प्रेमचंद के साहित्य को अक्सर हिंदू-मुस्लिम एकता का साहित्य कहकर उसकी व्याख्या कर दी जाती है. यह आंशिक सत्य है. वस्तुतः प्रेमचंद का सांप्रदायिकता-विरोध किसी भावुक सद्भाववाद का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचना को समझने वाली उनकी ऐतिहासिक दृष्टि का अंग है. वे सांप्रदायिकता को धर्मों के बीच का संघर्ष नहीं मानते, बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक चेतना का परिणाम मानते हैं जो मनुष्य को उसकी वास्तविक समस्याओं से हटाकर धार्मिक पहचान में बांध देती है, इसलिए प्रेमचंद का साहित्य सांप्रदायिकता का केवल नैतिक प्रतिरोध नहीं करता, बल्कि उसकी वैचारिक भूमि को भी चुनौती देता है.
इस संदर्भ में उनका लेख सांप्रदायिकता और संस्कृति अत्यंत महत्वपूर्ण है. वहां प्रेमचंद स्पष्ट लिखते हैं कि सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि सांप्रदायिक राजनीति का गहरा विश्लेषण है. प्रेमचंद समझते हैं कि सांप्रदायिक शक्तियां संस्कृति की रक्षा के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से अलग करती हैं. इसलिए उनके साहित्य में संस्कृति किसी धर्म की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि साझा सामाजिक जीवन की निर्मिति है.
यही दृष्टि पंच परमेश्वर में दिखाई देती है.सामान्यतः इस कहानी को हिंदू-मुस्लिम मित्रता की कहानी कहा जाता है, जबकि उसका वास्तविक केंद्र न्याय की नैतिक सत्ता है.जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की मित्रता से अधिक महत्वपूर्ण उनका न्यायबोध है. पंच बनने के बाद दोनों अपनी धार्मिक और व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठ जाते हैं. प्रेमचंद यहां यह स्थापित करते हैं कि न्याय की संस्कृति ही सांप्रदायिकता का सबसे बड़ा प्रतिरोध है.
ईदगाह में भी प्रेमचंद सांप्रदायिकता का प्रतिरोध किसी प्रत्यक्ष घोषणा से नहीं करते. हामिद और अमीना के माध्यम से वे मुस्लिम जीवन को उसी आत्मीयता से चित्रित करते हैं, जिस आत्मीयता से वे होरी या धनिया को चित्रित करते हैं. यहां मुसलमान ‘अन्य’ नहीं रह जाता. साहित्य की यह संवेदनात्मक शक्ति सांप्रदायिकता की उस मानसिकता को तोड़ती है जो दूसरे समुदाय को पराया बनाकर देखती है.
कर्मभूमि में यह प्रश्न अधिक राजनीतिक रूप ग्रहण करता है. अमरकांत और सलीम की मित्रता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की उस चेतना का प्रतिनिधित्व करती है जो धार्मिक विभाजन को स्वतंत्रता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानती है. सकीना का चरित्र भी इसी साझी मनुष्यता का विस्तार है. प्रेमचंद यहां केवल सद्भाव की बात नहीं करते, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि सांप्रदायिकता सत्ता के लिए उपयोगी और जनता के लिए विनाशकारी होती है.
प्रेमचंद के विचारों को उनके लेख महाजनी सभ्यता के बिना भी पूरा नहीं समझा जा सकता. वहां वे स्पष्ट करते हैं कि समाज की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक शोषण है. यही दृष्टि गोदान में विकसित होती है. होरी हिंदू है, मिर्ज़ा खुर्शेद मुसलमान; लेकिन दोनों के बीच निर्णायक प्रश्न धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन और मानवीय संबंध हैं. प्रेमचंद का संकेत स्पष्ट है- भूख का कोई धर्म नहीं होता, शोषण की कोई जाति नहीं होती. सांप्रदायिकता मनुष्य को उसके वास्तविक शत्रु से हटाकर एक कृत्रिम शत्रु के सामने खड़ा कर देती है।
यहीं प्रेमचंद का साहित्य अपने समय से आगे जाता है.फिर भी उनकी आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक है.उन्होंने सांप्रदायिकता की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को पहचाना, किंतु उसके समाधान का सबसे बड़ा आधार मनुष्य की नैतिक चेतना को बनाया.उनके पात्र अंततः न्याय और करुणा की ओर लौट आते हैं.प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति केवल नैतिक अपील से पराजित की जा सकती है? शायद नहीं.आज हमें प्रेमचंद के मानवतावाद को लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के प्रश्नों से जोड़कर पढ़ना होगा.
फिर भी प्रेमचंद की प्रासंगिकता इसी में है कि उन्होंने सांप्रदायिकता का प्रतिरोध भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसे पात्रों की रचना करके किया जो मनुष्यता को धर्म से बड़ा मूल्य मानते हैं.जुम्मन शेख, अलगू चौधरी, हामिद, अमीना, अमरकांत, सलीम, सकीना और मिर्ज़ा खुर्शेद- ये सभी पात्र मिलकर उस भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं जिसकी नींव किसी एक धर्म पर नहीं, बल्कि साझा जीवन, न्याय और करुणा पर टिकी है।
इसलिए प्रेमचंद का सांप्रदायिकता-विरोध केवल साहित्यिक विषय नहीं, बल्कि भारतीय आधुनिकता का एक बुनियादी सांस्कृतिक हस्तक्षेप है. उन्होंने यह सिखाया कि संस्कृति का अर्थ भिन्नताओं को मिटाना नहीं, बल्कि भिन्नताओं के बीच मनुष्यता की रक्षा करना है. यही प्रेमचंद की सबसे बड़ी वैचारिक विरासत है और यही उनके साहित्य की स्थायी प्रासंगिकता.
