फुटबॉल का वैश्विक संतुलन बदल रहा है

यूरोपीय चैंपियन स्पेन ने अतिरिक्त समय में अर्जेंटीना को 1-0 से हराकर दूसरी बार फीफा विश्व कप खिताब जीता. जानें कैसे स्पेनिश टीम ने मेसी के जादू पर लगाम लगाई और फुटबॉल के वैश्विक संतुलन में आए बदलाव.

-राजेंद्र सजवान, पूर्व राष्ट्रीय फुटबॉलर और वरिष्ठ खेल पत्रकार-

शिकारी वह होता है, जिसके कंधे पर शिकार टंगा हो. और चैंपियन वह है, जिसके हाथ में ट्रॉफी और गले में मेडल सजा हो. फीफा विश्व कप के फाइनल में यह करिश्मा यूरोपीय चैंपियन स्पेन ने कर दिखाया. अतिरिक्त समय में पूर्व चैंपियन अर्जेंटीना को 1-0 से हराकर उसने दूसरी बार खिताब अपने नाम किया. फाइनल मैच का एकमात्र गोल फेरान टोरेस ने किया. यूरोपीय चैंपियन स्पेन ने पूरे मैच में अर्जेंटीना की तुलना में अधिक और बेहतर मौके बनाये तथा उसके गोलों की संख्या और अधिक हो सकती थी.

मेसी के कारण अनेक लोग अर्जेंटीना पर दांव लगाये हुए थे. लेकिन फाइनल मैच शुरू होते ही स्पेन ने पूर्व चैंपियन अर्जेंटीना को अपने जाल में फंसा लिया था. अर्जेंटीना का खेल पूरी तरह रक्षात्मक था. दूसरी तरफ स्पेन का युवा खून अंत तक उबाल मारता रहा और आखिरकार खिताब ले उड़ा. फाइनल में अर्जेंटीना की उम्मीद मेसी की कलाकारी पर टिकी थी, लेकिन स्पेन के डिफेंडरों ने उन्हें जरा भी चलने नहीं दिया. पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय से मेसी अर्जेटीना को बुलंदियों तक ले गये. वह मैच दर मैच गोल जमा रहे थे और अपने खिलाड़ियों के लिए मौके भी बना रहे थे. सेमीफाइनल तक वह विपक्षी टीमों के लिए बड़ा खतरा रहे, लेकिन निर्णायक मुकाबले में वह खामोश दिखे. फाइनल मैच में वह केवल एक ही शॉट लगा पाये और वह भी गोल के निशाने पर नहीं था.

चूंकि मेसी का जादू नहीं चला, इसलिए स्पेन का काम आसान हो गया और 16 साल बाद वह फिर से विश्व विजेता बन गया. स्पेन के चैंपियन बनने के साथ ही तमाम अटकलबाजियों और आरोपों पर भी पूर्णविराम लग गया. उन लोगों के मुंह पर भी ताले पड़ गये हैं, जिन्हें लग रहा था कि फीफा और सिंडिकेट्स का एक ग्रुप अर्जेटीना को चैंपियन बनाने पर तुला हुआ है. यहां तक कहा जा रहा था कि अर्जेंटीना और मेसी पर करोड़ों का सट्टा लगा है. अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा की संयुक्त मेजबानी में संपन्न हुए फीफा विश्व कप के दौरान कुल 39 दिनों में 48 देशों ने 104 यादगार मैच खेले.

रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुकाबले, स्टार खिलाड़ियों की चमक, कुछ का फ्लॉप होना और कई एक का उभर कर आना, रेफरियों पर सवाल और गंभीर आरोप इस फुटबॉल विश्व कप की खासियतों में रहा. कई दिग्गज खिलाड़ी विश्व कप में अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप चमके, तो कुछ एक नाकाम भी रहे. हालांकि रोमांच और विवाद के साथ इस विश्व कप ने फुटबॉल जगत को नये नायक भी दिये. यह भी अनुभव किया गया कि आधुनिक फुटबॉल में तकनीक, रेफरी और वीएआर (वीडियो असिस्टेंस रेफरी) जितने निर्णायक हो गये हैं, उतने शायद खिलाड़ी भी नहीं हैं. फिर भी पूरे टूर्नामेंट के दौरान रोमांच का स्तर असाधारण रहा. इस विश्व कप में अपेक्षाकृत छोटे देशों ने स्थापित फुटबॉल महाशक्तियों को कड़ी चुनौती देकर यह संदेश दिया कि अब फुटबॉल का स्तर पूरी दुनिया में तेजी से बराबरी की ओर बढ़ रहा है.

