सही रास्ते पर है भारतीय अर्थव्यवस्था

Indian economy : आइएमएफ की इसी महीने आयी ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में आगामी वित्त वर्ष में भी भारत की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत पर बने रहने की बात कही गयी है. वैश्विक वृद्धि दर इस वर्ष 3.1 प्रतिशत तक धीमी रहने के अनुमान के बीच आइएमएफ भारत को विश्व की सबसे टिकाऊ आर्थिक शक्तियों में से एक मानता है.

Indian economy : अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 6.5 फीसदी कर दिया है, जो जनवरी के 6.4 प्रतिशत के अनुमान से अधिक है. इसका कारण अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी किये जाने से मिलने वाले लाभ को माना गया है. विश्व बैंक ने भी भारत की आर्थिक विकास दर को 6.5 फीसदी के अपने पहले के अनुमान से बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है. विश्व बैंक की रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संकट से तेल, गैस की महंगाई को रेखांकित करते हुए बताया गया है कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था व मांग बुनियादी रूप से मजबूत बनी हुई है तथा जीएसटी में कटौती जैसे कदम विकास को गति दे रहे हैं. भारत से जुड़े विश्व बैंक और आइएमएफ के नवीनतम आंकड़े मजबूती की कहानी बताते हैं. यानी, उथल-पुथल के बावजूद भारत मजबूती से बढ़ रहा है.


आइएमएफ की इसी महीने आयी ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में आगामी वित्त वर्ष में भी भारत की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत पर बने रहने की बात कही गयी है. वैश्विक वृद्धि दर इस वर्ष 3.1 प्रतिशत तक धीमी रहने के अनुमान के बीच आइएमएफ भारत को विश्व की सबसे टिकाऊ आर्थिक शक्तियों में से एक मानता है. भारत से जुड़ा आइएमएफ का आकलन आंकड़ों में भले छोटा हो, पर संकेत के रूप में महत्वपूर्ण है. और संकेत यह है कि भारत वैश्विक औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. गौर करने की बात है कि आइएमएफ का अप्रैल अपडेट युद्ध संबंधी बाधाओं, व्यापारिक अनिश्चितता और मुद्रास्फीति के दबावों की पृष्ठभूमि में आया है, जिसने दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के प्रति भरोसा कम किया है.

ऐसे में, भारत की मजबूत वृद्धि दर दर्शाती है कि घरेलू मांग, नीतिगत निरंतरता और संरचनात्मक मजबूती उसे सहारा दे रही है. आइएमएफ के मुताबिक, भारत ‘मजबूत’ स्थिति में है, जो बाहरी अस्थिरता को देखते हुए अच्छा प्रदर्शन है. हालांकि, विश्व बैंक और आइएमएफ के इन अनुमानों में मुद्रास्फीति की चुनौती भी हो सकती है. जैसे, आइएमएफ ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 4.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि 2025 में यह दर 2.0 फीसदी से नीचे रही थी. इसका मतलब यह है कि हालिया आपूर्ति शृंखला समस्याओं के कारण दबाव बढ़ सकता है, लेकिन यह दर अब भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सहनीय सीमा के भीतर रहने की संभावना है. यानी, अर्थव्यवस्था के सामने मुद्रास्फीति की चुनौती तो है, लेकिन उसे नियंत्रित किया जा सकता है.


हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग में भारत की स्थिति बदल गयी है. लेकिन जीडीपी रैंकिंग में भारत का छठे स्थान पर आना यह नहीं दर्शाता कि अर्थव्यवस्था की गति अचानक धीमी हो गयी है. दरअसल, वैश्विक जीडीपी रैंकिंग अमेरिकी डॉलर में मापी जाती है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है, तब डॉलर के संदर्भ में भारत की जीडीपी छोटी दिखती है, भले ही रुपये में उत्पादन बढ़ रहा हो. कई रिपोर्टों के अनुसार, 2026 में रुपये के अवमूल्यन ने भारत की डॉलर जीडीपी को कम दिखाया, जबकि पाउंड और येन अपेक्षाकृत मजबूत रहे, जिससे ब्रिटेन और जापान रैंकिंग में आगे निकल गये.

इसलिए यह बदलाव मूलभूत कमजोरी नहीं, बल्कि मुद्रा विनिमय का प्रभाव है. रैंकिंग में अस्थायी गिरावट को वैश्विक मुद्रा बाजारों के प्रभाव के रूप में देखना चाहिए, न कि भारत की आर्थिक दिशा पर अंतिम निर्णय के रूप में. इन सभी बातों से तीन प्रमुख निष्कर्ष निकलते हैं. पहला, भारत की विकास की कहानी अब भी मजबूत है-कमजोर वैश्विक माहौल में साढ़े छह फीसदी या उससे अधिक की संभावित वृद्धि दर हमारी आर्थिक शक्ति का संकेत है. दूसरा, भारत की वैश्विक स्थिति अब विनिमय दर में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो गयी है, क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी हो चुकी है कि छोटी मुद्रा चालें भी डॉलर आधारित तुलना को प्रभावित करती हैं. इसलिए नीति निर्माताओं को विनिमय दर पर ध्यान देना होगा. तीसरा, भारत की अगली प्रगति केवल आकार पर नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और उच्च मूल्य वाली आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर करेगी. दरअसल, उत्पादकता अगला महत्वपूर्ण कारक है.

यहीं पर आइएमएफ की जनवरी की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है. तब उसने कहा था कि पिछले दो दशकों में भारत की उत्पादकता वृद्धि प्रभावशाली रही है, जिसका कारण सेवा क्षेत्र का विस्तार, दक्षता बढ़ाने वाले सुधार और बड़े घरेलू बाजार के लाभ हैं. तब यह भी कहा गया था कि नवाचार को मजबूत करने और व्यवसाय वृद्धि में बाधाओं को कम करने से उत्पादकता में लगभग 40 फीसदी तक वृद्धि हो सकती है-जो हर दशक में कर्नाटक के बराबर उत्पादन जोड़ने के समान है. यह भारत की दीर्घकालिक क्षमता का मजबूत प्रमाण है, क्योंकि उत्पादकता ही तेज वृद्धि को स्थायी समृद्धि में बदलती है. हालांकि, इसके लिए व्यापक स्तर पर नवाचार जरूरी है, जो तभी संभव है जब उत्पादकता बढ़ाने में आने वाली बाधाओं को प्रभावी रूप से हटाया जाये. साथ ही, ईज ऑफ डुइंग बिजनेस में भी सुधार जरूरी है. आइएमएफ का संदेश यह नहीं है कि भारत में गति की कमी है, बल्कि यह है कि इस गति को और बढ़ाया जा सकता है. इसमें व्यावसायिक गतिशीलता, नवाचार व तकनीक, विशेषकर एआइ की भूमिका अहम है, जो कंपनियों को अधिक उत्पादक बना सकती है.


आइएमएफ ने यह भी बताया कि बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियां पहले से ही एआइ का उपयोग कर रही हैं. यह बताता है कि भारत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अगली उत्पादकता लहर का लाभ उठाने की बेहतर स्थिति में है. कुल मिलाकर, भारत अब तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से उत्पादकता आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है. आइएमएफ का वृद्धि संशोधन निकट अवधि में स्थिर और स्वस्थ स्थिति को दर्शाता है, जबकि उत्पादकता संबंधी टिप्पणियां मध्यम अवधि में बड़ी संभावनाओं की ओर इशारा करती हैं. भारत के लिए व्यापक संदेश सकारात्मक है. संदेश यह है कि विकास की गति बनी हुई है और भविष्य में तेजी से आगे बढ़ने की संभावनाएं भी प्रचुर हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था अब भी सही दिशा में है, पर भू-राजनीतिक झटकों और अस्थिर मुद्राओं की दुनिया में यह प्रगति हमेशा शीर्ष रैंकिंग में स्पष्ट नहीं दिखेगी. भारत की वास्तविक ताकत निरंतर वृद्धि, बढ़ती उत्पादकता, मजबूत नवाचार और दबाव में भी लचीलेपन में निहित है. वर्तमान समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ठहराव का नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों के बीच स्थिर प्रगति का संकेत देता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By अभिजीत मुखोपाध्याय

अभिजीत मुखोपाध्याय is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >