महाराष्ट्र के नतीजों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा

Maharashtra Municipal Elections Result: महाराष्ट्र निकाय चुनावों में भाजपा की जीत से देवेंद्र फडणवीस का सितारा बुलंद होगा, जबकि कांग्रेस की शिकस्त के बाद द्रमुक शायद ही तमिलनाडु चुनाव में उसे भाव दे. ऐसे ही, ठाकरे बंधुओं तथा दोनों पवार गुटों के लिए चुनावी नतीजा सख्त संदेश है.

Maharashtra Municipal Elections Result: महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव के नतीजे जहां एनसीपी के दोनों खेमों के लिए खतरे की घंटी है, वहीं उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली शिवसेना और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे के लिए संघर्ष करते रहने का संदेश है. इन नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को संदेश दिया है कि उसे वोट चोरी के आरोपों की बजाय जमीनी संघर्ष की ओर लौटना होगा और शिवसेना जैसी पार्टियों से दूरी बनानी होगी. राज्य के इन नतीजों ने सेकुलर राजनीति के योद्धाओं को भी संदेश दिया है कि अगर उनके पास ठोस राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होंगे, तो कभी वे चुनावी फायदे के लिए कट्टर हिंदुत्व के अतीत वाले राजनीतिक दलों का साथ लेंगे, तो अल्पसंख्यक वोट असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की तरफ रुख कर सकता है. नतीजों ने राज्य के सबसे कद्दावर नेता माने जाते रहे शरद पवार और उनके भतीजे को भी सख्त संदेश दिये हैं कि ढुलमुल और दोतरफा राजनीति करने वालों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है.

महाराष्ट्र में बेशक कांग्रेस और एनसीपी के दोनों धड़ों ने उद्धव की शिवसेना के साथ स्पष्ट गठबंधन नहीं किया था, पर उनकी कोशिश भाजपा की अगुआई वाली महायुति के प्रभाव को सीमित करने की थी, जिसमें वे नाकाम रहे. पवार अपने गढ़ पुणे और आसपास के इलाकों में कमाल नहीं दिखा पाये, तो कांग्रेस विदर्भ में भी कुछ नहीं कर पायी. जबकि विदर्भ में वह भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रही है. इन चुनावी नतीजों से राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के लिए मुश्किलें होंगी. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने जा रहे चुनावों में वह ज्यादा ताकत हासिल करने की कोशिश कर रही है. द्रमुक से गठबंधन में पार्टी को 25 सीटें मिलती रही हैं, इस बार उसने 40 सीटों की उम्मीद लगा रखी है. पर महाराष्ट्र में शिकस्त के बाद द्रमुक शायद ही कांग्रेस को उतना भाव दे. कांग्रेस को अब अपनी रणनीति बदलने और शिवसेना (यूबीटी) के साथ गठबंधन पर सोचना होगा. महाराष्ट्र्र की सियासी ताकत बनी बाल ठाकरे की शिवसेना की बुनियाद मुंबई रही है. बेशक भाजपा का सहयोग रहा हो, पर 25 साल से मुंबई की बृहन्नमुंबई महानगरपालिका पर शिवसेना का कब्जा रहा है.

पच्चीस वर्षों से उसी का मेयर चुना जाता रहा. शिवसेना दोफाड़ हो चुकी है और दोनों धड़े बाल ठाकरे की विरासत का दावा कर रहे हैं. उद्धव ठाकरे अपनी शिवसेना को असली मानते हैं, जबकि चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के खेमे को मूल शिवसेना मान लिया है. बीएमसी के चुनावों में उद्धव को उम्मीद थी कि उनकी शिवसेना पर ही मुंबई के लोग भरोसा जताएंगे. पर उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर खिसक गयी, जबकि पहले नंबर पर भाजपा उभरी है. शिंदे की शिवसेना के साथ देश की सबसे बड़ी नगर महापालिका पर अब भाजपा की अगुआई वाली महायुति का कब्जा हो चुका है. बीएमसी पर कब्जे का महत्व ज्यादा है. इसका बजट 74 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, जो गोवा, हिमाचल, अरुणाचल, दिल्ली आदि राज्यों के बजट से भी ज्यादा है.

उद्धव ठाकरे के बेटे की हार से उनके राजनीतिक अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं. राज ठाकरे के सामने भी यही सवाल उठ रहा है, क्योंकि 19 साल बाद दोनों साथ आये थे. लगता है कि उद्धव का कांग्रेस के साथ जाना महाराष्ट्र और मुंबई के लोगों को रास नहीं आया. महाराष्ट्र के लोगों को देवेंद्र फड़णवीस ने ठीक से समझा. जालना जैसे मराठवाड़ा के कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो हर जगर भाजपा और उसके सहयोगी ही दिख रहे हैं. फड़णवीस के मुताबिक, राज्य में 29 नगर निगमों के चुनाव हुए, जिनमें से 25 पर महायुति ने कब्जा कर लिया है. बाल ठाकरे के जमाने से शिवसेना का जोर महाराष्ट्र की अस्मिता बचाने पर रहता था. शिवसेना ने बेहद सतर्कता के साथ मराठी अस्मिता का ऐसा राजनीतिक जाल बुना, जिसके इर्द-गिर्द महाराष्ट्र के सियासी दलों का अस्तित्व जुड़ गया. पर जिस तरह से नगर निकाय चुनावों में उद्धव ठाकरे की शिवसेना, विपक्षी कांग्रेस और एनसीपी के दोनों खेमों को शिकस्त मिली है, उससे यही लगता है कि इन दलों के लिए अस्तित्व बचाना अब बड़ी चुनौती होगा. इस बीच ओवैसी की पार्टी ने जैसा प्रदर्शन किया है, उससे साफ है कि मुस्लिम मतदाताओं का ध्यान अब कांग्रेस की बजाय उसकी तरफ है. उसे राज्य भर में 125 सीटें मिली हैं. बिहार के बाद महाराष्ट्र में प्रभावी प्रदर्शन का असर वह पश्चिम बंगाल के चुनाव में दिखाने की कोशिश करेगी.

ऐसे ही, पहले विधानसभा चुनाव, फिर नगर निगम चुनावों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद शिवसेना का शिंदे गुट अपनी ताकत बढ़ाने की सोचेगा. जबकि देवेंद्र फड़णवीस इस जीत के बाद राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी हो सकते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन उन्हें पहले से ही हासिल है. ये नतीजे अजित पवार के लिए बड़ा झटका हैं. उन्होंने महायुति से अलग अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की थी,पर जनता ने उन्हें नकार दिया है. ऐसे में, एनसीपी का दोनों खेमा साथ आने की सोचने लगे, तो हैरत नहीं. जाहिर है, महाराष्ट्र के नतीजों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रह सकता. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >