ट्रंप के टैरिफ से निपटने की भारत की रणनीति

एशिया के उभरते बाजारों में भारत पर टैरिफ फिलीपींस को छोड़कर सबसे कम है, जिससे भारत को वैश्विक व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल सकता है. इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में अमेरिकी बाजार में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी. प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातक देशों की तुलना में भारत पर कम टैरिफ लगा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ चुनौतियों के बीच भारत जिस तरह अमेरिका सहित सभी प्रमुख देशों के साथ द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की डगर पर आगे बढ़ रहा है, उससे आपदा के बीच अवसर भारत की मुट्ठियों में आने लगे हैं. यह भारतीय रणनीति की जीत ही है कि जहां ट्रंप ने चीन पर 245 फीसदी टैरिफ लागू कर दिये हैं, वहीं भारत के लिए घोषित 26 फीसदी टैरिफ 90 दिनों के लिए स्थगित कर दिये गये हैं. इन दिनों जहां टैरिफ की चिंता में दुनिया भर के शेयर बाजार ढहते चले जा रहे हैं, वहीं भारत के शेयर बाजार बेहतर स्थिति में बने हुए हैं. विदेशी मुद्रा भंडार भी तेजी से बढ़कर 676 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है. नये वित्त वर्ष में भी भारत की विकास दर दुनिया में सर्वाधिक छह फीसदी से अधिक के स्तर पर रहने की संभावना जतायी जा रही है.

विगत नौ अप्रैल को अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पूरी दुनिया में भारत ऐसे पहले देश के रूप में सामने आया है, जो अमेरिका के साथ टैरिफ पर प्रभावी बातचीत करते हुए दिखाई दे रहा है. इसमें दो मत नहीं कि ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर पारस्परिक टैरिफ लागू किये जाने के बाद व्यापार की एक नयी दुनिया ने जन्म लिया है. यह दुनिया ट्रंप की उस हठ पर आधारित है, जिसमें वह विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन और अमेरिका के साथ कथित आर्थिक दुर्व्यवहार को रोकने के लिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं को होने वाले किसी भी तरह के कष्ट की अनदेखी करने को भी तैयार हैं. नयी व्यापार दुनिया पहले की व्यापार दुनिया से पूरी तरह अलग है. कल तक दुनिया में मजबूत आर्थिक विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के आधार पर विकास की कहानी आगे बढ़ती रही है. लेकिन अब संरक्षणवाद तथा द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों का नया सितारा उदित हो रहा है. लिहाजा अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और दुनिया की बदलती आर्थिक सूरत की नयी हकीकत के मद्देनजर भारत नयी रणनीति के साथ आगे बढ़ता दिखायी दे रहा है. भारत से निर्यात के मद्देनजर अमेरिका अत्यधिक महत्वपूर्ण देश है. पिछले वित्त वर्ष में भारत से दुनिया के विभिन्न देशों को करीब 435 अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों का निर्यात हुआ है, उनमें से अमेरिका को करीब 18 प्रतिशत उत्पाद निर्यात हुए हैं. ऐसे में ट्रंप के टैरिफ से भारत के कई प्रमुख निर्यात क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं. इनमें आइटी, टेक्सटाइल और परिधान, ऑटोमोबाइल पार्टस, रत्न और आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि उत्पाद आदि शामिल हैं. भारत के दवा और सेमीकंडक्टर उद्योग पर भी टैरिफ की तलवार लटक रही है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पर 26 फीसदी पारस्परिक टैरिफ लगाने के अमेरिकी फैसले से भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में करीब 5.76 अरब डॉलर की गिरावट आ सकती है और भारत के जीडीपी के करीब 0.2 फीसदी घटने की आशंका रहेगी. खास बात यह है कि ट्रंप के टैरिफ की आपदा के बीच भारत के लिए मौके भी छिपे हैं. अमेरिका द्वारा भारत पर लगाये गये टैरिफ दूसरे कई प्रतिस्पर्धी देशों से कम होने से जहां अमेरिका सहित दुनिया में भारतीय निर्यात बढ़ने की संभावना है, वहीं भारत जिस तरह अमेरिका के साथ नये व्यापार समझौते के लिए तथा अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के लिए कदम बढ़ा रहा है, उससे भारत के लिए अमेरिका सहित दुनियाभर के देशों में निर्यात और कारोबार बढ़ाने के मौके बढ़ सकते हैं.

