विकास के विमर्श में शिक्षा

शिक्षा एवं संस्कृति की दुनिया प्रशासन के अन्य पक्षों की दुनिया से थोड़ा भिन्न है. जिन राजनीतिक व्यक्तित्वों का ज्ञान एवं रचना जगत के साथ गहरा अंतर्संबंध है, वे शिक्षा एवं संस्कृति के विकास में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं.

बद्रीनारायण, निदेशक, जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट, इलाहाबाद

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भारत में विकास शब्द का जब भी उपयोग किया जाता है तो आधारभूत संरचनाएं यथा बिजली, पानी सड़क ही उसके केंद्र में रहता है. आर्थिक कार्य-व्यवहार ही हमारे विकास को मापने का मानक माना जाता है. व्यापार, बाजार, जीडीपी, विदेशी मुद्रा भंडार जैसे मानकों के आधार पर ही हम अपने विकास का मूल्यांकन करते हैं. विकास की संकल्पना करते समय कभी भी शिक्षा एवं संस्कृति को महत्वपूर्ण जगह नहीं दी जाती. जबकि विकास के विमर्श में शिक्षा एवं संस्कृति भी विकास को मानवीय चेहरा देने में सहायक होते हैं. शिक्षा एवं संस्कृति में अंतर्तत्व हैं, जिनके इर्द-गिर्द विकास का ताना-बाना बुना जाता है.

भारत में विकास के विमर्श में शिक्षा एवं संस्कृति को भले ही केंद्रीय स्थान प्राप्त न हो, किंतु अगर भारतीय शिक्षा के राजनीतिक नेतृत्व के ढांचे का अध्ययन करें, तो जाहिर होता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों की पूरी कोशिश रही है कि शिक्षा एवं संस्कृति का नेतृत्व रचनात्मकता एवं ज्ञान से लैस नेताओं के हाथों में रहे. शिक्षा एवं संस्कृति की दुनिया प्रशासन के अन्य पक्षों की दुनिया से थोड़ा भिन्न है.

जिन राजनीतिक व्यक्तित्वों का ज्ञान एवं रचना जगत के साथ गहरा अंतर्संबंध है, वे शिक्षा एवं संस्कृति के विकास में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं. महज नेता रहे मंत्रियों से भिन्न, रचनात्मक एवं ज्ञान जगत से जुड़े मानव संसाधन मंत्रियों ने भारत में एक सर्व समावेशी शिक्षा की दुनिया रचने में बड़ी भूमिका निभायी है. भारत में, जहां बड़ी आबादी गरीबी का शिकार है, वहां सस्ती एवं जनता के विभिन्न स्तरों को सुलभ होने वाली शिक्षा उपलब्ध कराने में ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्वों की बड़ी भूमिका रही है. भारत में एक तरफ मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, सैय्यद नुरूल हसन जैसे इतिहासकार, उपन्यासकारों ने शिक्षा को नेतृत्व दिया है.

वहीं दूसरी तरफ विश्वनाथ प्रताप सिंह, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, रमेश पोखरियाल निशंक जैसे साहित्य से जुड़े चेहरों ने भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति की दुनिया रची है. शिक्षा मंत्री के रूप में डॉ मुरली मनोहर जोशी, वीकेआरवी राव अपने-अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्ञानी थे. मौलाना आजाद स्वतंत्रता सेनानी, ‘इंडिया विंस फ्रीडम’ जैसी किताब के लेखक और विद्वान व्यक्ति थे, वहीं नुरूल हसन मध्यकालीन राज्यसत्ता एवं सूफी संस्कृति के बड़े इतिहासकार थे. वीपी सिंह और अटल जी कवि थे. नरसिम्हा राव 14 भाषाओं के ज्ञाता और लेखक थे. निशंक के भी लगभग 25 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

कपिल सिब्बल, माधव राव सिंधिया, पल्लम राजू, अर्जुन सिंह, राजमंगल पांडेय, पी शिवशंकर, केसी पंत, बी शंकरानंद जैसे घोर राजनीतिज्ञों के हाथ में भी भारत के केंद्रीय शिक्षा-संस्कृति का नेतृत्व रहा है. नेतृत्व के इन दोनों प्रकारों ने भारतीय शिक्षा जगत के विकास एवं विस्तार में अपने-अपने ढंग से भूमिकाएं निभायी हैं. किंतु जिन राजनेताओं की आवाजाही ज्ञान एवं संस्कृति की दुनिया में रही है, उनके समय में शिक्षा एवं संस्कृति का ढांचा संवादी, संवेदनशील एवं सहज हो गया है. कहते हैं, ‘सुग्गा अगर कोमल हाथों पर बैठेगा तो खुशी से फुदकेगा, किंतु कठोर हाथों पर बैठने पर वही सुग्गा असहज हो जायेगा.’

यहां प्राय: एक तर्क दिया जाता है कि ज्ञान एवं रचना की दुनिया के लोग व्यावहारिक कम होते हैं, फलत: उनके समय में विकास एवं विस्तार प्रभावित होता है. लेकिन अगर शिक्षा एवं संस्कृति के संंदर्भ में देखें तो, ज्ञान एवं रचना से जुड़े राजनीतिक नेताओं ने अपने समय में भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति को आधारभूत एवं परिवर्तनकारी स्वरूप प्रदान किया है. अगर मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, पीवी नरसिम्हा राव, सैय्यद नुरूल हसन, अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी का नेतृत्व याद करें तो उनके समय में भारतीय शिक्षा की दुनिया में महत्वपूर्ण एवं रूपांतरकारी काम हुए.

मौलाना अबुल कलाम आजाद के नेतृत्व में यूजीसी जैसी संस्था तो बनी ही, अनेक आइआइटी बने, जामिया मिलिया जैसा विश्वविद्यालय उन्हीं की अंतदृर्ष्टि की उपज थी. सैय्यद नुरूल हसन के नेतृत्व में आइसीएचआर जैसी संस्था ने आकार लिया. मुरली मनोहर जोशी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में देशज ज्ञान, तकनीक एवं अंतर्दृष्टि को महत्वपूर्ण स्थान दिलाया. वर्तमान शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक भारत में नयी शिक्षा नीति लाकर एवं उसे लागू कर भारतीय शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने के लिए जाने जायेंगे. कोरोना काल का सामना करने के लिए भारतीय शिक्षा को तैयार करने के लिए एक संवेदनशील एवं संवादी उपक्रम करने के उनके प्रयासों की सराहना भी हो रही है.

भारतीय विकास की कथा में भारतीय शिक्षा को भले ही अभी महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया जा रहा हो, भले ही अमेरिका एवं इग्लैंड के विश्वविद्यालयों का डंका अभी भी बज रहा हो, किंतु भारतीय शिक्षा के इन रचनात्मक एवं जन-प्रतिबद्ध नेतृत्व के कारण ही आज भारतीय शिक्षा गरीबों एवं कमजोर सामाजिक समूहों के लिए भी सुलभ है. व्यावसायिक एवं उपभोक्तावादी शिक्षा के इस दौर में भी भारतीय शिक्षा में रचनात्मक अनुशासनों एवं विधाओं के लिए जगह बची है. भारतीय शिक्षा में शिक्षण के साथ-साथ शोध को अभी व्यापक महत्व मिलना बाकी है. नयी शिक्षा नीति, जिसे मानव संसाधन मंत्रालय शीघ्र ही कार्यान्वित करना चाहती है, के कारण बहुत संभव है भारतीय उच्च शिक्षा में शोध को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो.

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Published by: संपादकीय

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