जयंती विशेष: बिस्मिल का कलम और क्रांति से एक जैसा रिश्ता था

बिस्मिल के बारे में कहा जाता है कि वे जितने समर्पित क्रांतिकारी थे, उतने ही संवेदनशील कवि/शायर, लेखक और अनुवादक भी. चूंकि अनुवादक होने के लिए एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान जरूरी है, इसलिए उन्होंने हिंदी के अतिरिक्त कई अन्य भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त कर रखा था.

वर्ष 1897 में 11 जून को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे वीरमाता मूलारानी और पिता मुरलीधर के पुत्र, क्रांतिकारी और कलमकार शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की यह जयंती इस मायने में अत्यंत विशिष्ट है कि उनके नायकत्व में हुए जिस क्रांतिकारी काकोरी ट्रेन एक्शन को गुनाह करार देकर अंग्रेजों ने 19 दिसंबर, 1927 को उन्हें गोरखपुर जेल में शहीद कर डाला था, यह उसका शताब्दी वर्ष है. इससे पहले 2022 में हम बिस्मिल की सवा सौवीं जयंती मना चुके हैं. प्रसंगवश, बिस्मिल की ही शहादत के दिन उनके दो और साथियों अशफाक उल्ला खां व रौशन सिंह को भी इसी गुनाह में शहीद कर दिया गया था- अशफाक को फैजाबाद, जबकि रौशन को इलाहाबाद की मलाका जेल में. गोंडा जेल में बंद उनके एक अन्य साथी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले- 17 दिसंबर को- ही सूली की भेंट कर दिया गया था.

बिस्मिल के बारे में कहा जाता है कि वे जितने समर्पित क्रांतिकारी थे, उतने ही संवेदनशील कवि/शायर, लेखक और अनुवादक भी. चूंकि अनुवादक होने के लिए एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान जरूरी है, इसलिए उन्होंने हिंदी के अतिरिक्त कई अन्य भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त कर रखा था. उनके क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 1915 में हुई थी, जब ऐतिहासिक ‘गदर षड्यंत्र’ में भाई परमानंद को फांसी की सजा से उद्वेलित होकर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के समूल विनाश की प्रतिज्ञा की और उसे पूरी करने के लिए अपना पहला हथियार अपनी पुस्तकों की बिक्री से प्राप्त धन से खरीदा था. इस रूप में देखें, तो उनका कलम और क्रांति से एक जैसा रिश्ता था. ब्रिटिश साम्राज्य के समूल विनाश की अपनी प्रतिज्ञा के प्रति वे यावत्जीवन दृढ़ रहे और न कभी यह सोचा कि उनका मिशन अधूरा रह गया, न यह कि उनका बलिदान व्यर्थ हो जाने वाला है. उन्हें विश्वास था कि एक न एक दिन हिंदू-मुसलमान दोनों मिलकर गोरों से अपनी आजादी छीन लेंगे. अलबत्ता, उन्हें कोई कसक थी तो उनकी ही एक गजल के अनुसार बस यही कि ‘काश, अपनी जिंदगी में हम (आजादी का) वो मंजर देखते.’ सुविदित तथ्य है कि बिस्मिल अपनी शहादत से दो दिन पूर्व तक गोरखपुर जेल के अधिकारियों की नजरें बचाकर आत्मकथा लिखते रहे थे, जो गणेशशंकर विद्यार्थी के प्रयासों से उनके शहादत वर्ष में ही प्रकाशित हो गयी थी.

यह आत्मकथा क्रांतिकारी आंदोलन की शक्ति का भी पता देती है और उसकी कमजोरियों का भी. इसका भी कि किस तरह कई क्रांतिकारी नामधारियों की प्रांतीयता जनित संकीर्णताएं व भेदभाव क्रांतिकारी आंदोलन की जड़ें मजबूत करने में गंभीर बाधाएं खड़ी करते रहते थे और किस तरह विभिन्न एक्शनों में कमजोर इच्छाशक्ति वाले साथी पुलिस के दमन, अत्याचार व माफी जैसे प्रलोभनों के सामने टूटकर सारा भेद खोल देते थे. बिस्मिल को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में भी ऐसे साथियों की बड़ी भूमिका थी. बिस्मिल के ही शब्दों में हालत यह थी कि ‘जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को, वही तब नाग बन बैठे थे हमको काट खाने को.’ इन ‘काट खाने को बैठे’ नागों में सबसे बड़ा नाम उस बनारसीलाल का था, जिसने पुलिस के बहकाने पर सेशन कोर्ट में अपने बयान में यह तक कह दिया था कि बिस्मिल क्रांतिकारी आंदोलन के लिए धन जुटाने हेतु किये जाने वाले एक्शनों से हासिल रुपयों से अपने परिवार का निर्वाह करता है. यह बनारसीलाल ‘क्रांतिकारी’ बनने से पहले रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी का मंत्री रह चुका था और असहयोग आंदोलन में उसने छह महीने की कैद की सजा भी भोगी थी. बिस्मिल उस पर बहुत स्नेह रखते थे और आंदोलन में पैसों की तंगी के वक्त भी उसे किसी तरह की कोई कमी नहीं होने देते थे. फिर भी वे उसे इकबाली मुल्जिम बनने से नहीं रोक पाये थे. अपनी अंतिम गजल में संभवतः इसी को लेकर उन्होंने लिखा था- ‘मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या! दिल की बर्बादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या! मिट गयीं जब सब उम्मीदें मिट गये जब सब खयाल, उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या! आखिरी शब दीद के काबिल थी ‘बिस्मिल’ की तड़प, सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या!’

यह जानना भी दिलचस्प है कि 1936 में तुर्की के क्रांतिकारी मुस्तफा कमाल पाशा ने साउथ इस्ट अनातोलिया स्थित अपने देश के दियारबाकिर राज्य में ‘बिस्मिल शहर’ बसाकर उनकी शहादत को सलाम किया था. दियारबाकिर अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ है विद्रोहियों का क्षेत्र. पाशा ने दियारबाकिर से ही क्रांति की शुरुआत की थी. उन्होंने अपने संस्मरणों में भी खुद को बिस्मिल से बेहद प्रभावित बताया है. बिस्मिल उनके लिए भारतीय क्रांति के प्रतीक थे. यूं तो बिस्मिल पर भी पाशा का जादू सिर चढ़कर बोलता था. वर्ष 1922 में, तुर्की में विजय दिवस मनाया गया, तो बिस्मिल ने ‘प्रभा’ पत्रिका में ‘विजयी कमाल पाशा’ शीर्षक से लेख लिखा था.

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