एशिया के उभरते बाजारों में भारत पर टैरिफ फिलीपींस को छोड़कर सबसे कम है, जिससे भारत को वैश्विक व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल सकता है. इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में अमेरिकी बाजार में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी. प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातक देशों की तुलना में भारत पर कम टैरिफ लगा है. खासतौर पर चीन और वियतनाम के मुकाबले भारत बेहतर स्थिति में है. टेक्सटाइल के निर्यात बाजार में अभी से बेहतर अवसर मिल सकते हैं. अन्य देशों के सामान अमेरिका में ज्यादा महंगे होने से अमेरिका में भी भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी. यद्यपि हमारी सरकार ने संसद में ट्रंप की नयी टैरिफ नीति के मद्देनजर घरेलू उद्योगों के संरक्षण की बात कही है, पर देश के उद्योग जगत द्वारा टैरिफ संरक्षण की बजाय वैश्विक प्रतिस्पर्धा व अनुसंधान व विकास (आरएंडडी) पर ध्यान देना होगा. यह बात ध्यान में रखनी होगी कि 1991 में उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ाने की जो रणनीति लागू हुई, उससे देश को उदारीकरण के लाभ मिले हैं. चूंकि टैरिफ प्रतिस्पर्धा से जुड़े हैं, ऐसे में, अगर हम टैरिफ की आड़ में रहेंगे, तो प्रतिस्पर्धी नहीं बन पायेंगे. नये अवसरों का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को कारोबार करने में आसानी बढ़ानी होगी, लॉजिस्टिक्स व बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा तथा नीतिगत स्थिरता कायम रखनी होगी.

हम उम्मीद करें कि अमेरिका द्वारा चीन पर लागू किये गये 245 फीसदी टैरिफ से शुरू हुए अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बीच वैश्विक आर्थिक मौकों को मुट्ठी में लेने के साथ-साथ भारत पर लागू किये जाने वाले 26 फीसदी टैरिफ की चुनौती का मुकाबला करने में भारत के लिए अमेरिका के साथ नया कारोबार समझौता, विभिन्न देशों के साथ नए द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते और मजबूत घरेलू आर्थिक घटक असरकारक आर्थिक हथियार के रूप में उपयोगिता देते हुए दिखाई देंगे. हम उम्मीद करें कि हमारी सरकार नयी व्यापार दुनिया में भारत को रचनात्मक देश बनाने के लिए ऐसी नयी आर्थिक रणनीति के साथ आगे बढ़ेगी, जिसमें बड़े-बड़े उद्योगों के साथ सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योगों के लिए भी अनुकूलताएं हों. चूंकि दुनिया में नये डिजिटल दौर की नयी संपत्तियों से विकास की मंजिलें तय होंगी, अतएव ऐसी सबसे कीमती संपत्तियों के विकास पर भारत को भी पूरा ध्यान देना होगा. जाहिर है, अब भारत में भारी पूंजी वाले उद्योगों को सब्सिडी देने के बजाय शिक्षा और कौशल विकास पर अधिक निवेश करना कहीं अधिक लाभप्रद होगा. भारत को सेवा क्षेत्र की नया चमकीली राजधानी बनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा. साथ ही, भारत को अधिक डिजिटल महारत हासिल करने पर ध्यान देना होगा. निश्चित रूप से ऐसी नयी आर्थिक और द्विपक्षीय वैश्विक व्यापार रणनीति से भारत नयी व्यापार दुनिया के आकाश में एक चमकते हुए आर्थिक और प्रभावी सितारे के रूप में दिखाई दे सकेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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