नरम पड़ता चीन

चीनी प्रस्ताव से यह संकेत तो मिलता है कि वह भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है, पर उसे ईमानदार व पारदर्शी भी होना होगा.

भारत और चीन के बीच लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव के दो साल हो चुके हैं और दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों की लगातार बातचीत के बावजूद कोई समाधान नहीं निकल सका है. लेकिन खबरों की माने, तो स्थिति में बदलाव के आसार हैं.

चीन ने भारत से संपर्क कर द्विपक्षीय संवाद बहाल करने और शीर्ष स्तरीय बैठकों का दौर शुरू करने का प्रस्ताव रखा है. भारत हमेशा से बातचीत के जरिये समाधान निकालने का पक्षधर रहा है, लेकिन चीन के आक्रामक रवैये और उसकी विस्तारवादी नीतियों के कारण परस्पर संबंधों में तनातनी बनी रही है.

उल्लेखनीय है कि तनाव के माहौल में भी दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है. चीनी सेना की हालिया कारगुजारियों से पहले दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लगातार बैठकें हो रही थीं. इस पृष्ठभूमि में दोनों देशों के संबंध एक बार फिर सामान्य हो सकते हैं.

भारत की मांग रही है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल, 2020 से पहले की स्थिति बहाल होनी चाहिए ताकि दोनों पक्षों में संवाद के लिए सही माहौल बन सके और तनाव अधिक न बढ़े. उल्लेखनीय है कि लद्दाख में चीनी सेना के जमावड़े तथा गलवान घाटी में हुई झड़प को देखते हुए भारत को अधिक संख्या में सैनिकों की तैनाती करनी पड़ी है.

जानकारों का मानना है कि अगर दोनों पक्षों में ठोस सहमति नहीं बनती है, तो कोई छोटी घटना भी स्थिति को बहुत हद तक बिगाड़ सकती है. बताया जा रहा है कि इस महीने के अंत में चीनी विदेश मंत्री भारत आ सकते हैं.

कुछ समय से चीनी नेतृत्व की ओर से ऐसे बयान आये हैं, जिनमें भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने की ओर संकेत किया गया है. यदि चीनी विदेश मंत्री भारत आते हैं, तो कुछ दिन बाद भारतीय विदेश मंत्री भी चीन जायेंगे. साथ ही, दोनों देशों के अधिकारियों की भी मुलाकातें होंगी.

ऐसे संकेत भी हैं कि चीन ने सभ्यता व संस्कृति संवाद करने और व्यापार व निवेश से संबंधित बैठकें करने का भी प्रस्ताव रखा है, जिन्हें दोनों देशों में आयोजित किया जायेगा. इन पहलों के नतीजे सकारात्मक होंगे, तो इस साल के अंत में चीन में ब्रिक्स देशों के नेताओं की शिखर बैठक भी संभावित है. यूक्रेन प्रकरण ने वैश्विक भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था के सामने नयी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी है.

ऐसे में चीन कतई नहीं चाहेगा कि वह भारत को नाराज रखे. वह चाहता है कि ब्रिक्स सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजिंग आयें. इस साल चीन-भारत-रूस उपसमूह की अध्यक्षता भी चीन के पास है. ब्रिक्स बैठक के समय इन तीन देशों के नेता एक अलग बैठक कर सकते हैं.

चीन में ब्रिक्स की आखिरी शिखर बैठक सितंबर, 2017 में हुई थी, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी शामिल हुए थे. बैठकों के चीनी प्रस्ताव से यह संकेत तो मिलता है कि वह भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है, पर उसे ईमानदार व पारदर्शी भी होना होगा.

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Published by: संपादकीय

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