भारतीय अस्मिता की भाषा है हिंदी

हिंदी भाषा भारतीयता के संदर्भ में जातीय आत्मा का सबसे प्रकाशमान अंश है. किसी भी लोकतांत्रिक देश में भाषा का विकास स्वतंत्र हो ऐसा संभव नहीं है. भारतीय संदर्भ में हिंदी भाषा ने भी अपने विकास क्रम में कई तरह की चुनौतियों का सामना किया है.

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है. देश, गांव, समाज और परिवार की आत्मा की अनुगूंजें इसके माध्यम से आकार लेती हैं. यह मानवीय संवेदना व सांस्कृतिक विरासत को विस्तार देती है. जीवन, संस्कृति और राजनीति को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने के साथ मूल्यांकित भी करती है. संस्कृतियों की तरह भाषाओं का मामला भी, बहुत बार अपने यथा-अर्थ से छूटकर भावनाओं के करीब आ जाता है.

हिंदी भाषा भारतीयता के संदर्भ में जातीय आत्मा का सबसे प्रकाशमान अंश है. किसी भी लोकतांत्रिक देश में भाषा का विकास स्वतंत्र हो ऐसा संभव नहीं है. भारतीय संदर्भ में हिंदी भाषा ने भी अपने विकास क्रम में कई तरह की चुनौतियों का सामना किया है. यहां हिंदी भाषा की लड़ाई केवल भाषा की लड़ाई न होकर पहचान की लड़ाई है.

स्वतंत्रता के बाद भारत में हिंदी की स्थिति पर गौर करने के लिए महात्मा गांधी और यूआर अनंतमूर्ति के उद्धरण ही काफी हैं. स्वतंत्र भारत में जब महात्मा गांधी का पहला साक्षात्कार लेने बीबीसी के पत्रकार पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि ‘संपूर्ण विश्व से कह दो कि गांधी को अंग्रेजी नहीं आती है.’ दूसरी तरफ, 21वीं शताब्दी के प्रथम दशक में विचारक व चिंतक यूआर अनंतमूर्ति ने कहा कि ‘अगली शताब्दी में हिंदी-सिंदी में पढ़ने-लिखने का काम हम दलितों-पिछड़ों के लिए छोड़ देंगे.’ महात्मा गांधी औपनिवेशिक भाषा की सार्थकता और सीमा को बखूबी समझ रहे थे, इसीलिए उन्होंने मातृभाषा की वकालत की.

गांधी मानते थे कि हिंदी के माध्यम से ही देश की संस्कृति और विरासत को संरक्षित किया जा सकता है. राष्ट्रीयता के विकास में भाषा सहायक है, साथ ही भारतीय जनमानस की जीविका भी हिंदी के माध्यम से बच सकती है. परंतु, 75 वर्षों के बाद भी हिंदी रोजगार की भाषा नहीं बन पायी, जिस कारण हिंदी विशेष वर्ग की भाषा बनकर रह गयी है. हिंदी भारतीय आत्मा की पुकार, संस्कृति की ध्वनि और सुदीर्घ परंपरा की ध्वजवाहक है. परंतु स्वतंत्रता के बाद इसके विकास के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी देखने को मिली. भाषा को बाजार के आसरे छोड़ दिया गया, जिसका परिणाम हुआ कि आज हिंदी पेट की भाषा नहीं बन पायी.

जब तक भाषा जीविका या रोजगार से नहीं जुड़ती है, मृतप्राय हो जाती है. आदिवासी साहित्य व भाषा की अध्येता रमणिका गुप्ता ठीक ही लिखती हैं, ‘भाषाएं मरा नहीं करतीं, मार दी जाती हैं. बोलने वाले मारते हैं या सरकारें मारती हैं.’ किसी भी राष्ट्र के लिए भाषा सबसे संवेदनशील मसला है. सत्ता-विमर्श में भाषा सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यय है. फिर भी राष्ट्र निर्माण में भाषा को लगातार अनदेखा करने की कोशिश जारी है. भाषा संप्रेषण के साथ शिक्षण-प्रशिक्षण कार्य के लिए उपयोगी प्रत्यय है.

संस्कृति के निर्माण में भाषा वाहक कारक है. संस्कृति एक अमूर्त चीज है, जो भाषा के माध्यम से मूर्त आकार लेती है. लोकतंत्र के निर्माण में भाषा की अर्थवत्ता महनीय है, जो लोक और तंत्र के बीच सेतु का कार्य करती है. स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक भारतीयता की संकल्पना के विकास में हिंदी अपनी महती भूमिका का निर्वहन कर रही है. भारतीय जन की आवाज की प्रतिध्वनि इस भाषा में सुनाई पड़ती है.

यह संपूर्ण भारतीय आवाम की संवेदनात्मक ज्ञान का प्रतिफलन है. इसको संरक्षित और संवर्धित करना हम सबकी महती जिम्मेदारी है. केवल उत्सव के माध्यम से हिंदी भाषाएं संरक्षित नहीं रह सकती हैं. भाषाएं फलती-फूलती हैं, अपने बच्चों से. आम जन-जीवन में भाषाएं जितनी प्रचलन में होंगी, उसका विकास स्वत: होगा.

चौदह सितंबर, हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. भारत जैसे बहुलतावादी और बहुभाषी देश में भाषा की महत्ता ज्यादा बढ़ जाती है, इसलिए हिंदी भाषा को उत्सव के रूप में मानने की परंपरा की शुरुआत हुई. यह किसी राष्ट्र या समाज के लिए सही नहीं है, बल्कि ज्ञान के साथ रोजगारपरक शिक्षण-प्रशिक्षण हिंदी के माध्यम से हो, तब यह समृद्ध होगी. भारत के लिए हिंदी केवल भाषा नहीं है, बल्कि बहुसंख्य आबादी की प्राणवायु है. हम इस भाषा के विकास में बाधक कारक की पहचान कर हिंदी ‘लोक-वृत्त’ को निर्मित कर सकते हैं. हिंदी को लोकल से ग्लोबल बनाने की कोशिश करनी चाहिए. साहित्य और दर्शन के साथ विज्ञान और अर्थशास्त्र की भाषा के रूप में भी समृद्ध करना चाहिए.

भूमंडलीकरण के इस दौर में, जहां ग्लोबल गांव की बात हो रही है, अब हिंदी को भी ग्लोबल गांव का हिस्सा बनने में गुरेज नहीं करना चाहिए. बाजार द्वारा लगातार भाषा को अपदस्थ करने की लड़ाई जारी है, क्योंकि हिंदी भारत में आज भी चिंतन, मनन और ज्ञान विस्तार की सबसे बड़ी भाषा है. भाषा को नष्ट कर ही ज्ञान की समृद्ध परंपरा को समाप्त किया जा सकता है. वह प्रकारांतर से राष्ट्रीय एवं जातीय अस्मिता का प्रतिरूप भी है. सो, भाषा किसी भी देश व समाज की विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है. अत: उसका संवर्धन और संरक्षण अनिवार्य दायित्व है.

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Published by: डॉ कुमार

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