मनरेगा के नये रूप में भ्रष्टाचार पर अंकुश

MNREGA : सरकार पर प्रति वित्तीय वर्ष प्रति परिवार 100 दिनों तक अकुशल श्रम कार्य उपलब्ध कराने की कानूनी बाध्यता है, और यदि लिखित या मौखिक मांग के 15 दिनों के भीतर काम नहीं दिया जाता, तो राज्य को बेरोजगारी भत्ता देना होता है. इस कारण मनरेगा केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि कानूनी रूप से प्रवर्तनीय अधिकार है.

MNREGA : मनरेगा , यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम एक अधिकार आधारित ग्रामीण रोजगार योजना है, जिसे 2005 में अधिनियमित किया गया और फरवरी, 2006 से लागू किया गया. यह देश के प्रत्येक ग्रामीण परिवार को राज्य से भुगतानयुक्त काम की मांग करने का कानूनी अधिकार देता है. इस अधिनियम के तहत किसी भी ग्रामीण परिवार के 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का कोई भी वयस्क सदस्य काम के लिए आवेदन कर सकता है.

सरकार पर प्रति वित्तीय वर्ष प्रति परिवार 100 दिनों तक अकुशल श्रम कार्य उपलब्ध कराने की कानूनी बाध्यता है, और यदि लिखित या मौखिक मांग के 15 दिनों के भीतर काम नहीं दिया जाता, तो राज्य को बेरोजगारी भत्ता देना होता है. इस कारण मनरेगा केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि कानूनी रूप से प्रवर्तनीय अधिकार है. दुनिया में कहीं भी इस स्तर पर रोजगार के अधिकार की कोई योजना नहीं है. अपनी विशालता और कानूनी संरचना के कारण यह विशिष्ट है. सूखा, कृषि संकट और कोविड-19 महामारी जैसे आर्थिक झटकों के समय इसने आर्थिक सुरक्षा कवच की भूमिका निभायी, जब लाखों प्रवासी श्रमिक गांव लौटे थे और इसी पर निर्भर थे.


इस योजना में कुछ बड़े बदलाव प्रस्तावित करते हुए 16 दिसंबर को संसद में विकसित भारत-ग्रामीण रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन विधेयक, 2025 (वीबी-जी राम जी) को प्रस्तावित कर दिया गया है और पारित होने पर अब यह विधेयक मनरेगा का स्थान लेगा. जहां सरकार नये विधेयक को विकसित भारत के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं विपक्ष इसका पुरजोर विरोध कर रहा है.

विपक्ष का कहना है कि सरकार जानबूझकर इस कानून से महात्मा गांधी का नाम हटाकर राजनीति कर रही है और वह रोजगार के कानूनी अधिकार को खत्म करना चाहती है. आज आवश्यकता इस बात की है कि इस विधेयक को विस्तार से समझा जाये कि वास्तव में इसके प्रावधान क्या हैं और इससे देश और ग्रामीण भारत को क्या फायदा या नुकसान हो सकता है.

वर्ष 2005 में बनाये गये इस अधिनियम के पीछे सोच यह थी कि ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को बेरोजगारी के कारण गरीबी से बचाने के लिए उन्हें आमदनी की गारंटी हो, लेकिन इसके साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों, जैसे जल संरक्षण परियोजनाएं, सिंचाई नहरें, ग्रामीण सड़कें, बाढ़ नियंत्रण संरचनाएं और भूमि विकास से जुड़े कार्य भी किये जा सकें.


इस योजना के वित्तपोषण की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी, क्योंकि इस अधिनियम के पीछे सोच यह थी कि रोजगार एक अधिकार है. समझना होगा कि यह योजना रोजगार की मांग से चलती है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्षों में इस योजना में मजदूरी की दर बढ़ा कर इसे आकर्षक तो बनाया गया है, लेकिन रोजगार के लिए पंजीकृत करने हेतु दिवसों में भारी कमी आयी है. इसका अभिप्राय यह है कि ग्रामीण लोगों को अन्य स्रोतों से अतिरिक्त रोजगार मिलने लगा है, जो मनरेगा से अधिक आकर्षक है. ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ है. विकसित भारत बनने का संकल्प आज दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होता जा रहा है.

ऐसे में सरकार का यह मानना है कि मनरेगा कानून में भी आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है. हालांकि विधेयक में 100 दिनों के स्थान पर 125 दिन तक और वनवासी क्षेत्रों में तो 150 दिनों तक रोजगार देने का प्रावधान रखा गया है, लेकिन अब इसका वित्तपोषण अकेले केंद्र सरकार नहीं करेगी, बल्कि इसमें राज्य सरकारों का भी दायित्व होगा. गौरतलब है कि 2005 में केंद्रीय राजस्व में राज्य सरकारों का हिस्सा मात्र 32 फीसदी था, जो अब बढ़कर 42 फीसदी हो चुका है.

चौदहवें वित्त आयोग ने राज्यों के हिस्से को यही कह कर बढ़ाया था, ताकि वे कल्याणकारी योजनाओं का भार वहन कर सकें. हालांकि जो राज्य पहले से बजट घाटे का सामना कर रहे हैं, उनके लिए चिंता बढ़ सकती है. विपक्ष का आरोप तो यह भी है कि बजट से जुड़ी परेशानी के कारण कहीं योजना का उद्देश्य ही खतरे में न पड़ जाये. मनरेगा का उद्देश्य बेरोजगारी के दिनों में आय सुरक्षा देना था. लेकिन कृषि मौसम में श्रमिक मनरेगा की ओर आकर्षित रहते हैं, जिस कारण खेतों में श्रमिकों की कमी के चलते मजदूरी लागत बढ़ जाती है. इससे किसान की लागत में वृद्धि हो जाती है और खेती की प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है.

नये विधेयक में इस समस्या का समाधान निकाला गया है और रोजगार गारंटी कार्यक्रम में खेती के लिए आवश्यक 60 दिनों में इस कार्यक्रम को स्थगित रखने का प्रावधान रखा गया है. इसके साथ ही कार्यों में भी समय के साथ बदलाव करते हुए इसमें जल सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजी-रोटी से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, और खराब मौसम की घटनाओं को कम करने को शामिल करने के साथ-साथ इन योजनाओं को पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान के साथ भी जोड़ा गया है.


मनरेगा का सबसे बड़ा दोष यह था कि तमाम प्रयासों के बावजूद इसमें भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा था. ग्राम पंचायत और खंड स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण बड़ी मात्रा में सरकारी धन की लूट हो रही थी. कई योजनाओं में कागजों पर ही तमाम निर्माण हो जाते थे. नये अधिनियम में भ्रष्टाचार को बाहर रखने के लिए नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रावधान है. जैसे कि लेन-देन के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, योजना निर्माण एवं निगरानी के लिए भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) प्रौद्योगिकी, वास्तविक समय में निगरानी हेतु मोबाइल एप्लिकेशन आधारित डैशबोर्ड, तथा साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण प्रणाली को शामिल किया गया है.

गौरतलब है कि इससे पहले प्रधानमंत्री आवास योजना में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए उसमें भ्रष्टाचार पर बड़ा अंकुश लगाया गया है. उसी तर्ज पर प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए रोजगार गारंटी योजना में भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की उम्मीद है. देश में कई विशेषज्ञों द्वारा मनरेगा का विरोध इस आधार पर हो रहा था कि इसके चलते कृषि और उद्योग क्षेत्र में श्रमिकों की कमी हो रही है. हालांकि कृषि में श्रमिकों की कमी की समस्या को तो कुछ हद तक नये अधिनियम में हल करने का प्रयास हुआ है, लेकिन मनरेगा के कारण उद्योगों और कृषि की सहायक गतिविधियों हेतु श्रमिकों की कमी के समाधान का प्रयास करना भी जरूरी था.

विपक्ष संसद में नामकरण के मुद्दे के बजाय यदि नये अधिनियम में देश की आवश्यकता के अनुरूप प्रावधान शामिल कराने हेतु बहस करता, तो मनरेगा के नये अवतार में कुछ और सुधार भी शामिल किये जा सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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