद की बैठक भी होगी, जो गत जुलाई में हुए मुक्त व्यापार सौदे के क्रियान्वयन की समीक्षा करेगी. इसमें व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में आ रही अड़चनों पर भी विचार होगा.


स्टार्मर और मोदी, दोनों राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं. भारत में बिहार और उसके बाद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में चुनाव होने हैं, जिनमें बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा रहेगी. ब्रिटेन में स्टार्मर सरकार की लोकप्रियता भारी बहुमत से जीत कर आने के बावजूद निरंतर घट रही है, क्योंकि अमेरिका की देखा-देखी ब्रिटेन में भी घुसपैठियों और आप्रवासियों के खिलाफ असंतोष की लहर चल रही है. वास्तव में, ब्रिटेन समेत सभी पश्चिमी देशों में भारत के पेशेवरों, आप्रवासियों और छात्रों के लिए वीजा और सुरक्षा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. एच-1बी वीजा की फीस बढ़कर एक लाख डॉलर हो जाने के बाद जर्मनी, कनाडा और ब्रिटेन से ऐसे संकेत मिले थे, जैसे ये देश भारत की स्टेम प्रतिभाओं को हाथोंहाथ लेने की कोशिश करेंगे. पर आप्रवासियों के खिलाफ चल रही लहर को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने भारतवंशी पेशेवरों और छात्रों के लिए मुश्किलें खड़ी करनी शुरू की हैं.

ब्रिटेन में कार्य वीजा पर आने वाले लोग पांच साल रहने के बाद स्थायी निवास के वीजा के लिए आवेदन कर सकते थे, जिसे आइएलआर वीजा कहते हैं. गत सप्ताह सत्ताधारी लेबर पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में पाक मूल की नयी गृहमंत्री शबाना महमूद ने एलान किया कि सरकार स्थायी निवास के वीजा के आवेदन की योग्यता बढ़ाकर दस साल कर रही है. जो भारतीय पेशेवर और छात्र ब्रिटेन में बसने के इरादे से आये थे, उन्हें अब स्थायी निवास के वीजा के लिए दस साल प्रतीक्षा करनी होगी. यह सब ब्रिटिश राजनीति में चल रही आप्रवासी विरोधी लहर की वजह से हो रहा है. पिछले तीन दशकों से ब्रिटिश राजनीति में जगह बनाने की कोशिश कर रहे धुर दक्षिणपंथी नेता नाइजल फराज ने जनता में सुगबुगा रही आप्रवासी विरोधी भावना भुना कर पिछले आम चुनाव में 14 फीसदी वोट के साथ संसद की पांच सीटें जीत ली थीं.

फराज ट्रंप समर्थक हैं, इसलिए अमेरिका में ट्रंप की जीत के बाद ब्रिटेन में फराज और उनकी पार्टी की लोकप्रियता में उछाल आया. उनकी रिफॉर्म पार्टी लोकप्रियता में ब्रिटेन की तीनों स्थापित पार्टियों, लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल से आगे हैं. फराज ने एलान किया है कि अगला चुनाव जीतने पर वह आइएलआर वीजा रद्द कर आप्रवासियों को कड़ी शर्तों वाले नये वीजा का आवेदन करने पर विवश करेंगे. फराज की इस घोषणा से सत्ता बचाने को लेकर चिंतित ब्रिटिश पार्टियों में आप्रवासन की रोकथाम का एलान करने की होड़ लग गयी है.


ब्रिटेन में बसे 20 लाख से अधिक भारतवंशियों में से छह-सात लाख आइएलआर वीजा धारक हैं. हालांकि स्थायी निवास वीजा के लिए स्टार्मर सरकार द्वारा लगाया जाने वाला 10 साल का नियम पहले से बसे आप्रवासियों पर लागू नहीं होगा. मगर स्थायी निवास को रोकने के लिए राजनीतिक पार्टियों में चल रही होड़ को देखकर आप्रवासियों की चिंता स्वाभाविक है. मुक्त व्यापार संधि का अभी दोनों देशों की संसदों में अनुमोदन होना बाकी है और भारतीय पेशेवरों व छात्रों के लिए वीजा बढ़ाने और सरल बनाने की मांग भारत की एक मुख्य शर्त रही है. इसलिए दोनों प्रधानमंत्रियों की शिखर बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा होने की संभावना है.

चर्चा ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और संजय भंडारी जैसे वित्तीय भगोड़ों के प्रत्यर्पण को सरल बनाने पर भी होगी, जो भारत से पैसा मारकर ब्रिटेन में शरण ले लेते हैं. भारत और ब्रिटेन ट्रंप की अप्रत्याशित नीतियों की वजह से बिखरती नियम आधारित विश्व व्यवस्था को लेकर भी चिंतित हैं. संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं निष्प्रभावी होती जा रही हैं. यूक्रेन युद्ध के यूरोप में फैलने का खतरा बढ़ रहा है और गाजा में ट्रंप की शांति योजना पर भी सवाल बने हुए हैं. हिंद प्रशांत क्षेत्र को बढ़ते चीनी हस्तक्षेप से मुक्त रखने की वैश्विक रणनीति उपेक्षित होती दिख रही है. चीन पश्चिमी एशिया में भी पाकिस्तान के माध्यम से अपना वर्चस्व फैला रहा है. जलवायु परिवर्तन की मार गंभीर हो रही है और उसकी रोकथाम के वैश्विक प्रयास कमजोर पड़ने लगे हैं. इन सभी मुद्दों पर मोदी और स्टार्मर के बीच सार्थक चर्चा होने की संभावना है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Published by: शिवकांत

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