Neo-Dravidianism : सी विजय जोसेफ ने तमिलनाडु में उस विचारधारा का सूत्रपात किया है जिसे कई विश्लेषक ‘नव द्रविड़वाद’ कहते हैं. लगभग एक शताब्दी पुरानी द्रविड़ अवधारणा आज चुनौती के दौर से गुजर रही है. सिर्फ 27 महीने पुरानी तमिल वेट्ट्री कषगम (टीवीके) ने तमिलनाडु की राजनीति पर पिछले 72 वर्षों से प्रभुत्व रखने वाली दो बड़ी पार्टियों, डीएमके और एआइएडीएमके, की राजनीतिक पकड़ को चुनौती दी है. विजय ने यह सफलता जेन जेड की डीएमके विरोधी भावना और ‘मन्नार आच्ची’, अर्थात वंशवादी शासन के विरोध को आधार बनाकर हासिल की.
सरल शब्दों में कहें, तो क्या डीएमके की नवीनतम पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले उदयनिधि स्टालिन, विजय की ‘सुनामी’ और तथाकथित ‘नव द्रविड़ युग’ के उत्साह का मुकाबला कर पायेंगे, जिसे उन पांच महान नेताओं के नामों के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है, जिन्होंने करोड़ों वंचित तमिलों के लिए सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया था? यह स्पष्ट संकेत है कि राजनीति की दिशा मुख्य मार्ग से बदलकर वैकल्पिक मार्ग की ओर जा रही है. आने वाले 10 से 15 वर्षों तक टीवीके के तमिलनाडु की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की संभावना है. विजय डीएमके, एआइएडीएमके तथा जिला स्तर की जाति आधारित पार्टियों जैसे पीएमके, वीसीके और एनटीके को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का प्रयास करेंगे. यदि भाजपा नेता के अन्नामलाई द्वारा अलग पार्टी बनाने की अटकलें सही साबित होती हैं, तो वह उदयनिधि के अतिरिक्त टीवीके के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है. विजय और टीवीके सीधे द्रविड़ विचारधारा से संघर्ष नहीं कर रहे हैं.
इसके बजाय वे पांच नेताओं के नामों का उपयोग करते हुए उस विचारधारा को आकार दे रहे हैं, जिसे मैं ‘नव द्रविड़ विजयवाद’ कहता हूं. ये पांच नेता हैं : के कामराज, इवी रामासामी ‘पेरियार’, वेलु नचियार, अंजलाई अम्माल और बीआर आंबेडकर. अक्तूबर, 2024 में टीवीके की शुरुआत करते समय विजय ने पार्टी की जाति विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक विचारधारा पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि पार्टी द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं मानेगी. उनके शब्दों में, ‘ये इस भूमि की दो आंखें हैं.’
मेरे विश्लेषण के अनुसार, फिल्म जगत से आये नेताओं ने धीरे-धीरे पारंपरिक द्रविड़ मॉडल के क्षरण में योगदान दिया. द्रविड़ आंदोलन की मूल संस्था से कई शाखाओं ने जन्म लिया- डीके, डीएमके, एआइएडीएमके, एमडीएमके, डीएमडीके और एएमएमके. तमिलनाडु के फिल्मी नायकों ने अपने प्रशंसक वर्ग को सफलतापूर्वक राजनीतिक वोट बैंक में बदल दिया और इस प्रक्रिया में उन्हें कठोर द्रविड़ विचारधारा से दूर ले गये.
उन्होंने सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की मशाल को जीवित रखा तथा यह सुनिश्चित किया कि वंचित वर्गों के लिए आरक्षण 69 प्रतिशत तक बना रहे. पर साथ ही, उन्होंने आंदोलन की दिशा भी बदल दी. वर्ष 1972 में एमजी रामचंद्रन ने यह सिद्ध कर एक बड़ा मोड़ ला दिया कि द्रविड़ नेता होते हुए भी कोई व्यक्ति ईश्वर में गहरी आस्था रख सकता है. उन्होंने 17 अक्तूबर, 1972 को एआइएडीएमके की स्थापना की और 1977 में मुख्यमंत्री बने. एक अन्य फिल्मी सितारा जयललिता राजनीति में आयीं और 1991 में मुख्यमंत्री बनीं. उनके उदय ने द्रविड़ राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल दी. उनका करिश्मा 2016 तक छह कार्यकालों में उनकी राजनीतिक श्रेष्ठता बनाये रखने में सफल रहा. इसी बीच एक और फिल्मी व्यक्तित्व विजयकांत ने 14 सितंबर, 2005 को डीएमडीके की स्थापना की. उन्होंने कुछ हद तक द्रविड़ संस्कृति के क्षरण को रोकने का प्रयास किया.
अब सी विजय जोसेफ ने एमके स्टालिन की डीएमके को चुनौती देते हुए सात दशकों से चली आ रही द्रविड़ राजनीतिक प्रभुता को ललकारा है. विजय ने पेरियार और आंबेडकर की सामाजिक न्याय संबंधी विरासतों की नयी व्याख्याएं प्रस्तुत करते हुए ‘विजयवाद’ की शुरुआत की है. टीवीके ने ब्राह्मणों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया है, जिसमें हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग जैसा संवेदनशील मंत्रालय भी शामिल है. साथ ही उन्होंने आठ दलितों को महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी सौंपी है.
द्रविड़ विचारधारा के अलोकप्रिय होने का पहला कारण जेन जेड है. दूसरा कृत्रिम बुद्धिमत्ता. तीसरा द्रविड़ पहचान पर वंशवादी नियंत्रण. चौथा भ्रष्टाचार के आरोप.
पांचवां वृद्ध होते नेताओं की युवा पीढ़ी को आत्मसम्मान आंदोलन से जोड़ने में विफलता. पिछले दो दशकों में द्रविड़ राजनीति की स्थिरता के सामने चुनौतियां अधिक बढ़ी हैं. डिजिटलीकरण, एआइ, वीआर और अन्य तकनीकी परिवर्तनों ने युवाओं की आकांक्षाओं को बदल दिया है. तमिलनाडु एक ऐसे नये युग में प्रवेश कर चुका है, जहां जेन जेड राजनीतिक विमर्श को तेजी से प्रभावित कर रही है. आज ऐसा कोई प्रभावशाली नेता दिखाई नहीं देता, जो विभिन्न द्रविड़ विभाजित संगठनों को एक मंच पर लाकर जस्टिस पार्टी और पेरियार की विरासत के और अधिक क्षरण को रोक सके. टीवीके नेता विजय सामाजिक न्याय के क्षेत्र में बने इस शून्य को ‘नव द्रविड़ विजयवाद’ के माध्यम से भरने की दिशा में आगे बढ़ते प्रतीत होते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
