आरबीआइ का लाभांश एक राहत भर है

RBI : रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2,86,588 करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरण मंजूर किया है. बताया जा रहा है कि यह अधिशेष आरबीआइ की मजबूत आय से आया है, जिसमें रुपये को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर बिक्री और विदेशी परिसंपत्तियों पर अधिक आय शामिल है.

RBI : गिरता हुआ रुपया आमतौर पर व्यापक आर्थिक समस्या माना जाता है. इससे आयात महंगे हो जाते हैं, महंगाई बढ़ती है और निवेशकों का भरोसा डगमगाता है, पर भारत के हालिया अनुभव ने एक विचित्र विरोधाभास पैदा किया है. जिस रुपये की कमजोरी बाहरी आर्थिक दबाव बढ़ाती है, वही केंद्र सरकार के लिए राजकोषीय लाभ भी पैदा कर रही है. रिजर्व बैंक ने रुपये को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचे, जिससे उसे भारी लाभ हुआ. यही लाभ अधिशेष के रूप में केंद्र को स्थानांतरित किया जाता है. इस तरह आरबीआइ केवल मुद्रा प्रबंधन नहीं कर रहा, धीरे-धीरे सरकार के राजकोषीय स्थिरकर्ता और लगभग खजांची की भूमिका निभाने लगा है.


रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2,86,588 करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरण मंजूर किया है. बताया जा रहा है कि यह अधिशेष आरबीआइ की मजबूत आय से आया है, जिसमें रुपये को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर बिक्री और विदेशी परिसंपत्तियों पर अधिक आय शामिल है. करीब 2.9 लाख करोड़ रुपये छोटी राशि नहीं है. यह केंद्र की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग आठ फीसदी है. इससे सरकार को बिना टैक्स बढ़ाये, बिना खर्च घटाये और बिना अधिक उधार लिये वित्तीय राहत मिलती है. कच्चे तेल की ऊंची कीमत, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और राजकोषीय घाटे के दबाव के समय यह राहत बहुत उपयोगी है. पर यह चिंता का कारण भी है. राहत धीरे-धीरे आदत बन सकती है. रिजर्व बैंक ने कई वर्षों में तब डॉलर खरीदे थे, जब रुपया काफी मजबूत था.

आज जब वही डॉलर कमजोर रुपये के मुकाबले बेचे जाते हैं, तो आरबीआइ को रुपये में लाभ होता है. आर्थिक पूंजी ढांचे के अनुसार सोने या विदेशी मुद्रा के पुनर्मूल्यांकन से हुए अवास्तविक लाभ बांटे नहीं जाने चाहिए. पर विदेशी मुद्रा संचालन से हुई वास्तविक आय आरबीआइ की कमाई में शामिल होती है और बाद में सरकार को अधिशेष के रूप में दी जाती है. यानी रुपये की कमजोरी ने सरकार को अप्रत्याशित वित्तीय लाभ दिया है. वही गिरावट, जो आयातकों को नुकसान पहुंचाती है, तेल महंगा करती है, देश की डॉलर आधारित जीडीपी घटाती है और विदेशी निवेशकों को चिंतित करती है, वही आरबीआइ के लिए डॉलर बिक्री पर लाभ पैदा करती है. यह एक और कारण से महत्वपूर्ण है.

यदि भारत की नॉमिनल जीडीपी रुपये के संदर्भ में 10 फीसदी बढ़ती है, पर डॉलर के मुकाबले रुपया 10 फीसदी से अधिक गिर जाता है, तो डॉलर के हिसाब से भारत की जीडीपी लगभग स्थिर रह जाती है. यह सिर्फ सांख्यिकीय मामला नहीं है. वैश्विक रैंकिंग, निवेशकों की धारणा और भू-राजनीतिक प्रभाव डॉलर में मापे जाते हैं. कोई देश घरेलू स्तर पर तेजी से बढ़ सकता है, पर यदि मुद्रा का अवमूल्यन उस लाभ को खत्म कर दे, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह स्थिर दिखाई दे सकता है. इसलिए लगातार कमजोर होता रुपया एक रणनीतिक चिंता बन सकता है. पर इसका अर्थ यह नहीं कि हर कीमत पर रुपये की रक्षा की जाये.
भारत चालू खाता घाटे वाली अर्थव्यवस्था है. वह जितना निर्यात करता है, उससे अधिक आयात करता है. भारत में मध्यम अवधि में महंगाई दर भी अमेरिका की तुलना में अधिक रहती है. इसलिए रुपये का कुछ कमजोर होना स्वाभाविक है. कमजोर रुपया उपयोगी भी हो सकता है.

