ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारी के बीच भारत-अमेरिका के संबंध महत्वपूर्ण दौर में प्रवेश कर रहे हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिकी रुख का अनुसरण करने से भारत के इनकार से लेकर रूसी कच्चे तेल की खरीद तक भारत का रुख अमेरिकी राष्ट्रपति को असहज करता रहा है. इस तनाव के बीच हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई मुलाकात ने तनाव बढ़ा दिया है. ऐसे में भारत-अमेरिका साझेदारी का भविष्य काफी हद तक इस पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने व्यापार समझौते को टिकाऊ आर्थिक समझौते में बदल पाते हैं या नहीं, और क्या वे रूस को लेकर मतभेदों को व्यापक रणनीतिक संबंधों को प्रभावित किये बिना संभाल सकते हैं.
विगत फरवरी में घोषित अंतरिम भारत-अमेरिका व्यापार ढांचा ऐसा रास्ता उपलब्ध कराता हुआ दिखाई दिया था. इसके तहत वाशिंगटन ने भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक शुल्क घटाकर 18 फीसदी करने पर सहमति जतायी थी, जबकि भारत ने अमेरिकी औद्योगिक, कृषि और अन्य उत्पादों पर शुल्क में पर्याप्त कटौती करने की प्रतिबद्धता जतायी थी. इस ढांचे में पांच वर्षों के दौरान अमेरिका से 500 अरब डॉलर के ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, विमान, कीमती धातुओं और अन्य उत्पादों की खरीद की भी परिकल्पना की गयी थी. इसका उद्देश्य व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की नींव तैयार करना था. हालांकि, यह समझौता अब तक पूरा नहीं हो पाया है. इसके बाद हुई वार्ताओं में शुल्क, कृषि, बाजार तक पहुंच और अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं को तरजीही व्यवहार देने की शर्तों को लेकर मतभेद सामने आये हैं. नयी दिल्ली ने लगातार संकेत दिया है कि अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले वह शुल्क के मामले में वास्तविक लाभ चाहती है. यदि दोनों देश संतुलित समझौते पर पहुंच जाते हैं, तो यह उस साझेदारी का आर्थिक आधार बन सकता है, जिसका विस्तार पहले ही रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्रों में हुआ है.
फरवरी में बने व्यापार ढांचे में दोनों देशों ने आपूर्ति शृंखला की मजबूती, निवेश की जांच, निर्यात नियंत्रण और प्रौद्योगिकी सहयोग पर काम करने व उन्नत प्रौद्योगिकियों के व्यापार को बढ़ाने पर सहमति जतायी थी. पर इस व्यापार समझौते को सफलतापूर्वक पूरा करने में बड़ी बाधा रूस है. ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर दबाव बनाने के लिए शुल्क को एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया है. वाशिंगटन और मॉस्को के साथ संबंधों में संतुलन बनाये रखने की भारत की लंबे समय से चली आ रही रणनीति ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद कठिन हो गयी है. ऐसा इसलिए, क्योंकि वाशिंगटन ने व्यापारिक दबाव को भारत के रूस के साथ ऊर्जा संबंधों से जोड़ दिया है.
हालांकि, केवल वाशिंगटन के दबाव के कारण भारत के पास रूसी ऊर्जा को छोड़ने का ठोस कारण नहीं है. रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत उपलब्ध कराता है, जबकि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में जारी अस्थिरता विविध स्रोतों से आपूर्ति बनाये रखने के महत्व को और बढ़ाती है. ऐसे में, मोदी और पुतिन की मुलाकात ने यह स्पष्ट किया कि वाशिंगटन और मॉस्को के बीच किसी एक को चुनने के लिए भारत तैयार नहीं है. यही वह वास्तविकता है, जिसे अमेरिका को समझने की जरूरत है. रूस के साथ भारत का संबंध केवल शीतयुद्ध की विरासत नहीं है. इसमें रक्षा प्रणालियां, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष, उर्वरक और लंबे समय के राजनयिक संबंध शामिल हैं. जबकि अमेरिका से भारत के संबंध प्रौद्योगिकी, निवेश, रक्षा, खुफिया सहयोग, समुद्री सुरक्षा व हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण होते गये हैं.
यूक्रेन को लेकर अमेरिकी चिंताएं जायज हैं. भारत ने भी बार-बार संघर्ष समाप्त करने का आह्वान किया है. पर भारत से शांति को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने का आग्रह करने और यह मांग करने में महत्वपूर्ण अंतर है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को वाशिंगटन की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करे. रूस और अमेरिका में से भारत किसी एक को चुनना नहीं चाहता, क्योंकि उसके रणनीतिक हित दोनों देशों के साथ संबंध बनाये रखने की मांग करते हैं. अमेरिका भारत के कुछ निर्णयों से असहमत हो सकता है, पर भारत को रणनीतिक स्वायत्तता छोड़ने के लिए मजबूर करने का प्रयास विपरीत असर डाल सकता है. अत्यधिक दबाव उस रणनीतिक सामंजस्य को कमजोर कर सकता है, जिसे वाशिंगटन हासिल करना चाहता है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बन रहा है.
भारत एक महत्वपूर्ण बाजार, प्रौद्योगिकी साझेदार, रक्षा सहयोगी और संभावित वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र भी है. ऐसे में यदि भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा गया, जिस पर व्यापार अधिशेष घटाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए, तो यह अमेरिका के रणनीतिक लाभों को कमजोर कर सकता है. भारत-अमेरिका संबंधों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि आपसी सहयोग को खत्म किये बगैर क्या वे अपने मतभेदों को संस्थागत रूप दे सकते हैं. एक सफल द्विपक्षीय व्यापार समझौता यह प्रदर्शित करेगा कि वाशिंगटन और नयी दिल्ली व्यापक संबंधों को नुकसान पहुंचाये बिना कठिन मुद्दों पर बातचीत कर सकते हैं. इससे कारोबार जगत को भी भरोसा मिलेगा कि राजनीतिक मतभेद बार-बार द्विपक्षीय आर्थिक नीतियों को बाधित नहीं करेंगे.
भारत को अमेरिकी वस्तुओं, निवेश और प्रौद्योगिकी के लिए अधिक खुलापन दिखाना होगा. पर अमेरिका को भी समझना होगा कि साझेदारी में केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि रणनीति में भी पारस्परिकता जरूरी है. जहां महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित अलग होंगे, वहां भारत अपने लिए रणनीतिक विकल्प बनाये रखेगा. इसलिए उभरता हुआ भारत-अमेरिका संबंध दो बड़ी शक्तियों के बीच ऐसी रणनीतिक साझेदारी के रूप में सामने आ सकता है, जिसमें दोनों देश व्यापक सहयोग करें, पर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाये रखें. व्यापार समझौता इस बदलाव को गति भी दे सकता है और इसे कमजोर भी कर सकता है. यदि दोनों पक्ष इस समझौते को व्यापक आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी की नींव के रूप में देखते हैं, तो यह सदी के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय आर्थिक समझौतों में से एक बन सकता है. अंततः, विकल्प व्यापार और भू-राजनीति के बीच नहीं है. वास्तविक चुनौती यह है कि व्यापार को राष्ट्रीय हित की पूर्ति का साधन बनाया जाये, पर यह सुनिश्चित किया जाये कि लेन-देन आधारित व्यापार के कारण स्वयं राष्ट्रीय हित ही दांव पर न लग जाये. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
