अमेरिका से समझौते में सुरक्षित रहें किसानों के हित, पढ़ें प्रो अश्विनी महाजन का खास लेख

India-US trade agreement : जीएम फसलों के विरोध का एक और कारण यह है कि नीति आयोग ने जिन जीएम उत्पादों का आयात खोलने की सिफारिश की है, वे अमेरिका में मनुष्य द्वारा उपभोग नहीं किये जाते. वहां मक्का और सोया का उपयोग या तो जानवरों के चारे के रूप में किया जाता है या एथनॉल बनाने में.

India-US trade agreement : कुछ दिन पहले नीति आयोग के एक वर्किंग पेपर में केंद्र सरकार से सिफारिश की गयी कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में जैव परिवर्द्धित (जीएम) कृषि उत्पादों के आयात को अनुमति दे दी जाए. इसमें नीति आयोग ने मक्का, सोयाबीन जैसी फसलों के आयात को खोल देने की सिफारिश की है. वर्किंग पेपर में यह भी राय दी गयी कि सरकार इस समझौते में उन कृषि उत्पादों के आयात को भी खोलने का प्रस्ताव करे, जिन्हें भारत में या तो पैदा नहीं किया जाता या जिनका उत्पादन इतना कम है कि उनके आयात से किसानों पर खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. आयोग ने चावल, काली मिर्च, सोयाबीन तेल, झींगा, चाय, कॉफी, डेयरी उत्पादन, पोल्ट्री, सेब, बादाम, पिस्ता आदि का आयात खोलने की सिफारिश की है. इस पर भारतीय किसान संघ सहित किसान संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया आयी है. उन्होंने कहा है कि ये सुझाव किसानों के हितों के प्रतिकूल हैं.


हालांकि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताओं में अवरोध आने की भी बात है, क्योंकि हमारी सरकार अमेरिका की यह मांग मानने को तैयार नहीं है कि अमेरिका के जीएम कृषि उत्पादों और अन्य कृषि उत्पादों के लिए देश के बाजार खोले जाएं. नीति आयोग ने पहले भी जीएम फसलों की पैरवी की थी और तब भी उसका विरोध हुआ था. देश में लंबे समय से जीएम फसलों का विरोध हो रहा है. हालांकि पक्षधरों द्वारा लगातार जीएम फसलों के पक्ष में प्रयास किये जाते रहे हैं. पर भारी विरोध और ठोस तर्कों के कारण जीएम समर्थकों को सफलता हाथ नहीं लगी है. जीएम फसलों के विरोध के कई कारण हैं. पहला कारण तो यही है कि अधिकांश जीएम फसलें शाकनाशक रोधी, यानी हर्बिसाइड टॉलरेंट है. यानी जब ये फैसलें उगायी जाती हैं, तो उसके आसपास के जितने भी शाक हैं, वे सभी शाकनाशकों द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं और जीएम फसलों पर असर नहीं पड़ता. लेकिन ऐसे वैज्ञानिक तथ्य मौजूद हैं, जो साबित करते हैं कि शाकनाशक कैंसरकारी हैं. जब इन शाकनाशकों का उपयोग जीएम फसलों के उत्पादन के दौरान किया जाता है, तो उसके कुछ अवशेष उन कृषि उत्पादों में रह जाते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकते हैं. आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर कैंसर के 350 मरीज हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा प्रति लाख पर सौ का है.


हालांकि भारत में जीएम बीजों का उपयोग और आयात वर्जित है, पर कुछ समय से खाद्य तेलों की कमी के चलते अमेरिका और अन्य देशों से खाद्य तेलों का आयात बढ़ रहा है, जिनमें से कुछ मात्रा में जीएम खाद्य तेलों का भी आयात अनजाने में हो रहा है. देश में कैंसर के बढ़ते मामलों का यह भी एक कारण बताया जाता है. दूसरा कारण है, भारतीय नियमों के अनुसार अभी देश में जीएम फसलों के उत्पादन और आयात की अनुमति नहीं है. डब्ल्यूटीओ नियमों के अधीन हर देश को यह अधिकार है कि वह अपने देशवासियों के स्वास्थ्य के मद्देनजर अन्य देशों से आने वाले सामान पर रोक लगा सके. चूंकि देश के किसान पहले से ही अपनी उपज का सही मूल्य न पाने के कारण आर्थिक नुकसान उठा रहे हैं, ऐसे में, अमेरिका के सस्ते जीएम उत्पादों के आयात की अनुमति देने पर हमारे किसानों को और अधिक नुकसान होगा. वैसी स्थिति में किसान यदि कृषि से बाहर होते हैं, तो देश की खाद्य सुरक्षा ही खतरे में पड़ सकती है. तीसरे, भारत के फूड सिक्योरिटी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआइ) द्वारा तय खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत जीएम उत्पादों की बिक्री संभव नहीं है. ऐसे में जीएम उत्पादों के आयात के बाद वे भारत की खाद्य शृंखला में शामिल हो जायेंगे, जिससे नियमों का तो उल्लंघन होगा ही, देशवासियों के स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडराने लगेगा.


जीएम फसलों के विरोध का एक और कारण यह है कि नीति आयोग ने जिन जीएम उत्पादों का आयात खोलने की सिफारिश की है, वे अमेरिका में मनुष्य द्वारा उपभोग नहीं किये जाते. वहां मक्का और सोया का उपयोग या तो जानवरों के चारे के रूप में किया जाता है या एथनॉल बनाने में. वहां जीएम मक्का का 40 से 50 फीसदी इस्तेमाल जानवरों के चारे के रूप में, 30 से 40 फीसदी इस्तेमाल एथनॉल बनाने में और मात्र 10 प्रतिशत खाद्य प्रसंस्करण में इस्तेमाल किया जाता है. सोया का भी इस्तेमाल अधिकांशतः पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है. ऐसे जीएम उत्पादों का भारत की खाद्य शृंखला में शामिल होना देशवासियों का अपमान भी है. हमें यह भी समझना होगा कि भारत लगभग 50 अरब डॉलर मूल्य के कृषि खाद्य उत्पादों का निर्यात करता है, और भारतीय खाद्य पदार्थों का मुख्य आकर्षण यह है कि वे गैर-जीएम टैग वाले होते हैं. जीएम फसलों के हमारी खाद्य शृंखला में प्रवेश करते ही हम अपने निर्यात बाजारों का एक बड़ा हिस्सा खो सकते हैं, क्योंकि अनेक देश जीएम खाद्य उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं देते. इसलिए सरकार को किसानों, डेयरी, खाद्य सुरक्षा और जनस्वास्थ्य की रक्षा करते हुए नीति आयोग की सिफारिशों को दरकिनार कर देना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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