यह निर्यात प्रतिस्पर्धा को बचाता है, गैर-जरूरी आयातों को हतोत्साहित करता है और अर्थव्यवस्था को बाहरी असंतुलनों को नजरअंदाज करने से रोकता है. खतरा केवल अवमूल्यन नहीं है. असली खतरा अव्यवस्थित अवमूल्यन है. ऐसे में, आरबीआइ का हस्तक्षेप उचित है. उसका काम अस्थिरता कम करना, घबराहट रोकना और बाजार की उम्मीदों को स्थिर रखना है. यहां एक नैतिक राजकोषीय प्रश्न है. यदि रुपये की रक्षा से आरबीआइ को भारी लाभ होता है और वही लाभ सरकार के घाटे को कम करने में मदद करता है, तो रुपये की गिरावट में छिपा हुआ राजकोषीय फायदा दिखाई देने लगता है. यह स्वस्थ प्रोत्साहन व्यवस्था नहीं है. किसी भी सरकार को केंद्रीय बैंक की विदेशी मुद्रा गतिविधियों को नियमित आय का स्रोत नहीं मानना चाहिए. भारत की राजकोषीय व्यवस्था में पहले से ही सरकारी उधारी के लिए एक अंतर्निहित समर्थन तंत्र मौजूद है.

वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के तहत बैंकों को अपनी जमा राशि का बड़ा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना होता है. इससे सरकारी कर्ज के लिए एक निश्चित बाजार बन जाता है. यह कानूनी और लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था है. लेकिन यह वित्तीय दमन का एक रूप भी है, क्योंकि घरेलू बचत का एक हिस्सा नियमों के माध्यम से सरकारी उधारी में लगाया जाता है. यदि इसके साथ सरकार आरबीआइ के बड़े अधिशेष हस्तांतरण पर भी निर्भर होने लगे, तो मौद्रिक प्राधिकरण और राजकोषीय सहायता के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है. रिजर्व बैंक वित्त मंत्रालय नहीं है. उसका काम मूल्य स्थिरता, वित्तीय स्थिरता, मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक विश्वसनीयता बनाये रखना है. वह सरकार का बैंकर जरूर है, पर उसे सरकार की नकदी देने वाली मशीन नहीं बनना चाहिए.


हालिया रिकॉर्ड अधिशेष को इसलिए सावधानी से देखना चाहिए. यह स्वागतयोग्य है, लेकिन सामान्य राजस्व नहीं है. यह विनिमय दर, डॉलर बिक्री, वैश्विक ब्याज दरों और आरबीआइ की जोखिम प्रावधान व्यवस्था पर निर्भर करता है. यह आयकर या जीएसटी जैसा स्थायी स्रोत नहीं है. इसे सरकार की स्थायी राजकोषीय गणना का हिस्सा नहीं बनना चाहिए. भारत को रिजर्व बैंक के अधिशेष हस्तांतरण का स्वागत करना चाहिए, लेकिन उस पर निर्भर नहीं होना चाहिए. बेहतर रास्ता यह है कि निर्यात बढ़ाये जाएं, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के जरिये तेल पर निर्भरता कम की जाए, सोने का अनावश्यक आयात घटाया जाए, टिकाऊ एफडीआइ आकर्षित की जाए, घरेलू विनिर्माण को मजबूत किया जाए और कारोबार करने की सुविधा बेहतर बनायी जाए. रुपये की कमजोरी एक चेतावनी है. आरबीआइ का लाभांश एक राहत है. पर राहत कभी नींव नहीं बन सकती. एक मजबूत सरकार के लिए मजबूत केंद्रीय बैंक जरूरी है. मुद्रास्फीति नियंत्रण, मुद्रा स्थिरता, बैंकिंग स्थिरता, कर्ज प्रबंधन और भंडार सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले केंद्रीय बैंक को वित्तीय रूप से मजबूत रहना ही होगा. इसलिए भारत के केंद्रीय बैंक को मौद्रिक और वित्तीय स्थिरता का संरक्षक बने रहना चाहिए, न कि सरकार की वित्तीय सुविधा का शांत वित्तपोषक.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >