अमेरिका से समझौते में हमारे कृषि हित, पढ़ें अभिजीत मुखोपाध्याय का आलेख

India US Trade Deal: भारत-अमेरिकी व्यापार समझौते का जो अंतरिम ढांचा सामने आया है, वह केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि पर विश्वास का वक्तव्य है. जहां आवश्यक हो, वहां संरक्षण और जहां संभव हो, वहां महत्वाकांक्षा को जोड़ते हुए सरकार ने ऐसा समझौता तैयार किया है, जो आने वाले वर्षों में किसानों के लिए वास्तविक अवसर और समृद्धि का मार्ग खोल सकता है- और वैश्विक एकीकरण को खतरे के बजाय विकास के मंच में बदल सकता है.

India US Trade Deal: भारत–अमेरिका व्यापार समझौते की अंतरिम रूपरेखा में कृषि क्षेत्र नयी दिल्ली और भारतीय किसानों के लिए सबसे स्पष्ट रणनीतिक उपलब्धियों में से एक के रूप में चुपचाप उभरा है. वैश्विक खाद्य बाजारों में अनिश्चय के दौर में यह समझौता भारतीय कृषि उत्पादकों के लिए निर्यात अवसरों के विस्तार को देश के सबसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की मजबूत सुरक्षा के साथ जोड़ता है. वाशिंगटन द्वारा जारी संयुक्त बयान में इस ढांचे को ‘ऐतिहासिक मील का पत्थर’ बताया गया है, जो पारस्परिक और संतुलित आधार पर बाजार तक पहुंच का विस्तार करेगा. भारत के लिए इस पुनर्संतुलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब भारतीय उत्पादों की एक व्यापक शृंखला के लिए अपने बाजार खोल रही है और भारत को दीर्घकालिक आर्थिक तथा भू-आर्थिक साझेदार के रूप में मान्यता दे रही है.

भारतीय अधिकारियों ने इस समझौते को घरेलू रियायतों के बजाय निर्यातकों के लिए नये अवसरों के रूप में प्रस्तुत किया है. केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने रेखांकित किया है कि यह ढांचा ‘भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर का बाजार खोलेगा और बड़ी संख्या में नये रोजगार पैदा करेगा’. यह संदेश ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में विशेष रूप से प्रभावी है, जहां कृषि निर्यात और उससे जुड़ी गतिविधियां स्थानीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं. भारत में किसी भी व्यापार समझौते की सबसे बड़ी राजनीतिक और नीतिगत कसौटी यह होती है कि वह छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका की रक्षा करता है या नहीं. इस दृष्टि से अंतरिम ढांचा पूरी तरह स्पष्ट है. गेहूं, चावल, पोल्ट्री, दूध और अन्य डेयरी व अनाज उत्पादों को टैरिफ रियायतों से ‘पूरी तरह बाहर’ रखा गया है. पीयूष गोयल ने कहा है कि मक्का, गेहूं, चावल, चीनी, सोयाबीन और पोल्ट्री जैसे वे कृषि व डेयरी उत्पाद, जिनका उत्पादन भारत में पर्याप्त मात्रा में होता है, शुल्क कटौती के दायरे में नहीं आएंगे.

मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषणों से पुष्टि होती है कि इस ढांचे के तहत भारत ने अमेरिका से सोयाबीन, मक्का, ईंधन एथेनॉल, कपास, डेयरी व पोल्ट्री उत्पादों के आयात के लिए बाजार नहीं खोले हैं, यानी यह समझौता न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली या इन संवेदनशील क्षेत्रों में भारतीय उत्पादकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को कमजोर नहीं करता. इन क्षेत्रों को सुरक्षित रखकर सरकार ने खाद्य सुरक्षा और किसान आय की आधारशिला मानी जाने वाली फसलों के चारों ओर एक स्पष्ट ‘लाल रेखा’ खींच दी है और यह संकेत दिया है कि वैश्विक बाजारों से जुड़ाव ग्रामीण स्थिरता की कीमत पर नहीं होगा. यह समझौता जहां नवाचारी है, वहीं यह भारतीय कृषि को मूल्य शृंखला में ऊपर ले जाने और उच्च-मूल्य वाले बाजारों से गहराई से जोड़ने को प्रोत्साहित करता है. यह ढांचा अमेरिकी पारस्परिक शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने का भी हिस्सा है, जिससे हाल के वर्षों में घटती प्रतिस्पर्धात्मकता को बहाल करने में मदद मिलेगी.

