बहिष्कार के साथ आत्मनिर्भरता

हम एक ओर पूरी क्षमता का उपयोग करें और दूसरी ओर अतिरिक्त क्षमता का निर्माण करें, तो हमारी निर्भरता चीन पर पूरी तरह से समाप्त भी हो सकती है.

अश्विनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

ashwanimahajan@rediffmail.com

चीन द्वारा बार-बार भारत के साथ सीमा विवादों और हमारे 20 जवानों की हत्या, अपने निर्यातों द्वारा भारतीय बाजारों में अपने माल की डंपिंग, हमारे दुश्मनों और विशेष तौर पर आतंकवादियों को धन व हथियारों द्वारा समर्थन करते हुए पाकिस्तान द्वारा हथियायी गयी हमारी भूमि पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के नाम पर हमारी इच्छा के विरुद्ध निर्माण आदि के कारण भारत की जनता एवं सरकार दोनों ही चीन से क्षुब्ध हैं और उसे सबक सिखाना चाहती हैं.

पूरे देश में चीनी सामानों के बहिष्कार तथा चीनी निवेश और कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र से बाहर रखने के लिए मांग जोर पकड़ रही है. देश में 90-95 प्रतिशत लोग चीनी बहिष्कार के लिए कृत संकल्प हैं. सरकार द्वारा भी लगातार चीनी निवेश पर अंकुश लगाया जा रहा है. चीनी कंपनियों को मिले ठेकों को रद्द किया जा रहा है और चीनी सामानों की बंदरगाहों पर पूरी चेकिंग हो रही है. लेकिन कुछ लोगों का यह मानना है कि बहिष्कार से अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान हो सकते हैं, इसलिए चीन के साथ आर्थिक संबंध जारी रखना चाहिए.

चीन से आनेवाली वस्तुएं हमारे देश में उत्पादित वस्तुओं की तुलना में सस्ती हैं. ऐसे में बहिष्कार करना क्या सही होगा? इस संदर्भ में नफा-नुकसान का आकलन जरूरी है. बहिष्कार के आलोचकों का कहना है कि चीनी माल को रोकना अकुशलता को न्यौता देना होगा क्योंकि देश के उद्योगों में कुशलता बढ़ाने का दबाव ही नहीं होगा. अकुशल उद्योग निर्यात के अवसर समाप्त करते हैं. उनका यह भी कहना है कि इससे गरीब उपभोक्ताओं को नुकसान होगा क्योंकि उन्हें महंगे विकल्प खरीदने होंगे.

आलोचक कहते हैं कि चीन पर हमारी अत्यधिक निर्भरता है और सप्लाई-चेन में कई देश शामिल होते हैं तथा उत्पादन हेतु चीन के कलपुर्जों के आयात बाधित होने पर देश में उत्पादन व रोजगार बाधित होंगे. यदि हम टैरिफ बढ़ाते हैं, तो चीन ही नहीं, दूसरे देश भी भारतीय माल पर टैरिफ बढ़ा देंगे. उनका यह भी कहना है कि बहिष्कार कर हम चीन का कोई नुकसान नहीं कर पायेंगे क्योंकि चीन के लिए भारत में निर्यात का कोई विशेष महत्व है ही नहीं. कहा जा रहा है कि अभी भी भारत में चीन के कुल आयात उनके कुल निर्यातों का मात्र 2.7 प्रतिशत ही हैं. रोचक यह है कि प्रमुख राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के भी बहिष्कार के विरुद्ध लगभग यही तर्क हैं.

जब से बहिष्कार का दौर शुरू हुआ है, चीनी सरकार का मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स भी कमोबेश यही बातें कह रहा है. क्या यह महज संयोग है या हमारे बुद्धिजीवी और कुछ राजनीतिक दल चीन के तर्कों से अभिभूत हैं? इन तर्कों के साथ चीनी मीडिया का भी यह कहना है कि भारत में क्षमता ही नहीं कि वह चीन जैसे सामान बना सके या चीन को टक्कर दे सके. उन्हें लगता है कि कुछ दिन बहिष्कार की बातें कर लोग शांत हो जायेंगे और चीन से आयात जारी रहेगा. यह सही है कि चीन से हमारा आयात बहुत ज्यादा है, लेकिन पिछले दो सालों में कुछ कमी जरूर आयी है. उदाहरण के लिए, बीते दो वर्षों में, चीन से आयात 2017-18 में 76.4 बिलियन डाॅलर से घटकर 2019-20 में 65.3 बिलियन डालर हो गया. साल 2018-19 में इलेक्ट्रिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में लगभग आठ बिलियन डाॅलर की बड़ी गिरावट हुई. साल 2019-20 में भी इनके आयात में 1.5 बिलियन डाॅलर यानी 7.3 प्रतिशत की कमी हुई है.

