सिरप के लिए पर्ची की अनिवार्यता अच्छी पहल, पढ़ें डॉ चंद्रकांत लहारिया और डॉ नीलम मोहन का आलेख

सिरपों के लिए पर्ची अनिवार्य करना अच्छी शुरुआत है, लेकिन कुछ और कदमों की भी जरूरत है. इसके साथ सरकार और सभी हितधारकों को मिलकर ऐसी दवा व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें उत्पाद सुरक्षित हों, पर्चियां विवेकपूर्ण हों, फार्मासिस्ट जवाबदेह और नागरिक जागरूक हों.

डॉ चंद्रकांत लहारिया, वरिष्ठ चिकित्सक और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ
डॉ नीलम मोहन, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और भारतीय बाल रोग अकादमी की राष्ट्रीय अध्यक्ष

केंद्र सरकार के फैसले के मुताबिक, अब कोई भी सिरप, जिसमें कफ सिरप भी शामिल है, बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलेगी. पिछले साल अक्तूबर में मध्य प्रदेश के एक जिले में दूषित कफ सिरप पीने के बाद बच्चों की मौत की बात सामने आयी थी. उस त्रासदी के बाद जांच हुई, कुछ नियामकीय कार्रवाई भी की गयी और यह स्पष्ट है कि उसी घटना की स्मृति ने इस नये नीतिगत फैसले को आकार दिया है. देश में सभी प्रकार के सिरपों का अत्यधिक इस्तेमाल होता है. खास तौर पर कफ सिरप का उपयोग बहुत व्यापक और दुरुपयोग ही आम है. बहुत से लोग बिना किसी डॉक्टरी सलाह, जांच या निदान के सिरप खरीद लेते हैं. वायरल सर्दी-जुकाम में भी, जहां ऐसे सिरप से बहुत कम लाभ होता है, इन्हें दिया जाता है. सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बावजूद छोटे बच्चों को भी खूब कफ सिरप पिलाया जाता है.

कई परिवारों में यह धारणा बनी हुई है कि मीठा तरल है, इसलिए नुकसानदायक नहीं होगा. लेकिन कई सिरपों में एंटीहिस्टामिन, डिकंजेस्टेंट, नींद लाने वाले तत्व, ओपिऑइड या अल्कोहल जैसे सॉल्वेंट हो सकते हैं, जो लाभ से अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे में नये निर्णय से मनमानी खरीद पर कुछ रोक लग सकती है. खास तौर पर जब बच्चे को खांसी होती है, तो माता-पिता चिंतित हो जाते हैं. अक्सर उन्हें लगता है कि डॉक्टर से मिलने का मतलब तभी पूरा हुआ, जब कोई सिरप लिखा जाये. यदि डॉक्टर सिरप न लिखे, तो कई परिवार इसकी मांग करते हैं. बहुत से लोग पुरानी पर्चियां संभालकर रखते हैं और मिलते-जुलते लक्षणों पर वही सिरप या दवा फिर खरीद लेते हैं. ऐसी स्थिति में पर्ची की अनिवार्यता दवा के बेवजह इस्तेमाल को रोकने में मदद कर सकती है.

कफ सिरप में अधिकतर मामलों में पर्ची की अनिवार्यता पहले भी थी, पर अब जागरूकता आयेगी,
लेकिन कुछ और कदमों की भी जरूरत है. मध्य प्रदेश की त्रासदी इसलिए नहीं हुई थी कि कफ सिरप बिना पर्ची के मिला. वह इसलिए हुई थी कि दूषित उत्पाद बच्चों तक पहुंच गया था. जब डायएथिलीन ग्लाइकोल या एथिलीन ग्लाइकोल जैसे औद्योगिक रसायन, जिन्हें दवा में कभी नहीं होना चाहिए, किसी सिरप में पहुंच जाते हैं, तो गलती बिक्री के काउंटर पर नहीं, उससे बहुत पहले हो चुकी होती है. पर्ची उपयोग को नियंत्रित कर सकती है, लेकिन खराब बैच को शुद्ध नहीं कर सकती.

दूसरे देशों से कुछ उपयोगी सीख मिलती है. अमेरिका में खांसी और सर्दी की कई दवाएं अब भी बिना पर्ची के मिलती हैं, पर नियामक संस्थाएं दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों में इनके उपयोग के खिलाफ चेतावनी देती हैं और कंपनियां सामान्यतः चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों में इनके उपयोग से बचने की सलाह लेबल पर लिखती हैं. ब्रिटेन में कई कफ और कोल्ड प्रिपरेशन छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अनुशंसित नहीं हैं, जबकि छह से बारह वर्ष के बच्चों में इनके उपयोग में फार्मासिस्ट की निगरानी पर जोर है. उन देशों ने केवल पर्ची पर भरोसा नहीं किया. उन्होंने उम्र-आधारित प्रतिबंध, चेतावनी लेबल, फार्मासिस्ट परामर्श, नियंत्रण व्यवस्था, प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग और सतत निगरानी को साथ जोड़ा है.

