हमेशा गांधी-नेहरू को दोष देना गैरजरूरी है

अभी संपन्न हुए संसद के शीत सत्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने संसदीय बहस को लगातार जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी की आलोचना में तब्दील कर दिया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इन दो व्यक्तित्वों को कृषि संकट, शहरों की ओर प्रवासन या युवा बेरोजगारी जैसी ज्वलंत समस्याओं की तुलना में ज्यादा बार उद्धृत किया गया था. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बहुत प्रगति की है. ऐसे में, गांधी और नेहरू पर आरोप लगाना न सिर्फ गैरजरूरी है, बल्कि यह रणनीति खुद का नुकसान करने वाली है.

अतीत की गलतियों की ओर लगातार अंगुली उठाना राष्ट्रीय पुनर्जागरण का रास्ता नहीं है. इसके बजाय यह राजनीतिक असुरक्षा का ही आत्मस्वीकार है. जो नेतृत्व वर्तमान की स्पष्ट रूपरेखा खींचने के बजाय अतीत को दोषी ठहराता है, वह अपनी असहजता को ही रेखांकित करता है. जॉर्ज सेंटायना की प्रसिद्ध उक्ति है कि जो लोग इतिहास को भूल जाते हैं, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं. फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट ने महामंदी का सामना करते हुए अपने उठाये कदमों से अमेरिका का आत्मविश्वास वापस लौटाया था. उन्होंने अपने पूर्ववर्ती हरबर्ट हूवर को लगातार कोसने का काम नहीं किया था. देंग श्याओ पिंग ने सत्ता की विचारधारा को पीछे रख कर चीन की आर्थिक रूपरेखा तैयार की थी. गंभीर नेता आगे बढ़ते रहते हैं, जबकि असुरक्षित नेता अतीत की ओर लौटते हैं.

यह प्रवृत्ति भारत के समकालीन राजनीतिक विमर्श का प्रमुख तत्व है. आज अतीत के फैसलों को गलत ठहराने की आदत शासन चलाने की एक प्रणाली बन गयी है. अभी-अभी संपन्न संसद के शीत सत्र में यह प्रवृत्ति जितनी दिखाई पड़ी, उतनी इससे पहले शायद ही दिखी हो, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने संसदीय बहस को लगातार जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी की आलोचना में तब्दील कर दिया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इन दो व्यक्तित्वों को कृषि संकट, शहरों की ओर प्रवासन या युवा बेरोजगारी जैसी ज्वलंत समस्याओं की तुलना में ज्यादा बार उद्धृत किया गया था. इसके निहितार्थ स्पष्ट थे, वह यह कि भारत का चुनावी भविष्य नीतिगत फैसलों पर कम और अतीत की घटनाओं के नैतिक फैसलों पर अधिक निर्भर है. शीत सत्र में इस प्रवृत्ति को और विस्तार मिला, जब ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने और चुनाव सुधार पर केंद्रित बहसों को नेहरू और गांधी की आलोचना में बदल दिया गया.

अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने नेहरू पर आरोप लगाया कि मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के दबाव में आकर ‘वंदे मातरम’ के आधिकारिक गायन में सिर्फ शुरुआती दो पदों की अनुमति देकर उन्होंने इसे कमजोर किया. प्रधानमंत्री का आरोप था कि नेहरू का वह फैसला तुष्टीकरण का उदाहरण था, जिसने राष्ट्रीय एकता को कमजोर किया. उनके इस आरोप पर, कि नेहरू ने 1937 में विभाजनकारी शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया था, संसद में बवाल मच गया, जिससे बहस का उद्देश्य ही खो गया. उसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी राष्ट्रीय प्रतीकों से लेकर चुनावी शुचिता जैसे मुद्दों पर नेहरू और गांधी को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया. भाजपा का उद्देश्य स्पष्ट है : वह नेहरू और गांधी को राष्ट्र निर्माताओं के बजाय तुष्टीकरण के सूत्रधारों के रूप में पेश करना चाहती है.

