भाजपा को अपनी जीत का भरोसा

यह कहकर कि उनकी पार्टी और सहयोगी दल 400 सीटें जीतेंगे, मोदी ने संख्या के आख्यान को निर्देशित कर दिया है.

दिमागी खेल से चुनाव का फैसला होता, तो भाजपा अब तक जीत चुकी होती और नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बन चुके होते. लेकिन अभी लोकसभा के चुनाव बाकी हैं, जिनमें 90 करोड़ से अधिक लोग मतदान करेंगे. लेकिन मोदी के लिए ऐसा लगता है कि यही नतीजा होगा. यह कहकर कि उनकी पार्टी और सहयोगी दल 400 सीटें जीतेंगे, मोदी ने संख्या के आख्यान को निर्देशित कर दिया है. उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि समूची चुनावी चर्चा उनकी संख्या के इर्द-गिर्द हो, न कि शासन और कामकाज पर. अपनी संभावित जीत का बड़े अंतर का माहौल बनाकर उन्होंने विरोधियों को निरुत्साहित और अपने समर्थकों को उत्साहित करने की कोशिश की है. अगर भाजपा 370 सीट जीतती है, तो पिछली बार जीती गयीं कांग्रेस की 54 सीटें आधी रह जायेंगी. संभवतः अपनी ऐतिहासिक तीसरी जीत पर आश्वस्त होकर उन्होंने अगले माह के शुरू में कैबिनेट की बैठक बुलायी है, जिसमें उनकी अगली सरकार के पहले सौ दिनों की योजना पर चर्चा होगी. आंकड़ों को लेकर उनके भरोसे पर विश्लेषण किया जाना चाहिए.

महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक सत्तारूढ़ दल के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं. इन राज्यों की कुल 116 सीटों में 106 भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास हैं. अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव के कारण बिहार और महाराष्ट्र का महत्व बढ़ गया है. बिहार में भाजपा और जद(यू) गठबंधन ने 2019 में 40 में से 39 सीटों पर जीत दर्ज की थी. फिर नीतीश कुमार एनडीए से नाता छोड़ लालू प्रसाद के राजद के साथ कुछ समय के लिए चले गये थे और फिर भाजपा के साथ वापस आ गये. इससे मुख्यमंत्री की विश्वसनीयता और पिछड़ी जातियों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को बड़ा नुकसान पहुंचा है. साल 2019 में भाजपा ने अपनी सभी 17 सीटों पर जीत हासिल की थी और जद(यू) एक सीट हारी थी तथा 16 सीटें जीती थीं. उनके अन्य सहयोगी एलजेपी ने भी अपनी सभी छह सीटों पर जीत दर्ज की थी.

अब सवाल पूछा जा रहा है कि क्या नीतीश कुमार पिछले प्रदर्शन को दोहरा सकते हैं और क्या चिराग पासवान के नेतृत्व में एलजेपी भी अपनी सभी सीटें जीत सकती है. इस पर चर्चा जारी है, पर भाजपा जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है. लेकिन अगर जद(यू) और एलजेपी ने कुछ सीटें गंवा दी तो? विशेषज्ञों ने इसका एक उत्तर खोज निकाला है. उनका कहना है कि भाजपा का स्ट्राइक रेट अच्छा है, तो वह ऐसे नुकसान की भरपाई कर देगी. इसका मतलब यह है कि भाजपा अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी. पर यह मुख्यमंत्री और चिराग पासवान पर निर्भर करेगा.

ऐसे ही संदेह महाराष्ट्र और कर्नाटक को लेकर भी व्यक्त किये गये हैं. भाजपा और अविभाजित शिव सेना ने महाराष्ट्र में 48 में से 41 सीटें जीती थीं. अब, जब शिव सेना और एनसीपी में विभाजन हो गया है और नेताओं ने पाला बदला है, तो परिणाम को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है. क्या मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिव सेना 18 सीटें जीत सकती है या क्या भाजपा अधिक सीटों पर लड़ेगी ताकि एनडीए की संख्या ऊपर जाये? कर्नाटक में कांग्रेस आगे दिख रही है क्योंकि हाल में उसने विधानसभा जीता है और भाजपा राज्य इकाई में अभी भी समस्याएं बनी हुई हैं. साल 2019 में 10 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की 92 में से भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पायी थी. इनमें आंध्र प्रदेश की 25, केरल की 20 और तमिलनाडु की 39 सीटें शामिल हैं.

