भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार नाथू ला और शिपकी ला मार्ग से एक अगस्त से पुनः बहाल हो गया है. इससे पहले 26 जून को लिपुलेख पास मार्ग, उत्तराखंड को भी सीमा व्यापार के लिए खोल दिया गया था. यानी भारत-तिब्बत (चीन) के कई पारंपरिक सीमा व्यापार मार्गों में द्विपक्षीय समझौतों में स्वीकृत, लिपुलेख, उत्तराखंड, शिपकी ला और नाथू ला को अब अपौचारिक रूप से छह साल बाद कोविड महामारी और 2020 के सीमा विवाद के बाद फिर से बहाल कर दिया गया है.
कैलाश-मानसरोवर की यात्रा भी 2025 में लिपुलेख और नाथू ला मार्ग से शुरू हो गयी थी. भारत और चीन के संबंधों में गलवान घटना के बाद आयी दरार को आर्थिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक माध्यमों से फिर से पाटने की कोशिश दोनों तरफ से हो रही है. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव की चीन में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान वार्ता हुई थी. उससे पहले भी दोनों नेताओं की अनौपचारिक भेंट 2024 के ब्रिक्स शिखर बैठक में तथा 2022 में जी-20 की बैठक के दौरान हुई थी. इसके अलावा दोनों देश के विशेष प्रतिनिधियों की 23वीं और 24वीं बैठक क्रमशः नयी दिल्ली और बीजिंग में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य और विदेश मंत्री वांग यी ने सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाये.
भारत और चीन के रिश्तों में आयी नरमी के बारे में कई बातें कही जा रही हैं. पहली बात यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेरुखी और टैरिफ दोनों एशियाई देशों को फिर साथ लाने पर मजबूर कर रहे हैं. दूसरी बात यह कि दोनों देशों के मीडिया एक-दूसरे की कमजोरी गिना कर संबंधों में आयी गर्मजोशी को दूसरे पक्ष की मजबूरी बता रहे हैं. कुछ हद तक यह बात सही है, परंतु केवल यह कहना काफी नहीं कि ट्रंप के कारण भारत और चीन अपने संबंधों को फिर से दुरुस्त कर रहे हैं. भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत और चीन के बीच संबंधों को केवल सुरक्षा के नजरिये से नहीं समझा जा सकता, इसमें गहरी भू-आर्थिक बाध्यताएं भी निहित हैं.
वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, विनिर्माण क्षमताओं और उपभोक्ता बाजारों की परस्पर निर्भरता ने दोनों देशों को एक ऐसे जटिल संबंध में बांध दिया है, जहां प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ चलते हैं. चीन, जिसकी अर्थव्यवस्था निर्यात-उन्मुख रही है, आज भी अपने उत्पादों, प्रौद्योगिकी और ब्रांड विस्तार के लिए बड़े और गतिशील बाजारों की तलाश में है. भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में अत्यंत आकर्षक है, जहां बढ़ता मध्यवर्ग, डिजिटल विस्तार और बुनियादी ढांचे का विकास चीनी कंपनियों के लिए सुनहरा अवसर प्रस्तुत करता है. दूसरी ओर, भारत की विकासात्मक आवश्यकताएं, जैसे उन्नत विनिर्माण तकनीक, सस्ती पूंजी, और विशेष रूप से रेयर अर्थ के लिए चीन एक अच्छा स्रोत है. इसके अलावा, टनल बोरिंग मशीन जैसी विशेषीकृत इंजीनियरिंग तकनीकों में चीन की दक्षता भारत की ढांचागत परियोजनाओं के लिए आवश्यक हैं, विशेषकर शहरी मेट्रो और जल प्रबंधन परियोजनाओं में. तो एक ओर जहां रणनीतिक अविश्वास और सीमा विवाद बने हुए हैं, वहीं आर्थिक यथार्थवाद दोनों देशों को सीमित लेकिन आवश्यक सहयोग के लिए बाध्य भी करता है.
दोनों देशों के बीच का यह आपसी संबंध पूर्ण साझेदारी का नहीं है, बल्कि नियंत्रित परस्पर निर्भरता का है. इन दोनों देशों की कुछ भू-राजनीतिक विवशताएं भी हैं. एशिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि दो पड़ोसी एक साथ महान शाक्तिशाली देश के रूप में उभर रहे हैं. चीन राजनीतिक एवं राजनयिक रूप से भारत के पड़ोस, यानी दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है. बेल्ट एंड रोड पहल के तहत बीजिंग ने नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई परियोजनाओं में निवेश किया है. भारत-चीन संबंधों में गलवान के बाद आये ठंडेपन से इन दक्षिणी एशियाई देशों के चीन से संबंधों पर भी असर पड़ा है, क्योंकि इन देशों को दिल्ली और बीजिंग के बीच की खींचतान में किसी एक को चुनने के लिए विवश होना पड़ता है.
नेपाल के नये प्रधानमंत्री बालेन शाह के राजनयिक द्वंद्व से इसे बेहतर समझा जा सकता है. पारंपरिक रूप से दक्षिणी एशियाई देशों के नये प्रधानमंत्री अपनी पहली विदेश यात्रा में भारत आते हैं. नेपाल चूंकि हाल के दिनों में चीन के काफी करीब आया है. ऐसे में, बीजिंग के राजनयिक दबाव में बालेंद्र शाह अब तक अपनी भारत यात्रा टालते रहे हैं. ऐसे ही, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी ‘प्रथम विदेश यात्रा’ की परंपरा तोड़ी, यह अलग बात है कि उनका पहला गंतव्य चीन न बनकर मलेशिया बना. चीन की सामरिक सोच यह है कि भारत-चीन संबंधों में सुधार केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की भू-राजनीतिक संरचना को पुनर्परिभाषित कर सकता है.
बीजिंग की रणनीतिक कल्पना फिर से एक नया ‘भारत-चीन प्लस’ ढांचे को जन्म देने की है, एक ऐसी संरचना, जिसमें दोनों प्रमुख शक्तियां क्षेत्रीय देशों के साथ समन्वित रूप से जुड़ें, ताकि चीन को अपने निवेश और प्रभाव के विस्तार का एक वैधानिक और कम विवादास्पद मार्ग मिल सके. अभी नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और अफगानिस्तान भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच जटिल संतुलन साधने के लिए मजबूर हैं. यदि द्विपक्षीय तनाव कम होता है, तो इन देशों को इस निरंतर कूटनीतिक द्वंद्व से मुक्ति मिल जायेगी.
हालांकि, वैसी स्थिति में एक आशंका यह भी बनती है कि जो देश अभी तक एक नयी गुट-निरपेक्ष विदेश नीति से भारत और चीन के साथ संतुलित संबंध स्थापित किये हुए थे, वे धीरे-धीरे इस सामरिक स्वायत्तता को त्याग न दें, क्योंकि चीन के आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव दक्षिण एशिया में स्वाभाविक रूप से और बढ़ेंगे. तब भारत-चीन संबंधों में सुधार का विपरीत नतीजा यह हो सकता है कि क्षेत्रीय बहुध्रुवीयता कम कर चीन अपना एकतरफा प्रभुत्व और मजबूत करे. अंततः वैश्विक दक्षिण के संदर्भ में भी भारत और चीन, दोनों अब तक अपने-अपने स्वतंत्र नेतृत्व के दावे पर अडिग रहे हैं. इस बीच बीजिंग ने एक नयी कूटनीतिक भाषा अपनाते हुए दोनों देशों के ‘सम्मिलित नेतृत्व’ की अवधारणा पर बल देना शुरू किया, जिसे नयी दिल्ली ने अब तक गंभीर तवज्जो नहीं दी है. लेकिन चीनी रणनीतिकार संबंधों की गर्माहट से इसे भी साधने की कोशिश करेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