पिछले लगभग एक दशक से इन अतीत नायकों की निष्ठुर जांच-पड़ताल जारी है. नेहरू की कश्मीर नीति, धर्मनिरपेक्षता की उनकी प्रतिबद्धता, उनकी विदेश नीति, यहां तक कि उनके निजी पत्राचार भी राजनीतिक हमलों के हथियार बने हुए हैं. महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को अपने हिसाब से उद्धृत किया जाता है या अप्रासंगिक कर दिया गया है. लेकिन उनकी हत्या के पीछे की वैचारिक सोच को छेड़ा नहीं गया है. एक खास प्रतीकात्मक घटना 15 दिसंबर को घटी, जब संसद ने महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट की जगह विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन बिल पारित किया. सरकार ने नये विधेयक में किये गये बदलावों को रेखांकित किया, जैसे-गारंटीशुदा कार्यदिवसों की संख्या 100 से बढ़ा कर 125 दिन करना तथा प्रदर्शन पर आधारित विकास कार्य. इसके बावजूद महात्मा गांधी का नाम हटाये जाने को विपक्ष ने जानबूझकर राष्ट्रपिता के महत्व को खत्म करने का आरोप लगाया. इस कार्यक्रम को उस नैतिक दृष्टिकोण से अलग कर दिया गया, इसके बावजूद इसकी तकनीकी विशेषताओं को सुधार बताया गया.

गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के दौर की चुनावी अनियमितताओं पर हमला बोला और नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के समय वोट चोरी का आरोप लगाया. फिर गायब हुए ‘नेहरू पेपर्स’ पर विवाद हुआ, जब भाजपा ने पहले कांग्रेस पर गलत सूचना देने का आरोप लगाया, फिर कहा कि 2008 में ये दस्तावेज सोनिया गांधी को दे दिये गये थे. यह प्रसंग जानी-पहचानी राजनीतिक प्रवृत्ति के बारे में ही बताता है-यानी पहले आरोप लगाओ, फिर सफाई दो. इस पर कांग्रेस और बौद्धिक उदारवादियों का जवाब उतना ही करारा था, हालांकि उसमें कोई दिशा नहीं थी. सोनिया गांधी ने घटनाक्रम की निंदा करते हुए इसे नेहरू को दोषी ठहराने का षड्यंत्र बताया. इतिहासकार इरफान हबीब ने भारत की औद्योगिक प्रगति की नींव रखने की दिशा में नेहरू के योगदान पर जोर डाला, तो उदारवादियों ने नागरिक अधिकार आंदोलनों के क्षेत्र में गांधी के वैश्विक प्रभाव को रेखांकित किया.

प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रस्ताव रखा कि नेहरू की तमाम गलतियां बताने के लिए संसद का एक विशेष सत्र रखा जाये, ताकि हर गलती के लिए नेहरू को जवाबदेह ठहराने की प्रवृत्ति पर हमेशा के लिए विराम लगे. नेहरू की विफलताओं पर चर्चा होनी चाहिए-चीन के प्रति उनके रोमांटिक आदर्शवाद, 1962 की हार तथा अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी नीति पर बात हो. पर तकनीकी संस्थाओं के गठन, भाखड़ा नंगल जैसी परियोजनाओं तथा एकता व विविधता को संवैधानिक ढांचे से संतुलित करने जैसी उनकी उपलब्धियों पर भी चर्चा होनी चाहिए. गांधी के अहिंसा के आंदोलन ने न सिर्फ आजादी की गारंटी दी, बल्कि इसने दुनियाभर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को मजबूत किया.

पीछे की ओर क्यों देखा जा रहा है? क्योंकि यह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है. परंतु तब यह रवैया बहुत आश्चर्यजनक है, जब मोदी के नेतृत्व में भारत ने बहुत प्रगति की है. वर्ष 2014 से देश की अर्थव्यवस्था दोगुने से भी बड़ी हो गयी है. आर्थिक विकास दर सात-आठ फीसदी के आसपास बनी हुई है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सालाना 80 अरब डॉलर से अधिक है. विकास योजनाओं से गरीबी घटी है. डिजिटल ढांचे से न सिर्फ सेवाओं का वितरण सुधरा है, बल्कि इससे लाखों नौकरियां पैदा हुई हैं. नवीकरणीय ऊर्जा नेतृत्व, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी और जी-20 की अध्यक्षता जैसी कूटनीतिक उपलब्धियां वास्तविक विकास के बारे में बताती हैं. इस पृष्ठभूमि में गांधी और नेहरू पर आरोप लगाना न सिर्फ गैरजरूरी है, बल्कि यह रणनीति खुद का नुकसान करने वाली है.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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