पश्चिमी मीडिया की शरारत

पश्चिमी सरकारों के साथ-साथ वहां के मीडिया संस्थान भी भारत-विरोधी आख्यान रचने में लगे हुए हैं.

हाल के समय में पश्चिमी मीडिया में भारत को लेकर नकारात्मक रिपोर्टों और लेखों की संख्या तेजी से बढ़ी है. इस रवैये को देखकर लगता है कि पश्चिम के अखबारों, चैनलों और पत्रिकाओं ने एक अभियान जैसा छेड़ दिया है. विदेश मंत्री जयशंकर ने उचित ही रेखांकित किया है कि जैसे-जैसे भारत प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है और उसका प्रदर्शन बेहतर हो रहा है, शेष विश्व भारत को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है. इसकी वजह यह है कि भारत का अच्छा विकास कई तरह से दुनिया को प्रभावित करने की संभावना रखता है.

इससे विभिन्न देश, विशेषकर पश्चिमी राष्ट्र, आशंकित हैं. पश्चिमी सरकारों के साथ-साथ वहां के मीडिया संस्थान भी भारत विरोधी आख्यान रचने में लगे हुए हैं. अक्सर देखा जाता है कि मानवाधिकार, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के बहाने भारत के आंतरिक मामलों के बारे में अपुष्ट एवं अधूरी बातें की जाती हैं. कुछ समय पहले अमेरिका और जर्मनी की ओर से हमारे देश की कानूनी प्रक्रिया तथा चुनावी व्यवस्था पर अनावश्यक टिप्पणी की गयी थी. फिर अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से मानवाधिकार हनन के बारे में आधारहीन रिपोर्ट जारी की गयी. द वाशिंगटन पोस्ट ने सूत्रों के हवाले से भारतीय एजेंसियों पर मनगढ़ंत आरोप लगाते हुए एक रिपोर्ट छाप दी. फिर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को जेनोफोबिक यानी दूसरे लोगों को नापसंद करने वाला देश कह दिया.

अमेरिका और यूरोप के लगभग सभी बड़े अखबारों और चैनलों में नकारात्मक खबरों की बाढ़ सी आ गयी है. जयशंकर ने आगाह किया है कि हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए और उसके प्रतिकार के लिए तैयार रहना चाहिए. पश्चिमी समाजों में तमाम समस्याएं हैं. मानवाधिकार हनन के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं. पश्चिमी देश दुनियाभर में युद्ध, गृहयुद्ध और षड्यंत्रों में शामिल रहते हैं. उन्होंने अपने यहां भारत समेत कई देशों के अतिवादियों, अलगाववादियों, आतंकवादियों एवं अपराधियों को पनाह दी है. वे अपने साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक अतीत को लेकर भी शर्मिंदा नहीं हैं. भारत की यह नीति रही है कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता तथा सभी देशों से अच्छे संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है.

संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में कहा गया है कि देशों को एक-दूसरे के अंदरूनी मसलों पर बोलने से परहेज करना चाहिए. यह विडंबना ही है कि राजशाही के स्वामित्व के अंतर्गत चलने वाले मीडिया संस्थान भी भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं. अब भारत को ऐसे व्यवहारों की निंदा करने और प्रतिक्रिया देने से आगे बढ़कर उन देशों और उनकी मीडिया को भी आईना दिखाना चाहिए.

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Published by: संपादकीय

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