दुनिया को शांतिदूत चाहिए, सौदेबाज नहीं, पढ़ें प्रभु चावला का लेख

India and Pakistan : प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि संघर्षविराम दोनों देशों की सेना द्वारा सीधे संपर्क से संभव हुआ, जिसकी जड़ 1972 के शिमला समझौते में है. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से कहा, ‘भारत ने कभी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, न ही भविष्य में करेगी.

India and Pakistan : मध्यस्थता संदेश है. जब भी कोई विवाद खड़ा होता है, राजनेता खुद को दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में साबित करने के लिए सक्रिय होते हैं और विवाद खत्म करने का श्रेय लेते हैं. इस महीने डोनाल्ड ट्रंप जब भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम का दावा करते हुए सुर्खियों में थे, तब उनके दावे से ज्यादा वजनी भारत की चुप्पी थी, जो एक फोन कॉल से टूटी. ट्रंप के कथित दावे के बारे में पहले से सुन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पैंतीस मिनट तक टेलीफोन पर बात कर ट्रंप का दावा ध्वस्त कर दिया.

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि संघर्षविराम दोनों देशों की सेना द्वारा सीधे संपर्क से संभव हुआ, जिसकी जड़ 1972 के शिमला समझौते में है. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से कहा, ‘भारत ने कभी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, न ही भविष्य में करेगी.’ मोदी-ट्रंप के बीच की यह बातचीत एक बड़े संकट के बारे में बताती है. संकट यह है कि ईरान-इस्राइल, इस्राइल-हमास, रूस-यूक्रेन और भारत-पाक संघर्षों से विध्वस्त दुनिया में विश्वसनीय और वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य मध्यस्थों का अभाव है. इससे कूटनीति प्रभावित हुई है और हिंसा को रोका नहीं जा सका है.


अगर 1970 के दशक की बात करें, तो शीतयुद्ध के दौरान तत्कालीन सोवियत संघ को अंकुश में लाने के लिए हेनरी किसिंजर की माओ त्से तुंग से गोपनीय कूटनीति की याद आती है. आज के दौर में वैसी कूटनीतिक मध्यस्थता नहीं दिखती. आज के प्रचारवादी सौदेबाजों के विपरीत किसिंजर ने दुनिया को नया आकार देने के लिए वैश्विक दिग्गजों से पूरे सम्मान के साथ गोपनीय बातचीत की थी. मध्यस्थता की आज की अवसरवादी कोशिशों से उसकी तुलना ही नहीं हो सकती. अगर ट्रंप खुद को किसिंजर के अवतार के रूप में देख रहे थे, तो मोदी ने उसे खारिज कर दिया. इसके पीछे एक क्षुब्ध करने वाली सच्चाई है कि हमारे दौर में विश्वसनीय मध्यस्थ नहीं हैं.

जून, 2025 का वैश्विक भू-दृश्य विविध संघर्षों से भरा है, और भरोसेमंद मध्यस्थ के अभाव में वे थमते हुए भी नहीं दिखते. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शांति स्थापित करने वाले फ्रेंकलिन रूजवेल्ट या 1978 में कैंपडेविड समझौता लागू करवाने वाले जिमी कार्टर जैसे दिग्गज कूटनीतिज्ञों की याद भी अब धूमिल हो चली है. साल के मध्य में दुनिया विस्फोटकों के पीपे की तरह है, जहां इस्राइल और ईरान एक-दूसरे पर मिसाइल हमले कर रहे हैं, यूक्रेन और रूस जमीनी युद्ध में उलझे हैं, इस्राइल और हमास के बीच खून-खराबा जारी है, और ऑपरेशन सिंदूर के उत्तरकाल में भारत-पाक तनाव बना हुआ है. इस सबके बीच संकल्प ही नहीं, भरोसा भी गायब है. किसिंजर की शटल डिप्लोमेसी या शत्रु रहे अनवर सादात व मेनाकेम बेगिन के हाथ मिलाने के दिन अब अतीत की स्मृतियां भर हैं.


आज के तथाकथित मध्यस्थ बदले हुए भेष में सौदेबाज हैं. ट्रंप की मध्यस्थता का रिकॉर्ड ही भ्रामक है : सर्बिया-कोसोवो विवाद में उनकी मध्यस्थता कुछ सप्ताह बाद फिर विवाद में बदली, उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन बेनतीजा रहा, और दक्षिण एशिया में संघर्षविराम के उनके दावे को भारत स्वाभाविक ही खारिज कर रहा है. ऐसे ही तेहरान से संधि के जरिये खुद को पश्चिम एशिया में मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने वाले पुतिन फिलहाल ईरान को ड्रोन और रणनीतिक सलाहकार मुहैया कराने में व्यस्त हैं. चीन तभी सक्रिय होता है, जब उसकी ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना दांव पर होती है. कश्मीर पर चीन की चुप्पी तथा पाकिस्तान को उसके ऑपरेशन बुनयान अल मरसूस के लिए सैन्य मदद देने की रणनीति बताती है कि उसका लक्ष्य शांति नहीं, मुनाफा है. इस बीच यूरोप अपने शानदार कूटनीतिक अतीत की छाया भर रह गया है. ब्रिटेन के डेविड लैमी या यूरोपीय संघ के जोसेप बॉरेल संघर्ष रोकने की बात तो करते हैं, पर उनके पास कोनराड एडेनॉयर या चार्ल्स डी गॉल जैसी अपील नहीं है.

वर्ष 2015 में ईरान के साथ हुए जिस परमाणु समझौते को यूरोपीय कूटनीति की विराट उपलब्धि कहा गया, ट्रंप ने अपने पहले ही राष्ट्रपति काल में उसे इस तरह खारिज किया कि दोबारा उसकी बात तक नहीं उठी. वैश्विक विवादों को निपटाने के लिए जिस संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ, उसे वीटो की राजनीति के जरिये अपंग बना दिया गया. वर्ष 2023 की उसकी गाजा घोषणा अमेरिकी और रूसी विरोधों के कारण अप्रासंगिक हो गयी. तुर्किये और कतर ने भी शटल डिप्लोमेसी में हाथ आजमाये. विगत जनवरी में कतर के नेतृत्व में इस्राइल और हमास के बीच हुआ संघर्षविराम महज ग्यारह दिन चला.

इस्राइल और ईरान में से कोई एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करता. इस्राइल का आत्मरक्षा का दावा और ईरान का पश्चिम विरोधी रवैया एक-दूसरे का इतना विरोधी है कि तीसरा पक्ष ही सुलह करा सकता है. पर इस्राइल समर्थक होने और ईरान को धमकी देने के कारण ट्रंप निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं हैं. तेहरान के साथ रूस का गठबंधन पुतिन को भी निष्पक्ष नहीं रहने देता. नतीजा यह है कि दुनिया एक बाजार बन गयी है, जहां मध्यस्थता के बजाय हथियार, तेल और नजरिया ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

वर्ष 2024 में वैश्विक रक्षा खर्च रिकॉर्ड 2.2 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया. लॉकहीड मार्टिन तथा रेथिअन जैसी सैन्य आपूर्तिकर्ता कंपनियों के शेयर बढ़ रहे हैं. चीन और रूस जैसे देश पाकिस्तान तथा ईरान की सैन्य जरूरतें पूरी कर रहे हैं. शांति बहाली के लिए मध्यस्थता आज सिर्फ फोटो खींचने का अवसर बन कर रह गयी है. भारत-पाक संघर्ष के बीच ट्रंप का घुस आना कश्मीर के लिए नहीं था, उसके पीछे सौदेबाज की अपनी छवि निर्मित करने का उनका एकमेव उद्देश्य था. ऐसे में, मोदी के दोटूक जवाब ने बताया कि हमें आपकी नौटंकी नहीं चाहिए.


भारत की जिस विदेश नीति को कभी अप्रभावी समझा जाता था, वह आज मजबूत हुई है. मोदी द्वारा अपने ताकतवर सहयोगी को दोटूक कहना कि उन्हें तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाहिए, उभरती ताकत की विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का सूचक है. वे दिन बीत गये, जब साउथ ब्लॉक समझौते के लिए वाशिंगटन या लंदन का इंतजार करता था. आज भारत अपनी शर्तों पर समझौता करता है. हालांकि शून्य फिर भी बना हुआ है. दुनिया को सत्ता के भूखे अवसरवादियों की नहीं, शांतिदूत की जरूरत है. ऐसे शांतिदूत की, जिनकी नैतिक शक्ति जिमी कार्टर जैसी हो और जो भू-राजनीति में किसिंजर जैसे कुशल हों. जब तक ऐसे व्यक्तित्व का आगमन नहीं होता, तब तक लाखों लोगों का विस्थापन होता रहेगा और युद्धजर्जर दुनिया विध्वंस के जरिये हथियार उद्योग का पेट भरती रहेगी. 
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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