पार्टी के अपने शोध के अनुसार, भाजपा देश के लगभग 175 क्षेत्रों में शायद ही कभी जीती है. इनमें तीन दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ पूर्वोत्तर और पश्चिम का बड़ा हिस्सा भी शामिल है. चुनाव न लड़ने वाले केंद्रीय मंत्री वरिष्ठ राज्यसभा सांसदों के साथ पिछले एक साल से इन क्षेत्रों में डेरा डाले हुए हैं और विकसित भारत के मोदी मंत्र का प्रचार कर रहे हैं. भाजपा ने अपने को यह भरोसा दिलाया है कि वह इन राज्यों से कम से कम सौ सीटें पहली बार जीत सकती है. शीर्ष नेतृत्व ने लोगों को विश्वास दिलाया है कि तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल में बड़ी जीत के साथ 370 सीटों का उसका लक्ष्य पूरा होगा. पार्टी कर्नाटक में 25 सीटें कायम रखते हुए तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 101 में से 40 सीटें जीतने की अपेक्षा रखती है.

तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक के हाशिये पर जाने से भाजपा अपने सहयोगियों की कुल संख्या से अधिक सीटों पर लड़ने की योजना बना रही है. इन राज्यों में मोदी सबसे अधिक चुनावी सभाओं को संबोधित करेंगे तथा छोटी पार्टियों के साथ जाति-आधारित गठबंधन होगा और विचारधारा के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह स्थानीय सिलेब्रिटी उम्मीदवार बनाये जायेंगे. भाजपा का जादुई लक्ष्य पश्चिम बंगाल में 18 से अधिक सीटें जीतने के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है. उसे विश्वास है कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भारी आक्रोश और संदेशखाली के मौजूदा आंदोलन से पासा पलट जायेगा. भाजपा को 370 सीटों के लक्ष्य को पाने से पहले उसे उत्तर भारत में और पश्चिम के कुछ हिस्सों में अपने लगभग सौ प्रतिशत के स्ट्राइक रेट को दोहराना होगा. उदाहरण के लिए, आठ राज्यों- उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड- में 127 में से भाजपा ने 121 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उसने कांग्रेस को गुजरात में सभी 26, मध्य प्रदेश में 25, हरियाणा में 10 (अभी एक रिक्त है) और दिल्ली में सात सीटों पर मात दी थी. गठबंधन के साथ 400 सीटों की ओर बढ़ने के लिए भाजपा को इन राज्यों में उतनी ही सीटें जीतनी पड़ेगी.

इनमें से कुछ राज्यों में इंडिया गठबंधन आकार ले रहा है, इसलिए भाजपा को अपनी जीत दोहराने के लिए मोदी की अतिरिक्त खुराक देनी होगी. बहरहाल, ये आंकड़े ऐसे नहीं हैं कि सुन्न कर दें. साल 1984 को छोड़ दें, तो कभी भी किसी पार्टी ने अपने सहयोगियों के साथ 400 की संख्या पार नहीं की है. इंदिरा गांधी की त्रासद हत्या के बाद ही कांग्रेस 404 सीटें जीत सकी थी. लेकिन 2024 का साल 1984 नहीं है. कोई भी भावनात्मक मुद्दा दांव पर नहीं है. मोदी के भरोसे का एकमात्र कारण यह प्रतीत होता है कि उन्हें अपने आप पर और अपने जादुई मंत्रों पर विश्वास है. लेकिन सर्व-ज्ञानी होना सर्व-शक्तिशाली होने की हमेशा गारंटी नहीं होता. उनके विरोधी भाजपा से पूछते हैं- ‘क्या आपको 2004 का इंडिया शाइनिंग नारा याद है?’ लेकिन 2004 में मोदी भी नहीं थे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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