यह वाकई एक महत्वपूर्ण संदेश है कि फुटबॉल का वैश्विक संतुलन लगातार बदल रहा है. यानी अब फुटबॉल पर दक्षिण अमेरिका और यूरोप का निर्विवाद वर्चस्व नहीं रहा. इस विश्व कप में एशिया, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका की टीमें भी तकनीकी, सामरिक और मानसिक रूप से पहले से कहीं अधिक परिपक्व दिखाई पड़ीं. यही कारण है कि मैचों में परिणाम की भविष्यवाणी करना भी अपेक्षाकृत कठिन होता गया. लेकिन फीफा रैंकिंग की पहली चार टीमों-फ्रांस, अर्जेंटीना, स्पेन और इंग्लैंड का अंतिम चार में प्रवेश करना यह जरूर साबित करता था कि उनका प्रदर्शन उम्मीद पर खरा और रैंकिंग को साकार करने वाला रहा. फीफा कप की यही सबसे बड़ी खूबी है कि यह हर विश्व कप में नये नायक देता है, नये विवाद छोड़ जाता है और करोड़ों प्रशंसकों को अगले विश्व कप तक नयी यादों के सहारे जीने का कारण भी देता है. बेशक, इस विश्व कप ने भी ऐसा कुछ दिया है. लेकिन जो चीज आगे खलेगी, वह यह कि मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो की श्रेष्ठता का तुलनात्मक आकलन शायद आगे देखने को न मिल पाये.

इन दोनों ही दिग्गज फुटबॉलरों का यह आखिरी विश्व कप था. इसमें मेसी ने जहां अपनी प्रतिभा का बार-बार परिचय दिया, वहीं रोनाल्डो फीके साबित हुए. आमतौर पर यह देखा गया है कि विश्व कप में अंततः उसी की चर्चा बच जाती है, जो फीफा कप जीत ले जाता है. तीसरे और चौथे स्थान के मुकाबले को अक्सर भाव नहीं दिया जाता. लेकिन इस विश्व कप में ऐसा नहीं हुआ. इंग्लैंड और फ्रांस के बीच तीसरे स्थान के लिए खेला गया मैच इतिहास में दर्ज हो चुका है. गोलों की बरसात के चलते इंग्लैंड की 6-4 से जीत, विजेता टीम की तरफ से बुखायो साका की हैटट्रिक, बेलिंघम का जादुई प्रदर्शन, फ्रांस के सुपर स्टार एम्बापे का 22 गोलों तक पहुंचना यादगार रहे. इस विश्व कप में सबसे अधिक 10 गोल करने वाले एम्बापे को गोल्डन बूट अवार्ड मिला. जाहिर है कि इंग्लैंड और फ्रांस के बीच हुए मुकाबले को इस विश्व कप के सबसे रोमांचक मैच के रूप में याद किया जायेगा. ऐसे ही, स्पेन ने सिर्फ खिताब ही नहीं जीता, बल्कि व्यक्तिगत पुरस्कारों पर भी उसने अपना दबदबा बनाया. टीम के कप्तान और शानदार मिडफील्डर रोड्री को पूरे टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया और उन्हें गोल्डन बॉल से सम्मानित किया गया. जबकि मेसी को सिल्वर बॉल से सम्मानित किया गया. एम्बापे को गोल्डन बूट के अलावा ब्रॉन्ज बॉल भी मिला.

विश्व फुटबॉल के रोमांच में भारत का दूर-दूर तक न होना अखरता है. कुछ विशेषज्ञों का यह आकलन है कि यदि फीफा अगले विश्व कप में भाग लेने वाली टीमों की संख्या 48 से बढ़ा कर 64 कर देता है, तो भारत के विश्व कप में खेलने का सपना साकार हो सकता है. लेकिन इसमें भारत के लिए कोई संभावना नहीं दिखती. ऐसा इसलिए कि विश्व कप में एशियाई टीमों की संख्या 12 या इससे ज्यादा करना भी फुटबॉल के साथ धोखा ही होगा, क्योंकि एशियाई फुटबाल में चार-छह देशों को छोड़ कर बाकी देश फुटबॉल के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति कर रहे हैं. फिलहाल भारत फीफा की रैकिंग में 140 वें स्थान के आसपास है, जबकि एएफसी रैकिंग में 26 वें नंबर पर है. विश्व कप में टीमों की संख्या 32 से 48 करते वक्त यह कहा गया था कि भारत के लिए एशिया से टिकट पाने का वक्त आ गया है. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, क्योंकि साल दर साल भारतीय फुटबॉल का स्तर गिरता चला गया. यह भारतीय फुटबॉल के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है. एक समय एशिया का चैंपियन देश गिरते-पड़ते इतना नीचे चला गया है कि उसका ऊपर उठ कर चलना भी भारी पड़ गया है, क्वालिफाई करना तो दूर की बात. ऐसे में, फुटबॉल में बेहतर करने के लिए हमें लंबी और योजनाबद्ध तैयारी करनी होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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