जनता को हल्के में लेना भारी पड़ा नेपाल सरकार को, पढ़ें डॉ. धनंजय त्रिपाठी का आलेख

Nepal Protest : नेपाल की स्थिति सुधारने के बारे में कोई सोचता तक नहीं है. नेपाल में राजशाही के अंत के बाद लोगों को लगा था कि प्रजातंत्र देश की स्थिति को बदल देगा. राजनीतिक दलों ने भी ऐसा करने का वादा किया था.

Nepal Protest : नेपाल में सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर प्रतिबंध के विरोध में युवा सड़कों पर हैं. शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब हिंसक हो चला है. सेना ने राष्ट्रीय सुरक्षा अपने हाथों में ले ली है. देशभर में कर्फ्यू लागू है. ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि युवाओं द्वारा सरकार का इस कदर विरोध करने का एकमात्र कारण क्या सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना है या फिर मामला कुछ और है.


यह सच है कि युवाओं के नाराज होने का एकमात्र कारण सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नहीं है. क्योंकि आज जो युवा ओली सरकार के विरोध में हैं, उनमें से कई ओली के समर्थक भी रहे हैं. तो युवाओं की नाराजगी के पीछे मूलत: तीन प्रमुख कारण हैं. पहला, जब से नेपाल में राजशाही का अंत हुआ है, तब से वहां एक भी सरकार स्थिर नहीं रह पायी है. वह अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने में विफल रही है. सरकार में फेरबदल होते रहे हैं, सब लड़-झगड़ कर बस सत्ता में आना चाहते हैं.

नेपाल की स्थिति सुधारने के बारे में कोई सोचता तक नहीं है. नेपाल में राजशाही के अंत के बाद लोगों को लगा था कि प्रजातंत्र देश की स्थिति को बदल देगा. राजनीतिक दलों ने भी ऐसा करने का वादा किया था. पर जब ऐसा होता नहीं दिखा, तब राजनीतिक प्रणाली को लेकर लोगों में निराशा घर करने लगी. दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि पूरा दक्षिण एशिया, जिसमें नेपाल भी शामिल है, दुनिया का सबसे युवा क्षेत्र माना जाता है. यानी यहां बड़ी संख्या में युवा हैं.

अब जब युवा बड़ी संख्या में हैं, तो स्वाभाविक-सी बात है कि उनकी जरूरतें हैं, उनके सपने हैं. वे अच्छी पढ़ाई-लिखाई, अच्छे शैक्षणिक संस्थान के साथ रोजगार के अच्छे अवसर भी चाहते हैं. जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. नेपाल की 15 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की जनसंख्या के बीच 20 से 22 प्रतिशत की बेरोजगारी है. एक अन्य आंकड़ा बताता है कि नेपाल की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या अंडर एंप्लॉयड है. यानी उनके पास काम तो है, पर उनकी योग्यता, कुशलता और शैक्षणिक स्थिति से कम क्षमता वाले.


तीसरा महत्वपूर्ण कारण है सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार. बीते एक वर्ष से यहां भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बना हुआ था. जो नौजवान हैं, वे कुछ समय से सोशल मीडिया पर लगातार इन बातों को चिह्नित कर रहे थे कि नेताओं के बच्चे, उनका परिवार तो विलासितापूर्ण जीवन जी रहा है, और आम जनता को मूलभूत जरूरतें पूरी करने में भी परेशानी आ रही है. युवा इन सब बातों को लेकर भीतर ही भीतर उबल रहे थे, इस बीच सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसने आग में घी का काम किया.

एक कारण और है जिसके बारे में बहुत कम बात हो रही है. वह है ओली के काम करने का तानाशाही रवैया. इसी रवैये के साथ वह बीते कुछ समय से काम कर रहे थे. ओली पर जब भी कोई मुसीबत आती है, तो वह भारत के साथ सीमा विवाद का मुद्दा उभार देते हैं. राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काने लगते हैं. अपनी इस कार्यशैली से वे चीजों को प्रबंधित तो कर रहे थे, परंतु जमीनी स्तर पर कुछ बदल नहीं रहा था. ओली ने नेपाली जनता को, उनकी परेशानियों को हल्के में लेना शुरू कर दिया था. वह यह मानकर चल रहे थे कि नेपाल के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, जो हैं सो वही हैं.


एक बात और. नेपाल के बहुत से लोग अपना काम-धाम सोशल मीडिया के जरिये करते हैं. प्रतिबंध से उनके काम-काज प्रभावित हुए हैं. दूसरी बात, नेपाल की एक बड़ी जनसंख्या देश से बाहर रहती है, सो नेपाल के लोग अपने सगे-संबंधियों से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. मगर प्रतिबंध ने वह संपर्क काट दिया. सोशल मीडिया नेपाल में प्रेशर कुकर का भी काम कर रहा था. लोग सरकार से गुस्सा हो रहे थे, और सोशल मीडिया पर लिखकर अपनी भड़ास निकाल रहे थे. उसे भी सरकार ने बंद कर दिया. तो जब प्रेशर कुकर से प्रेशर निकलने की संभावना सरकार ने बंद कर दी, तब विस्फोट होना तय था. अब बात भारत की.

चूंकि नेपाल भारत का पड़ोसी है और उसके साथ हमारी खुली सीमा है, तो हमें थोड़ा सजग व सतर्क रहने की जरूरत है. नेपाल के मामले में किसी तरीके का हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है. हमें बस उस पर नजर बनाये रखने की जरूरत है. इसके साथ ही, वहां जो भी सरकार बनती है, हमें उसके साथ तालमेल बढ़ाने की आवश्यकता है. इस समय भारत की नीति ‘प्रतीक्षा करो और देखो’ की होनी चाहिए.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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