वर्ष 2018-19 में लोहे और इस्पात के आयात में 12.3 प्रतिशत और 2019-20 में 22 प्रतिशत की गिरावट है. साल 2019-20 में जैविक रसायनों के आयात में 7.3 प्रतिशत और उर्वरकों में 11.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी. चीन से आयात, जो पहले तेजी से बढ़ रहे थे, जहां हमारी निर्भरता चीन पर अधिक है, उन उत्पादों पर एंटी-डंपिंग डयूटी और आयात शुल्कों में वृद्धि और मानकों के लगने के कारण एक महत्वपूर्ण गिरावट देखी गयी है. इसके कारण देश में इन वस्तुओं का उत्पादन भी बढ़ा है. गौरतलब है कि हम इनमें से कई उत्पादों के मामले में क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. साल 2018 में हमारी केमिकल्स में अनुपयुक्त क्षमता 24 से 37 प्रतिशत की थी. और प्रयास कर हम एक ओर पूरी क्षमता का उपयोग करें और दूसरी ओर अतिरिक्त क्षमता का निर्माण करें, तो हमारी निर्भरता चीन पर पूरी तरह से समाप्त भी हो सकती है.

आलोचकों का यह तर्क कि सस्ते चीनी आयातों से देश में कम लागत पर उत्पादन करने हेतु कुशलता बढ़ाने का अवसर मिलता है और आयात रोकने से इस पर नकारात्मक असर होगा. वे लोग यह भूल जाते हैं कि सस्ते चीनी आयातों के फलस्वरूप हमारे उद्योग ही नष्ट हो गये. उदाहरण के लिए, हमारा एक उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है, जहां 90 प्रतिशत हम अपने देश में बनाते थे, आज उसके 90 प्रतिशत के लिए हम विदेशों पर निर्भर हैं, जिसमें से 70 प्रतिशत निर्भरता तो अकेले चीन पर ही है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अभी भी यदि चीन से अनुचित व्यापार न हो, तो हम ये सब बना सकते हैं.

यह सही है कि चीनी माल पर हमारी निर्भरता है, वर्तमान परिस्थितियों में हमें यथाशीघ्र निर्भरता को दूर करना ही होगा. यह कहना उचित नहीं है कि देश में चीनी सामानों के प्रतिस्थापन्न की क्षमता नहीं है. समझना होगा कि जिन कल-पुर्जों के लिए हमारी निर्भरता है, उसके लिए हम प्रौद्योगिकी विकसित कर अथवा प्राप्त कर उनका देश में उत्पादन कर सकते हैं. हाल में देश में पीपीई किट्स, टेस्ट किट्स, वेंटिलेटर आदि के उत्पादन से अपनी क्षमताओं को सिद्ध करने का अवसर भी मिला है.

यह तर्क कि आयात रोकने से चीन को कोई अंतर नहीं पड़ेगा, सर्वथा असत्य है. यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे आयात बेशक चीन के निर्यातों का मात्र 2.7 प्रतिशत ही हैं, हमारा व्यापार घाटा चीन के व्यापार अधिशेष का 11.6 प्रतिशत है. आज अमेरिका भी चीन से अपने आर्थिक संबंध काफी हद तक विच्छेद कर रहा है. यूरोप, लैटिन अमेरिका व अफ्रीका के कई देश और ऑस्ट्रेलिया चीन से संबंध घटा रहे हैं. इनके असर के बारे में आलोचकों की चुप्पी आश्चर्यजनक है. चीन भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है, ऐसे में उसके कृत्यों हेतु उसे सबक सिखाना जरूरी है. बहिष्कार के साथ आत्मनिर्भरता ही भारत के लिए सही कदम होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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