जलवायु परिवर्तन और बेलगाम ‘विकास’ ने पड़ोसी देश नेपाल में भीषण तबाही को जन्म दिया. यह तबाही हमें बताती है कि नदियों और पहाड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार दोबारा नहीं गढ़ा जा सकता. नेपाल में हुई तबाही दशकों से चली आ रही उस इंजीनियरिंग सोच का ही परिणाम है, जिसमें यह मान लिया गया कि नदियों और पहाड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार फिर से गढ़ा जा सकता है, लेकिन जाहिर है, ऐसा नहीं किया जा सकता. नेपाल में जो कुछ हो रहा है, वह निश्चित रूप से सामान्य नहीं है. वहां हुई तबाही का पैमाना कितना व्यापक है, इस बारे में बात करने की कोशिश करते हुए मेरे पास शब्द कम पड़ जाते हैं.
जाहिर है कि इस तबाही की तीव्रता और भयावहता सामान्य नहीं है. आखिर ऐसा क्यों हुआ? जिस सोच की मैं बात कर रही हूं, उसका एक अभिन्न हिस्सा हमारे विकास की अवधारणा है और मेरा मानना है कि यह भी इसके पीछे एक प्रमुख कारण है. वास्तविकता यह है कि किसी भी कीमत पर आर्थिक वृद्धि हासिल करने की हमारी लापरवाह प्रवृत्ति अब भयावह विनाश के रूप में हमारे सामने आ रही है. सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायर्नमेंट यानी सीएसइ में हम पहाड़ों में विकास के विरोधी नहीं हैं. हम कहीं भी विकास के विरोधी नहीं हैं. हम जिस चीज के खिलाफ हैं, वह दरअसल विकास का विवेकहीन तरीका है, जिसमें किसी क्षेत्र के पर्यावरणीय, भौगोलिक और पारिस्थितिक मानकों को समझे बिना ही निर्माण और विकास कार्य शुरू कर दिये जाते हैं.
हिमालय न केवल दुनिया की सबसे युवा पर्वत प्रणालियों में से एक है, बल्कि यह अत्यंत संवेदनशील तथा असुरक्षित भू-क्षेत्र भी है, लेकिन हमने अपनी लापरवाह गतिविधियों के जरिये इसे और अधिक संवेदनशील तथा असुरक्षित बना दिया है. इसके साथ-साथ जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी जुड़ा हुआ है. भारत सहित वैश्विक दक्षिण के कई देश लंबे समय से इसका गंभीर असर झेल रहे हैं. अपने यहां का ही उदाहरण लें, तो पिछले वर्ष अगस्त में पंजाब में 31 में से 24 दिनों तक आइएमडी के वर्गीकरण के अनुसार ‘भारी’ और ‘अत्यधिक भारी’ बारिश हुई थी. आइएमडी के मुताबिक, 24 घंटे में 115 मिलीमीटर से अधिक बारिश को ‘भारी’ और 204 मिलीमीटर से अधिक बारिश को ‘अत्यधिक भारी’ बारिश माना जाता है. वह महज मूसलाधार बारिश नहीं थी, बल्कि 'बाइबिल' में वर्णित प्रलय जैसी भयावह बाढ़ थी. यही स्थिति देश के हिमालयी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तथा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में भी देखने को मिली.
पिछले साल हिमाचल प्रदेश में भी बारिश ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये थे. तीन महीनों के दौरान राज्य की पर्वतीय ढलानों पर 90 प्रतिशत से अधिक दिनों में भारी और अत्यधिक भारी बारिश हुई थी. इसके अलावा बादल फटने की घटनाओं के कारण अचानक बाढ़ भी आयी. तथ्य यह है कि दुनिया अब भी उन उत्सर्जनों में कटौती करने के लिए संघर्ष कर रही है, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं. ऐसे में, यह आशंका और बढ़ जाती है कि आने वाले समय में इसके असर और अधिक घातक होंगे. लेकिन अगर हम यह अच्छी तरह समझ लें कि निर्णायक मोड़ आ चुका है, तो हम निर्माण और विकास के अपने तरीके को बदल सकते हैं, ताकि बाढ़ या बादल फटने की अगली घटना हमें कम से कम नुकसान पहुंचाये. सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि जलवायु किस तरह बदल रही है.
वास्तविकता यह है कि इस मौसम में दिखाई दे रही निराशा और तबाही का एक बड़ा कारण मौसम प्रणाली में आया व्यवधान है, जिसका संबंध जलवायु परिवर्तन से है. हम यह जानते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ-साथ बारिश की मात्रा बढ़ेगी और यह बारिश पहले की तुलना में कम दिनों में होगी. हम इसका असर पहले देख चुके हैं और अब भी लगातार देख रहे हैं. हकीकत यह है कि पूरे मौसम की बारिश कुछ ही घंटों में बरस जाती है, लेकिन इस बदलते मौसम के पीछे और भी कई कारण काम कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, पश्चिमी विक्षोभ, जो सामान्य परिस्थितियों में एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, लेकिन अब अनियमित व्यवहार कर रहा है. कुल मिलाकर आसमान में परिस्थितियां बेहद जटिल हो गयी हैं. महासागरों के गर्म होने से लेकर आर्कटिक क्षेत्र के तापमान बढ़ने और भूमध्य रेखा तथा उत्तरी ध्रुव के बीच तापमान के अंतर में कमी आने तक कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं.
इस अस्थिरता का असर अब हमें आसमान से आने वाली बाढ़ के रूप में झेलना पड़ रहा है. ऐसा लगता है कि प्रकृति का प्रतिशोध हमारे सामने है और यह खत्म होने वाला नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में स्थिति और खराब होने की ही आशंका है. इसी कारण हम लापरवाह नहीं हो सकते. न ही केवल जलवायु परिवर्तन को दोष देकर अपनी सामान्य भाग्यवादिता के सहारे यह कह सकते हैं कि आखिर इंसान कर ही क्या सकता है. यह विनाश ईश्वर की देन नहीं है. इसमें हमारी अपनी भूमिका बहुत बड़ी है और इसका परिणाम अब हमारे दरवाजे पर खड़ा है. जलवायु परिवर्तन दरअसल उन उत्सर्जनों का परिणाम है, जिन्हें हमने आर्थिक विकास और मानवीय लालच के लिए वायुमंडल में छोड़ा है. जिस तरह हम विकास की अपनी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे हम जानबूझकर और लगातार इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं.
उदाहरण के लिए, हम बाढ़ संभावित क्षेत्रों में निर्माण कर रहे हैं. जहां जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, वहां उसकी योजना नहीं बनाते. हम संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में अतिक्रमण कर रहे हैं. उन क्षेत्रों में हम घरों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में लगे हुए हैं, लेकिन एक बार भी इस तथ्य पर गंभीरता से विचार नहीं करते कि ये क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय हैं, ये दुनिया की सबसे युवा पर्वत शृंखलाओं में शामिल हैं और इनकी ढलानें भूस्खलन के लिए स्वाभाविक रूप से संवेदनशील हैं. जब मैं कहती हूं कि अब बहुत हो चुका है, तब मैं चाहती हूं कि आप मेरी बेचैनी को समझें. अनुकूलन और आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता पर केवल चर्चा करते रहने का समय अब बीत चुका है. हम जलवायु परिवर्तन के युग में जी रहे हैं. हम ऐसे विनाशकारी दौर से गुजर रहे हैं, जो विशाल और शक्तिशाली पहाड़ों को भी घुटनों पर ला सकता है. मानवीय अहंकार, इनकार और विवेकहीनता का समय अब समाप्त हो जाना चाहिए. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
