खाद्यान्न प्रचुरता से घटी गरीबी

गरीबों के सशक्तीकरण की कल्याणकारी योजनाओं से गरीबी में कमी आयी. असंगठित कामगारों की दिहाड़ी में बढ़ोतरी हुई. छोटी जोत वाले किसानों की आय में भी बढ़ोतरी हुई.

डॉ जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

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कई प्रमुख आर्थिक संगठनों और एजेंसियों की रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि भारत में खाद्यान्न प्रचुरता के कारण विभिन्न चुनौतियों के बीच भी गरीबी में कमी आयी है. विश्व बैंक के रिसर्च पेपर में कहा गया है कि देश में 2011 में अति गरीबी की दर 22.5 प्रतिशत थी, वह 2015 में 19.1 प्रतिशत रही तथा 2019 में अति गरीबी की दर घट कर मात्र 10 प्रतिशत आ गयी. आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो जहां 2011 से 2015 के बीच अति गरीबी की दर में 3.4 प्रतिशत की कमी आयी, वहीं 2015 से 2019 के बीच अति गरीबी की दर में 9.1 प्रतिशत की गिरावट हुई, जो 2011-15 के मुकाबले 2.6 गुना अधिक है.

इस रिसर्च पेपर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल (2015-19) में ग्रामीण और शहरी दोनों ही गरीबी में 2011-15 के मुकाबले काफी कमी आयी है. इस अ‌वधि में ग्रामीण गरीबी दर में 4.4 प्रतिशत की गिरावट हुई, जबकि 2015-19 के बीच ग्रामीण गरीबी में 10.3 प्रतिशत की गिरावट रही. शहरी गरीबी में 2011-15 के बीच 1.3 प्रतिशत की कमी आयी, जबकि 2015-19 के बीच शहरी गरीबी में 6.6 प्रतिशत की गिरावट रही. विश्व बैंक द्वारा इसके कई महत्वपूर्ण कारण बताये गये हैं. कहा गया है कि गरीबों के सशक्तीकरण की कल्याणकारी योजनाओं से गरीबी में कमी आयी. असंगठित कामगारों की दिहाड़ी में बढ़ोतरी हुई. छोटी जोत वाले किसानों की आय में भी बढ़ोतरी हुई.

विश्व बैंक के रिसर्च पेपर में लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था का अध्ययन शामिल नहीं है. वहीं आइएमएफ के रिसर्च पेपर में कोविड की पहली लहर 2020-21 के प्रभावों को भी अध्ययन में शामिल करते हुए कहा गया है कि सरकार के पीएमजीकेएवाई के तहत मुफ्त खाद्यान्न कार्यक्रम ने कोविड-19 की वजह से लॉकडाउन के प्रभावों की गरीबों पर मार को कम करने में अहम भूमिका निभायी है. आइएमएफ ने कहा है कि खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम कोविड-19 से प्रभावित वित्तीय वर्ष 2020-21 को छोड़ कर अन्य वर्षों में गरीबी घटाने में सफल रहा है.

कार्य पत्र में अमेरिकी शोध संगठन प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट को खारिज किया गया है, जिसमें कहा गया है कि महामारी ने भारत में साल 2020 में 7.5 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया है. आइएमएफ ने कहा है कि प्यू का अध्ययन चलन से बाहर हो चुके संदर्भ पर आधारित था. कहा गया है कि 2020-21 के दौरान करीब 1.5 से 2.5 करोड़ लोग गरीबी में आ गये थे, लेकिन 80 करोड़ लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से खाद्यान्न के मुफ्त वितरण की व्यवस्था ने बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी से उबारने में मदद की है.

दुनियाभर में यह रेखांकित हो रहा है कि कोरोनाकाल में गरीबों के सशक्तीकरण में करीब 44 करोड़ जनधन खातों, करीब 130 करोड़ आधार कार्ड तथा 118 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ताओं की शक्ति वाले जैम से सुगठित डिजिटल ढांचे की असाधारण भूमिका रही है. इसी शक्ति के बल पर देश के गरीब लोगों के खातों में सीधे आर्थिक राहत हस्तांतरित हो सकी और डिजिटल हुई सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से गरीब लोगों की थैलियों में मुफ्त खाद्यान्न सौंपकर उनके चेहरों पर मुस्कुराहट दी जा सकी है.

हाल ही के वर्षों में देश में खाद्यान्नों के रिकॉर्ड उत्पादन से खाद्यान्न प्रचुरता का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है. फसल वर्ष 2021-22 में देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड 31.60 करोड़ टन पर पहुंचने का अनुमान है. इस वर्ष गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 11.13 करोड़ टन रहने का अनुमान है. साल 2021-22 के दौरान चावल का कुल उत्पादन 12.79 करोड़ टन रिकॉर्ड अनुमानित है. भारत गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और दुनिया में 2020 में गेहूं के कुल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 14.14 फीसदी थी, वह अब लगातार बढ़ती जा रही है. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक, देशभर में किसानों को दी जा रही 6000 रुपये वार्षिक पीएम सम्मान निधि, किसानों के लिए लागू की गयी विभिन्न योजनाओं के सफल क्रियान्वयन, कृषि शोध और किसानों के परिश्रम से खाद्यान्न उत्पादन वर्ष-प्रतिवर्ष रिकॉर्ड ऊंचाई बनाते हुए दिखायी दे रहा है.

इसमें कोई दो मत नहीं है कि कोविड-19 के बाद और रूस-यूक्रेन संकट के कारण बढ़ती महंगाई के बीच एक बार फिर देश में खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम गरीब वर्ग को सहारा देते हुए दिखायी दे रहा है. कोरोना महामारी शुरू होने के बाद मोदी सरकार ने अप्रैल 2020 में गरीबों को मुफ्त राशन देने के लिए पीएमजीकेएवाई की शुरुआत की थी. पीएमजीकेएवाई के तहत लाभार्थी को उसके सामान्य कोटे के अलावा प्रति व्यक्ति पांच किलो मुफ्त राशन दिया जाता है. पीएमजीकेएवाई के तहत अप्रैल 2020 से लेकर इस साल मार्च 2022 तक सरकार 2.60 लाख करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. इस साल अप्रैल से सितंबर 2022 तक 80 करोड़ जनता को मुफ्त में राशन देने से सरकार पर 80 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आयेगा. इस प्रकार खाद्य सुरक्षा से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना पर सरकार इस साल सितंबर तक 3.40 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी.

हम उम्मीद करें कि इस समय रूस-यूक्रेन युद्ध से बढ़ती हुई वैश्विक गरीबी की चुनौतियों के बीच एक बार फिर देश में अप्रैल से सितंबर 2022 तक के लिए लागू प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ गरीब लोगों को मुफ्त खाद्यान्न की आपूर्ति से देश में गरीबी बढ़ने पर नियंत्रण किया जा सकेगा. साथ ही देश में गरीबी, भूख और कुपोषण खत्म करने के लिए लागू की गयी जनकल्याण योजनाओं, सामुदायिक रसोई व्यवस्था तथा पोषण अभियान-2 को पूरी तरह कारगर व सफल बनाये जाने से देश में और अधिक गरीबी में कमी आने का परिदृश्य दिखायी दे सकेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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