India-and-Arab : हाल ही में नयी दिल्ली में अरब देशों के विदेश मंत्रियों, लीग ऑफ अरब स्टेट के महासचिव और अरब देशों के प्रमुखों के एक प्रतिनिधिमंडल की जो बैठक हुई, उन्हें भारत-अरब देशों के रिश्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए. बहरीन में 2016 में हुए इस सम्मेलन के दस साल बाद नयी दिल्ली में संपन्न इस बैठक ने भारत के कूटनीतिक प्रभाव में भी वृद्धि की. बैठक में मौजूद 22 अरब देशों ने न केवल आतंकवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तत्काल सुधार लाने और इसे मौजूदा वैश्विक जरूरतों के अनुरूप गठित किये जाने की मांग की.
भारत भी वर्षों से यही कहता आ रहा है. भारत के लिए अरब देशों का महत्व नि:संदेह बहुत अधिक है. हमारी खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा अरब देशों से जुड़ी है. जबकि यह क्षेत्र आज दुनिया का सबसे ज्यादा अशांत क्षेत्र और उथल-पुथल से भरा है. मध्य-पूर्व या पश्चिम एशिया में तीन ज्वलंत मुद्दों की पृष्ठभूमि में संपन्न हुई इस बैठक के दूरगामी महत्व को समझा जा सकता है. ये तीन मुद्दे हैं- ईरान-अमेरिका विवाद, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच चल रही तकरार और इस्राइल-फिलिस्तीन समस्या के हल के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बोर्ड ऑफ पीस की पहल. और इन तीनों ही मुद्दों से भारत के हित कमोबेश जुड़े हुए हैं.
जहां तक ईरान पर अमेरिकी आक्रामकता का सवाल है, तो बैठक में इस पर चुप्पी ही रही. ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य तैयारियों पर चर्चा करने से भी बैठक में बचा गया, जो द्विपक्षीय दृष्टिकोण बनाये रखने और क्षेत्रीय अस्थिरता से बचने के प्रयासों को दर्शाता है. हाालंकि, सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब लीग के प्रमुख देश अमेरिका को ईरान पर हमला करने से रोकने के प्रयास में लगे हुए हैं. लेकिन इस मामले में भारत की रणनीति इंतजार करने और ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाये रखने की है.
एक तरफ जहां बजट में मोदी सरकार ने ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के लिए कोई आवंटन न कर इस मामले में फूंक-फूंककर कदम रखने का संकेत दिया, वहीं देश के राष्ट्रीय उप सुरक्षा सलाहकार ने तेहरान में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख से मुलाकात में यह संदेश दिया कि ईरान के संकट की इस घड़ी में भारत उसके साथ खड़ा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व वाले बोर्ड ऑफ पीस का भी बैठक में जिक्र नहीं हुआ. उल्लेखनीय है कि कई खाड़ी देशों के इसमें शामिल होने के बावजूद भारत ने इससे दूरी बनायी है, जो इस मुद्दे पर नयी दिल्ली की रणनीतिक सतर्कता के बारे में बताती है.
यह ठीक है कि अरब देशों में से कुछ की पाकिस्तान से भी नजदीकी है. उदाहरण के लिए, हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य सुरक्षा समझौता हुआ है. पर यह याद रखना होगा कि पाकिस्तान से नजदीकी जताने वाले अरब देश पाकिस्तान से भारत की तुलना भी करते होंगे. और वे पाते होंगे कि व्यापार और दूसरे मुद्दों पर भारत से पाकिस्तान की कोई तुलना ही नहीं हो सकती. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरब देशों के विदेश मंत्रियों, अरब लीग के महासचिव और अरब देशों के प्रमुखों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात तो की ही, उन्होंने व्यापार और निवेश, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य और दूसरे क्षेत्रों में आपसी सहयोग को गहरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता दुहरायी.
उन्होंने फिलिस्तीन के लोगों के प्रति भारत के समर्थन की बात की और गाजा शांति योजना समेत चल रहे दूसरे शांति प्रयासों का स्वागत किया. बैठक के अंत में जारी किया गया दिल्ली घोषणापत्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इस घोषणापत्र में भारत और अरब लीग के बीच पांच मुख्य मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की बात कही गयी है. ये हैं-अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति. चूंकि भारत और अरब लीग के बीच का सालाना व्यापार 240 अरब डॉलर से अधिक है, इसलिए दोनों पक्ष आने वाले दिनों में इन पांच क्षेत्रों में सहयोग और बढ़ाने की उम्मीद करते हैं.
घोषणापत्र में सूडान, सोमालिया और लीबिया की संप्रभुता, एकता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाये रखने की बात कही गयी और इनके आंतरिक मामलों में दखल देने का विरोध किया गया. गौरतलब है कि ये वही तीन देश हैं, जिनके कारण पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के दो ध्रुव बन गये हैं. जहां तक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच जारी तनाव की बात है, तो घोषणापत्र में दोनों के भीतर के मतभेदों को, और विशेषकर सूडान और लीबिया में उनकी भूमिकाओं को रेखांकित किया गया.
घोषणापत्र में समस्याग्रस्त देशों में नागरिकों पर होने वाले अत्याचारों की निंदा की गयी और लीबिया तथा सूडान में वैध सरकारों का समर्थन किया गया. भारत और अरब लीग, दोनों ने यमन में हूथी हमलों की निंदा की और यमन की एकता के लिए सऊदी अरब के समर्थन के साथ एकजुटता दिखाई. घोषणापत्र में सीरिया का बहुत कम उल्लेख किया गया, और आइएसआइएस के खिलाफ आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर ही अधिक ध्यान केंद्रित किया गया. हालांकि, सऊदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच के विवाद का भारत से सीधे कोई लेना-देना नहीं है, पर पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए इन दोनों के बीच जारी विवाद का हल होना चाहिए.
पश्चिम एशिया में व्याप्त मुद्दों में से बेहद महत्वपूर्ण इस्राइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर बैठक में अलग से घोषणापत्र जारी किया गया. इसमें अरब शांति पहल (2002) का समर्थन किया गया. इस मुद्दे पर भारत और अरब लीग की मूल सहमति स्पष्ट दिखी. इसमें 2025 में शर्म-अल-शेख में हुए सम्मेलन के निष्कर्षों पर भी सहमति जतायी गयी. भारत और अरब लीग ने गाजा में शांति प्रयास की दिशा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रयासों की तो सराहना की, लेकिन इस्राइल और फिलिस्तीन मुद्दे पर ड्रंप की महत्वाकांक्षी योजना पर दोनों पक्षों ने खामोशी बरती.
गौरतलब है कि भारत और अरब लीग, दोनों फिलिस्तीन की संप्रभुता के पक्षधर हैं, जिसकी छाप इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में भी दिखी. दिल्ली घोषणापत्र भारत की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें वह पश्चिम एशिया में संतुलनकारी शक्ति बने रहना चाहता है, वह क्षेत्रीय स्थिरता, वैध सरकारों और संप्रभुता को प्राथमिकता देता है और वैश्विक ध्रुवीकरण तथा विवेकपूर्ण कूटनीति अपनाता है. पश्चिम एशिया में यह नीति भारत को न केवल एक विश्वसनीय साझेदार बनाती है, बल्कि जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भी स्थापित करती है. इस सम्मेलन के जरिये भारत ने पश्चिम एशिया और खाड़ी के देशों में अपनी प्रभावी उपस्थिति भी सुनिश्चित की है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