हर स्तर पर पर्ची अनिवार्य करना एक ऐसा मौका है, जो भारत को बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाने के बारे में सोचने का अवसर देता है. इसके साथ पहला कदम यह होना चाहिए कि डॉक्टरों में नये सिरे से जागरूकता लाई जाये कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को, सिवाय अत्यंत विशेष परिस्थितियों में विशेषज्ञ की सलाह पर, कफ और कोल्ड सिरप न लिखे जायें और न दिये जायें. बड़े बच्चों में भी देखभाल की शुरुआत आश्वासन, पर्याप्त तरल पदार्थ, जरूरत पड़ने पर बुखार नियंत्रण, सलाइन ड्रॉप्स और खतरे के संकेतों पर स्पष्ट सलाह से होनी चाहिए. यह जन-जागरूकता लानी होगी कि अधिकांश खांसी वायरल होती है, अपने आप ठीक होती है और उसके लिए सिरप की जरूरत नहीं होती.

हां, माता-पिता को उन लक्षणों के बारे में जरूर जागरूक किया जाना चाहिए, जिनके दिखने पर वे बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जायें. दूसरा, दवा निर्माण की निगरानी मजबूत करनी होगी. हर ओरल लिक्विड दवा में, खासकर जब ग्लिसरीन, प्रोपिलीन ग्लाइकोल या सोर्बिटॉल जैसे एक्सिपिएंट इस्तेमाल हों, जहरीले ग्लाइकोल की जांच अनिवार्य होनी चाहिए. यह जांच हर बैच की हो, उसका रिकॉर्ड हो और उसे ट्रेस किया जा सके. बार-बार उल्लंघन करने वालों पर मुकदमा और लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए. तीसरा, भारत को तेज व प्रभावी दवा रिकॉल प्रणाली चाहिए. किसी उत्पाद के दूषित होने का संदेह हो, तो सूचना घंटों में फैलनी चाहिए. बैच नंबर, फार्मेसी, डॉक्टर, अस्पताल और जनता से जुड़ा राष्ट्रीय डिजिटल ड्रग रिकॉल प्लेटफॉर्म जीवन बचा सकता है.

चौथा, डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को भी अपनी कार्यशैली बदलनी होगी. पर्ची में बीमारी का निदान, बच्चे की उम्र के अनुसार खुराक और दवा की अवधि स्पष्ट लिखी जानी चाहिए. जरूरत होने पर सिंगल-कंपोनेंट कफ सिरप को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. मिश्रित कफ सिरपों का सामान्य और लापरवाह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. फार्मासिस्ट अभिभावकों को सलाह दें. डॉक्टरों और बाल रोग विशेषज्ञों के पेशेवर एसोसिएशनों की भी उतनी ही जिम्मेदारी और भागीदारी है. उन्हें सरल और व्यावहारिक दिशानिर्देश जारी करने चाहिए, जिन्हें व्यस्त क्लिनिक और फार्मेसी में भी लागू किया जा सके. साथ ही, सबूतों पर आधारित दवा लिखने को बढ़ावा देना चाहिए, व्यावहारिक क्लिनिकल गाइडलाइंस तैयार करनी चाहिए, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के लिए लगातार मेडिकल शिक्षा का आयोजन करना चाहिए और आम लोगों को दवाओं के सही इस्तेमाल के बारे में जागरूक करना चाहिए.

मीडिया भी जन-स्वास्थ्य के मामले में अहम भूमिका निभाता है. जिम्मेदार रिपोर्टिंग से गलतफहमियां दूर की जा सकती हैं. समुदाय को भागीदार बनाना होगा. बाल रोग विशेषज्ञ, पारिवारिक चिकित्सक और स्थानीय मीडिया तीन सरल संदेश पहुंचा सकते हैं : छोटे बच्चों को अपने मन से दवा न दें; पुराना सिरप दोबारा इस्तेमाल न करें; और किसी भी दवा के बाद यदि बच्चे में पेशाब कम हो, लगातार उल्टी हो, सुस्ती आये, सांस तेज चले या बीमारी बिगड़ती दिखे, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें. सिरपों के लिए पर्ची अनिवार्य करना अच्छी शुरुआत है. इसके साथ सरकार और सभी हितधारकों को मिलकर ऐसी दवा व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें उत्पाद सुरक्षित हों, पर्चियां विवेकपूर्ण हों, फार्मासिस्ट जवाबदेह और नागरिक जागरूक हों. (ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >