मध्य प्रदेश में संगठन के साथ शिवराज की भी जीत

तीन हिंदी भाषी राज्यों में जीत से भाजपा का उत्साह, मनोबल बढ़ेगा, जिसके जरिये वह लोकसभा चुनावों में आगे आने के लिए पुरजोर ताकत झोंकेगी. कांग्रेस भले ही तेलंगाना जीत गयी है, परंतु विपक्षी गठबंधन में उसकी स्वीकार्यता में दरार बढ़ेगी.

संसदीय लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में चाहे जीत हो या हार, सैद्धांतिक रूप से भले ही व्यक्ति केंद्रित नहीं हो, लेकिन व्यवहारिक रूप से वह कहीं न कहीं व्यक्ति केंद्रित होती ही है. भाजपा की तीन राज्यों में जीत, भले ही उसके सामूहिक नेतृत्व की मेहनत का नतीजा हो, पर मध्य प्रदेश की जीत को कहीं न कहीं व्यक्ति केंद्रित राजनीति के अक्स के जरिये भी देखना होगा. मध्य प्रदेश की जीत को भले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राज्य के भाजपा चुनाव प्रभारी अश्विनी वैष्णव प्रधानमंत्री मोदी की जीत बता रहे हों, पर इस जीत के सेहरे के हकदार एक हद तक शिवराज भी हैं. रही बात छत्तीसगढ़ की जीत की, तो निश्चित तौर पर इसके लिए पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व कहीं ज्यादा जिम्मेदार है. राजस्थान की राजनीति की चूंकि तीस वर्षों से रवायत है कि एक बार कांग्रेस, तो अगली बार भाजपा, इसलिए वहां की जीत को इस चश्मे से भी देखा जायेगा. परंतु मध्य प्रदेश की जीत को कुछ अलग तरह से भी देखना होगा.

बीते दस जून को जबलपुर में जब शिवराज सिंह चौहान ने 23 साल से ज्यादा उम्र वाली महिलाओं की मदद के लिए लाडली बहना योजना शुरू की. उसके ठीक अगले ही दिन कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी की उसी जबलपुर में रैली थी. तब प्रियंका की रैली को लेकर जो उत्साह नजर आ रहा था, वैसा उत्साह लाड़ली बहना योजना को लेकर नहीं नजर आया. लेकिन जैसे ही यह योजना लागू हुई, महिलाओं के खाते में प्रतिमाह एक हजार रुपये का हस्तांतरण होने लगा, शिवराज और भाजपा को लेकर स्थितियां बदलनी शुरू हुईं. मुफ्तिया रेवड़ी के साइड इफेक्ट को समझते हुए भी शिवराज ने इस योजना पर शिद्दत से काम जारी रखा.

सितंबर से इस योजना के तहत मिलने वाली रकम को हजार से बढ़ाकर 1250 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया. इसका असर चुनावी नतीजों पर दिखा है. यह पहला अवसर नहीं है जब शिवराज ने ऐसी कोई योजना चलायी है. वर्ष 2008 के आम चुनावों के ठीक पहले उन्होंने लाडली लक्ष्मी योजना शुरू की थी. इसका असर उस चुनाव में बीजेपी की जीत के रूप में दिखा. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों के पहले शिवराज ने तीर्थ दर्शन योजना चलायी. इसका असर 2013 के विधानसभा चुनावों में दिखा. इन योजनाओं को बाद में तमाम राज्य सरकारों ने अपनाया.

वैसे 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से 48 हजार 27 मत ज्यादा मिले थे, पर उसकी सीटें कांग्रेस से पांच कम रह गयी थीं. इन संदर्भों में देखें, तो तब की हार भी व्यवहारिक रूप से हार भले ही थी, सैद्धांतिक रूप से हार नहीं थी. इस लिहाज से शिवराज भारतीय राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में उभरते हैं. राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले अधिक है. करीब 52 प्रतिशत मतदाता महिलाएं हैं. इसी तरह, राज्य में प्रति सीट करीब पौने दस हजार नये वोटर बने हैं. कह सकते हैं कि कांग्रेस की गारंटियां इन वोटरों को आकर्षित नहीं कर पायीं और शिवराज कहीं ज्यादा आगे रहे. कांग्रेस कुछ ज्यादा उत्साह में भी रही, अति उत्साह उसे ले डूबा. छत्तीसगढ़ के बारे में किसी भी एक्जिट पोल ने उम्मीद नहीं जतायी थी कि वहां भाजपा की जीत होगी. पर वहां भी भाजपा ने नया इतिहास रच दिया. छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता मध्य प्रदेश की तरह ही अति उत्साह में थे. जबकि भाजपा में तो उत्साह दिख भी नहीं रहा था. पर मोदी-शाह की जोड़ी और संघ परिवार के संगठनों ने मिलकर बाजी पलट दी. अमित शाह ने तो छत्तीसगढ़ में लगातार दौरा किया. ओम माथुर ने हर सीट पर काम किया और नतीजा सामने है. इसमें किंचित योगदान अमित जोगी की अगुवाई वाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का भी है, जिसने कांग्रेस के किले में बीजेपी को सेंध लगाने में मदद की.

छत्तीसगढ़ की जीत निश्चित तौर पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, उसकी रणनीति और संगठन की जीत है. राजस्थान में भाजपा सत्ता छीनने में कामयाब भले ही हुई हो, पर भाजपा की आपसी खींचतान की वजह से यह जीत आसान नहीं दिख रही थी. हाल के दिनों में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग ने अशोक गहलोत के बारे में हवा फैलाने में मदद दी थी, उससे राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश गया कि गहलोत अजेय हैं. हालांकि गहलोत इतने मजबूत हो चुके थे कि वे अपने आलाकमान को ठेंगे पर रखने लगे थे. उन्होंने कांग्रेस आलाकमान की मर्जी के विपरीत जाकर न तो मुख्यमंत्री पद छोड़ा, न ही कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा. आलाकमान की आंखों की किरकिरी बने शांति धारीवाल को जबरदस्ती टिकट भी दिलवाया. इससे राहुल गांधी नाराज भी रहे. भाजपा ने इस बीच अपनी रूठी महारानी वसुंधरा को आगे किया, सामूहिक भाव के साथ चुनाव मैदान में उतरी और इतिहास बदल दिया. विंध्य पर्वत के उत्तर में स्थित तीन हिंदी भाषी राज्यों में जीत से भाजपा का उत्साह, मनोबल बढ़ेगा, जिसके जरिये वह लोकसभा चुनावों में आगे आने के लिए पुरजोर ताकत झोंकेगी. कांग्रेस भले ही तेलंगाना जीत गयी है, परंतु विपक्षी गठबंधन में उसकी स्वीकार्यता में दरार बढ़ेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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