भारतीय अधिकारियों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मसाले, चाय, कॉफी, काजू और विभिन्न प्रकार के फल जैसे कई कृषि उत्पादों पर अब अमेरिकी बाजार में शून्य या बहुत कम शुल्क लगेगा. भारत उन उत्पादों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जहां उसे तुलनात्मक लाभ है- श्रम-प्रधान, जलवायु-विशेष और गुणवत्ता-आधारित फसलें, जो विदेशों में बेहतर कीमत प्राप्त कर सकती हैं. यह खासकर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां निर्यात मांग सीधे स्थानीय कीमतों को प्रभावित करती है. अमेरिकी उपभोक्ताओं तक बेहतर पहुंच उन्हें विशेष कॉफी, प्रीमियम चाय, मसाले, काजू और उष्णकटिबंधीय फलों के लिए बड़ा और स्थिर बाजार प्रदान करती है, जिससे खेत-स्तर पर बेहतर कीमतें और गुणवत्ता सुधार में निवेश को बढ़ावा मिलता है.

संयुक्त बयान का एक कम दिखाई देने वाला, पर महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत ने अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों से जुड़ी ‘पुरानी गैर-शुल्क बाधाओं’ को दूर करने और मानकों व अनुरूपता प्रक्रियाओं पर चर्चा करने की प्रतिबद्धता जतायी है. इसे अक्सर रियायत के रूप में देखा जाता है, पर यह भारतीय कृषि के लिए एक रणनीतिक अवसर भी है. मानकों पर संवाद के माध्यम से भारत अपने किसानों और निर्यातकों को दुनिया के सबसे कठिन बाजारों में से एक की तकनीकी, स्वच्छता और पादप-सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार कर रहा है. बेहतर ट्रेसबिलिटी (पता लगाने की क्षमता), गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन पर जोर लंबे समय में भारत की उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में निर्यात क्षमता को मजबूत करेगा.

व्यावहारिक रूप से मानकों के समन्वय और स्पष्ट नियमों से भारतीय खेपों की अस्वीकृति दर घटेगी, अनुपालन लागत कम होगी और उत्पादन क्षेत्रों में आधुनिक पैकहाउस, कोल्ड चेन और प्रसंस्करण सुविधाओं में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा. खासकर संगठित मूल्य शृंखलाओं और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) से जुड़े किसानों के लिए इसका अर्थ है अधिक स्थिर मांग, बेहतर कीमतें और निर्यात मूल्य में अधिक हिस्सेदारी. यह अंतरिम ढांचा केवल शुल्क और कोटे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक स्पष्ट संकेत भी देता है. ‘भारतीय किसानों और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की पूरी सुरक्षा’ के साथ व्यापक बाजार पहुंच की नीति अपनाकर सरकार यह संदेश दे रही है कि भारत वैश्विक व्यापार में आगे बढ़ते हुए भी अपने ग्रामीण आधार की रक्षा करेगा.

अमेरिकी पक्ष के अनुसार, भारत कुछ चुनिंदा अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों-जैसे पशु आहार के लिए सूखे अनाज, लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट-पर शुल्क घटाएगा. ये उत्पाद भारत के लिए पूरक या गैर-प्रतिस्पर्धी हैं और घरेलू उत्पादों को नुकसान पहुंचाये बिना विशिष्ट जरूरतों या सीमित उपभोक्ता वर्ग की मांग पूरी करते हैं. समग्र रूप से यह एक संतुलित और विश्वास-निर्माण वाला दृष्टिकोण दर्शाता है. यह अंतरिम व्यापार ढांचा केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि पर विश्वास का वक्तव्य है. जहां आवश्यक हो, वहां संरक्षण और जहां संभव हो, वहां महत्वाकांक्षा को जोड़ते हुए सरकार ने ऐसा समझौता तैयार किया है, जो आने वाले वर्षों में किसानों के लिए वास्तविक अवसर और समृद्धि का मार्ग खोल सकता है-और वैश्विक एकीकरण को खतरे के बजाय विकास के मंच में बदल सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अभिजीत मुखोपाध्याय

अभिजीत मुखोपाध्याय is a contributor at Prabhat Khabar.

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